Tuesday, May 3, 2022

(आलेख )पारम्परिक और नागरिक पत्रकारिता के बीच प्रेस की आज़ादी

संदर्भ : विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस : 3 मई 2022
      आलेख -  स्वराज करुण 
आज की दुनिया में प्रेस का अर्थ बहुत व्यापक हो गया है। अब 'प्रेस' का मतलब सिर्फ़ छपा हुआ अख़बार नहीं है ,बल्कि उस तक समाचारों और विचारों की सप्लाई  सतत बनाए रखने वाले रेडियो,टेलीविजन,  और इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म और  समाचार एजेंसियां भी' प्रेस ' की भूमिका में  हैं।लेकिन  पारम्परिक पत्रकारिता के रूप में प्रिंट मीडिया की भूमिका आज भी बहुत महत्वपूर्ण और ताकतवर बनी हुई है। छपे हुए शब्दों और विचारों का अपना महत्व होता है।
    इधर हो सकता है कि बहुत से लोग सोशल मीडिया को 'पत्रकारिता' मानने से  इंकार करें ,लेकिन यह पारम्परिक पत्रकारिता से हटकर 'सार्वजनिक पत्रकारिता'  अथवा 'नागरिक पत्रकारिता ' (सिटीजन जनर्लिज्म ) कहलाने की हक़दार तो बन ही चुकी है। यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का एक नया माध्यम है। इंटरनेट आधारित सूचना -क्रांति के विगत लगभग दो - दशकों में इसका भरपूर विकास हुआ है। 
    पारम्परिक पत्रकारिता में वैतनिक अथवा मानसेवी सम्पादक और संवाददाताओं का होना बहुत जरूरी है। वो छपनीय जानकारी प्राप्त करने के लिए  किसी से भी कोई भी सवाल कर सकते हैं,  जबकि 'नागरिक पत्रकारिता 'में व्यक्ति को ऐसी आज़ादी नहीं है ,लेकिन आज दुनिया का हर स्मार्ट फोन धारक व्यक्ति सूचनाओं ,समाचारों और विचारों का प्रेषक बनकर अप्रत्यक्ष रूप से ही क्यों न हो , एक 'नागरिक पत्रकार' (सिटीजन जनर्लिस्ट)  की भूमिका तो  निभा ही रहा है।वह अपने लिखे हुए का खुद सम्पादक और खुद प्रकाशक है। भले ही वह हमारी सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक  व्यवस्था के सूत्रधारों से आमने -सामने होकर कोई सवाल न  कर पाता हो ,लेकिन अपने इर्दगिर्द की घटनाओं और समस्याओं को सचित्र पोस्ट करके अप्रत्यक्ष रूप से सवाल तो उठा ही देता है और पारम्परिक प्रेस के लिए विषय अथवा मैटर का जुगाड़ भी कर देता है। वह भी एकदम निःशुल्क ,बल्कि खुद पैसे देकर ,यानी मोबाइल कम्पनियों  को  हर महीने सिम रिचार्ज के लिए अपनी जेब से सैकड़ों रुपए देकर वह 'नागरिक पत्रकारिता 'में स्वप्रेरणा से भागीदार बना हुआ है। 
 दुनिया के बड़े - बड़े नेता, राष्ट्र  प्रमुख  और अफ़सर ,आजकल स्वयं न्यूज मेकर बन गए हैं जो  पारम्परिक प्रेस से साझा करने योग्य जानकारी सबसे पहले फेसबुक,  ट्विटर,ब्लॉग और वेबसाइट  पर फोटो और वीडियो सहित पोस्ट कर देते हैं ,जिन्हें अख़बार ,रेडियो और टीव्ही चैनल अपने लिए उठा लेते हैं। उन्हें पकी-पकाई छपनीय  सामग्री मिल जाती है।अब तो टीव्ही चैनलों की तरह यूट्यूब न्यूज चैनल भी ख़ूब चल रहे हैं।     सोशल मीडिया के ये सभी प्लेटफार्म निजी कम्पनियों द्वारा संधारित और संचालित हैं। वो जिस दिन चाहें ,इन्हें बंद भी कर सकती हैं।लेकिन विश्व के करोड़ो नागरिकों से  मिल रही तरह -तरह की सूचनाओं का विशाल बैंक उन्हें मुफ़्त में मिल रहा है और विज्ञापनों से भी  उनकी खरबों डॉलर की कमाई हो रही है।ऐसे में मुझे नहीं लगता कि वो  अपनी इन दुकानों को बंद करेंगीं। हाल ही में एलन मस्क द्वारा खरबों डॉलर देकर ट्विटर को खरीदे जाने की घटना इस बात को पुख़्ता करती है कि सोशल मीडिया आज एक बड़े उद्योग का रूप धारण कर चुका है।   दुनिया भर में आज लगभग सभी सरकारी विभागों और  निजी कम्पनियों के अपने -अपने वेबसाइट हैं। लोकल से ग्लोबल तक हर तरह की जानकारी लोग इनमें अपने हिसाब से कहीं भी और कभी भी प्राप्त कर सकते हैं।
        आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस 2022 के मौके पर पत्रकारिता की  इन सभी विधाओं में सक्रिय सभी लोगों को हार्दिक बधाईबधाई   प्रेस की स्वतंत्रता जनता की  अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ी हुई है ,जो एकतरफा कतई नहीं हो सकती। इसके साथ हमारी सामाजिक ,राष्ट्रीय और वैश्विक ज़िम्मेदारियाँ भी हैं। सूचनाएँ गलत न हों ,समाचार प्रायोजित न हों और विचार विषैले न हों और जन हित से जुड़े हुए हों , प्रेस की आज़ादी में इन बातों का  ध्यान रखना भी  बहुत जरूरी है।  
   -- स्वराज करुण 

