Tuesday 22 November 2011

बिलखती तस्वीर : छलकते आँसू !


           इस बिलखती तस्वीर से  छलक रहे आँसू  उन भोले  चेहरों के  हैं , जो हम भारतीयों के घरों में संतान जन्म की खुशी के मौकों पर बच्चों को आशीर्वाद देने आते हैं , ढोलक के साथ नाच-गा कर आपसे या हमसे कुछ बख्शीश की चाहत रखते हैं और मिलने पर आशीष देकर खुशी-खुशी लौट जाते हैं . कौन उन्हें बताता होगा -किसके घर बेटे या बेटी का जन्म हुआ है ? वे किसी भी शहर में कहाँ रहते हैं और किस हाल में रहते हैं  ,  अधिकाँश शहरवासियों को पता ही नहीं चलता. सामान्य जीवन जीने वाले हमारे इस समाज ने कभी उनमें से किसी की मौत  के बारे में नहीं सुना होगा, उनकी शव यात्रा  नहीं देखी होगी .हमारी दुनिया में रहकर भी वे अपनी  किसी और ही दुनिया में मगन रहते है.
      कब आते हैं , कहाँ से आते हैं और कब हमारी इस खुदगर्ज़ दुनिया को अलविदा कह जाते हैं , बहुतों को मालूम ही नहीं हो पाता . उन्हें इस आधुनिक मानव समाज और विशेष रूप से इक्कीसवीं सदी के भारतीय समाज का सबसे तिरस्कृत और बहिष्कृत वर्ग माना जा सकता है. इसके बावजूद हम उन्हें  इस दुनिया का  सबसे खुशमिजाज़ प्राणी कह सकते हैं.  अपने आप में मस्त रहने वाले ,  लेकिन किन्नरों की इन  खुशियों में रविवार  शाम उस वक्त ग्रहण लग गया , जब पूर्वी दिल्ली की नन्द नगरी में एक सामुदायिक भवन में आयोजित उनके तीन दिवसीय समारोह के आख़िरी दिन  अचानक आग लग गयी और उनमें से कम से कम १४ लोग मौत का शिकार हो गए . कई लोग घायल भी हुए.  हादसा क्यों हुआ,  कैसे हुआ ,किसकी गलती से हुआ ,यह जांच का विषय हो सकता है , लेकिन दिल दहला देने वाले इस हादसे से सदमे और दहशत में आये किन्नरों के आंसुओं से भरे  बिलखते फोटो अखबारों में देख कर किसी भी  सहृदय  इंसान का दिल दहल सकता है.    
            मेरे शहर के अधिकाँश दैनिक अखबारों में अगले दिन सोमवार को   इस भयानक अग्नि  दुर्घटना के    समाचार तो छपे ,लेकिन पहली या दूसरी हेड लाइन में नहीं . शायद इसका एक कारण किन्नरों के प्रति आम इंसान के ज़ेहन में उपेक्षापूर्ण  एक नकारात्मक छवि भी  हैं,लेकिन अब इनके संगठित होने पर और इन्हें सहयोग देने के लिए आगे आ रहे कुछ सामाजिक संगठनों की मदद से यह प्रतिकूल छवि दूर हो रही है. ऐसा होना भी चाहिए . आखिर वे  भी तो इंसान हैं . अगर किसी कारणवश  उनमें कुदरती तौर पर कोई जैविक कमी रह गयी  हो ,या किसी को किसी ने ज़बरन किन्नर बना दिया हो , तो इसमें उनका  क्या कुसूर  ?  ये बात तो साफ़ है कि उनमें भी एक इंसानी दिल धडकता है. मानवीय संवेदनाएं उनमें भी होती हैं . खुशी और गम का अहसास उन्हें भी होता है . पूर्वी दिल्ली का  अग्नि हादसा उनके भी दिलों को गहरे ज़ख्म देकर चला गया .उनके इस दर्द को दिल की गहराइयों से महसूस करने की ज़रूरत है .वे कहीं से भी  हमारे घरों का पता लगाकर हमारी खुशियों में शरीक होने बिन बुलाए भी चले आते हैं . क्या हमें भी किन्नरों के  गम के इन लम्हों में उनके साथ शरीक नहीं होना चाहिए ?                                                                              स्वराज्य करुण                                                                                                                                         

   

(फोटो : google से साभार )                                                                                                

4 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति मैंने भी यह समाचार न्यूज़ में देखा था। मैं आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ। दुख किसी का भी हो दुख -दुख ही होता है। अपनों को खोने गम केवल, वो ही समझ सकता है। जिसने खोया हो किसी अपने को आखिर यह किन्नर भी तो इंसान ही हैं।समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/11/blog-post_20.html

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  2. dard se bhari hun...par aaj ka sach bhi ...

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