Monday 9 August 2010

सुबह

सुबह
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सूर्योदय की प्रतीक्षा
करती रात
एक अंधी
सभ्यता है ,दो आँखों की तरह
उससे मिलती है सुबह .
पर्वतों की बाँहों में हरे -भरे जंगलों के
बीच सुबह होती है -नदियों के किनारे .
सूर्योदय की प्रतीक्षा करती रात
एक सूखी नदी है ,
बरसात के बहते पानी की तरह
तरह पहाडी ढलानों से उतर कर
मिलता है उससे -दिन का पहला -पहला
उजियारा .
सुबह होती है गाँव में ,
नीम और बरगद की छाँव में,
तालाब के किनारे किलकारियां भरते और
पानी में डुबकियाँ लगाते बच्चों की
तरह होती है सुबह  .
पहली मुलाक़ात की मुस्कुराहटों जैसी
बच्चों के दुधमुंहे दांतों की तरह
कितनी साफ़ और पहाडी झरनों
की मानिंद कितनी तनाव रहित होती है सुबह .
रात के अँधेरे से हुए संघर्ष का बोझ
उतार कर आगामी संघर्ष की तैयारी के साथ ,
क़दम -दर -क़दम आगे
बढ़ती - होती है सुबह .
ओ सुबह !
तुम पर्वतों की तरह तनो,
नदियों की तरह बहो और
अँधेरे के खिलाफ जारी अपने संघर्ष की गाथाएं
कहो , कहती रहो ,कहती रहो .
                                --- स्वराज्य करुण

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