Saturday, April 16, 2022

क्या सोचते होंगे हमारे बच्चे ?


(स्वराज करुण )
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ज़रा सोचो ! 
क्या सोचते होंगे हमारे बच्चे ,
जब देखते हैं अपने से बड़ों को 
आपस में लड़ते ,झगड़ते 
कहीं ज़मीन -जायदाद के नाम पर ,
कहीं जाति और धर्म के नाम पर ,
कहीं देशों की सरहदों के नाम पर ,
एक -दूसरे के ख़ून के प्यासे 
लोगों को देख कर ,
कहीं बुलडोजरों से उजड़ते 
और जलते हुए घरों को देखकर ,
कहीं कातिल गोलियाँ उगलती बंदूकों 
और कहीं ख़ून की प्यासी 
तलवारों को देखकर ,
कहीं विमानों से बरसते बमों 
से  उजड़ते शहरों में 
रोते-बिलखते लोगों और 
अपने ही जैसे नन्हे  बच्चों को देखकर ,
कहीं अस्पतालों 
के दरवाजों से दुत्कारे गए 
बेसहारा मरीजों  को देखकर ,
कहीं फैक्ट्रियों के लिए उजाड़ी गयी 
बस्तियों से मेहनतकशों की 
उजड़ती ज़िन्दगी को देखकर ,
कहीं अमीरों की  ऊँची -ऊँची
आलीशान इमारतों और 
कहीं उनके नीचे झुग्गियों में 
दिन गुजारते अपने ही जैसे 
बच्चों को देखकर ,
कहीं रेल्वे स्टेशनों और बस -अड्डों 
में भीख मांगते नन्हें  मासूमों को
देखकर आख़िर क्या सोचते होंगे बच्चे ?
शायद यह सवाल उनके 
मन में जरूर उठता होगा - 
क्या वाकई यही है इंसानों की दुनिया ?
इसलिए इंसानों !
अगर तुम वाकई इंसान हो ,अगर तुममें
बची है थोड़ी -सी भी इंसानियत 
तो मत दिखाओ अपने बच्चों को
ऐसे खौफ़नाक और दर्दनाक नज़ारे ,
वरना वो सोचेंगे कि
हम व्यर्थ ही आए इस दुनिया में ,
हम जहाँ थे ,वहीं अच्छे थे ।
इसलिए सोचो , 
तुम क्या दिखाना चाहते हो
अपने बच्चों को ?
रंग -बिरंगे परिन्दे 
या खूंखार दरिंदे ?
ख़ूनी मंज़र या ख़ूबसूरत धरती ?
       - स्वराज करुण 

