Tuesday 5 January 2016

क्या फर्क पड़ता है ?

समय की स्याही से लिखे
इतिहास के पन्ने
सूखकर पीले पड़ जाते हैं
और पतझर के पत्तों -सा झर जाते हैं !
टेप काण्ड हो या रेप काण्ड .
उनका भी हमेशा यही हश्र हुआ है
और आगे भी होना है
जनता की किस्मत में रोना ही रोना है .
बयानवीरों के शोर में
डूबकर खो जाती है
दरिंदों के पंजों में दबे कुचले
परिंदों की आवाज ,
बेजुबान तितलियाँ किसे सुनाएं अपना दर्द ,
दुनिया तो देखती है
सिर्फ उनके पंखों के रंग !
उसे पसंद नहीं देखना उनके
ज़िंदा रहने की जद्दोज़हद का जंग !
टेप हो या रेप ,क्या फर्क पड़ता है ,
गुनहगारों की आँखों में मुस्कुराहट है,
सिर्फ और सिर्फ जनता के चेहरे पर
बेचैनी और घबराहट है !
                                       -स्वराज्य करुण

2 comments:

  1. सुन्दर व सार्थक रचना...
    नववर्ष मंगलमय हो।
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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    1. धन्यवाद संजू जी ! बहुत-बहुत शुभकामनाएं .

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