Tuesday, April 12, 2022

निठल्लों की फ़ौज और नेताओं की मौज

(आलेख : स्वराज करुण) 
 अगर पढ़ना चाहें तो कृपया ध्यान से और धीरज से पूरा पढ़िएगा । महान विभूतियों द्वारा निर्मित हमारे देश के  संविधान ने  सबको अपनी- अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार पूजा-  प्रार्थना , इबादत या अरदास करने का अधिकार दिया है। कोई किसी के धार्मिक कार्यो में हस्तक्षेप न करे , किसी के पूजा स्थल को आहत न करे ,तो सब कुछ शांति से चल सकता है। आम तौर पर अब तक ऐसा चल भी रहा था। 
   हमारा देश पूरी दुनिया में सामाजिक -धार्मिक सदभाव की मिसाल बना हुआ था । कमोबेश आज भी है।  सब एक- दूसरे के तीज-  त्यौहारों में हँसी -खुशी शामिल होते थे । एक -दूसरे के दुःखों में शामिल होते थे । आज भी होते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश विरोधी कुछ ताकतों ने भारत की इस महान परम्परा को खंडित करने की ही कुचेष्टा की है । इसके फलस्वरूप विशेष रूप से देश के कुछ शहरों में दो धार्मिक समूहों के बीच सन्देह का जहरीला बीजारोपण हो गया है।   सांप्रदायिकता के इन ज़हरीले बीजों को अंकुरित होने से रोकना होगा। वरना देश की तरक्की रूक जाएगी। इस बार रामनवमीं और रमजान के मौके पर देश के  कुछ इलाकों में हुई हिंसक घटनाओं ने देशवासियों को शर्मसार कर दिया है।इन घटनाओं ने  उन लाखों ,करोड़ों लोगों का सिर शर्म से झुका दिया है ,जो देश की महान साझी संस्कृति पर आस्था रखते हैं। सामाजिक समरसता की हमारी महान परम्परा में विश्वास रखते हैं। 
   यह वर्ष 2022 आज़ादी का अमृत महोत्सव वर्ष है। हम अपने देश की आज़ादी के 75 साल आगामी 15 अगस्त को पूर्ण  करके 76 वें वर्ष में प्रवेश करेंगे।। गंभीरता से विचार करें तो हम देखेंगे कि देश ने इन 75 वर्षों में ख़ूब तरक्की की है। किसानों ,मज़दूरों ,वैज्ञानिकों ,डॉक्टरों ,इंजीनियरों ,अध्यापकों ,उद्यमियों और समाज के सभी कर्मनिष्ठ वर्गों ने अपने -अपने कार्यक्षेत्र में  अपनी कड़ी मेहनत से देश की तरक्की में भरपूर योगदान दिया है। हम अंतरिक्ष में भी अपना परचम लहरा रहे हैं। देश की विकास यात्रा की अब तक की उपलब्धियों का श्रेय  हमारे महान लोकतंत्र और हमारी सभी चुनी हुई सरकारों को भी दिया जाना चाहिए।
      लेकिन अपने  चुनावी लाभ के लिए कुछ नेता भारत की तरक्की के सफ़र को भी दांव पर लगा रहे हैं। इसके लिए वो अपने काले धन की ताकत लगाकर देश के बेरोजगारों का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें ढाल बनाकर  ये नेता अपनी कुर्सियों के लिए वही सब कर  रहे हैं ,जो आज से 75 साल पहले यानी आज़ादी से पहले ,   हम पर हुकूमत करने वाले अंग्रेज किया करते थे। यानी देश को गुलाम बनाए रखने के लिए  'फूट डालो और राज करो ' की कुनीति पर अमल ! इनकी ऐसी हरकतों की वजह से देश की एकता और अखंडता ख़तरे में पड़ गयी है। राष्ट्र की तरक्की को रोकने की कोशिश हो रही है और इसके लिए  किराये की भीड़ का बेजा  इस्तेमाल किया जा रहा है । यही है देश के ख़िलाफ़ घिनौनी साज़िश । धार्मिक उन्माद फैलाकर जनता का ध्यान गऱीबी ,  महंगाई और बेरोजगारी जैसी  ज्वलंत समस्याओं से हटाना भी इस साजिश का एक घिनौना  एजेंडा है।
   कुछ स्वार्थी  नेता त्यौहारों  के मौके पर किराये की भीड़ का जुलूस भेजकर  अपने से भिन्न धर्मो के आस्था केंद्रों में हुड़दंग करवा रहे हैं। किसी दूसरे के धार्मिक स्थल पर जबरन अपने किसी धार्मिक रंग का झंडा क्यों लगाना चाहिए ? लेकिन नये (?) भारत मे दंगा भड़काने के लिए किराये  की भीड़ को भेजकर ऐसी घटिया हरकतें  करना कहीं दूर बैठे भेड़ियों को अच्छा लगता है। ये भेड़िये ही इस तरह की  भीड़ के आका होते हैं।ध्यान रहे कि  इस भीड़ में न तो ये नेता शामिल रहते हैं और न ही इनके लाडले सपूत। इनकी काली कमाई के बल पर इनके बेटे -बेटियाँ गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं।  इधर निठल्ले बेरोजगार भी आखिर  करें तो क्या करें  ? तमाम सरकारी योजनाओं के बावज़ूद कुछ अपवादों को छोड़कर उनमें से अधिकांश के  हाथों में कोई रोजगार नहीं है। लिहाज़ा, काली कमाई वाले नेता अपने घटिया इरादों को पूरा करवाने के लिए पैसा  देकर इनका इस्तेमाल करते हैं। यानी निठल्लों  की फ़ौज और नेताओं की मौज !   इस भीड़ में अधिकांश नशेबाज भी शामिल रहते हैं , जो शराब ,गांजा ,भांग पीकर चंद रुपयों की लालच में सिर्फ़ मटरगश्ती के लिए उन नेताओं का मोहरा बन जाते हैं। नशा और धार्मिक ज़हर के उन्माद में यह भीड़ एक बेजान रोबोट में तब्दील हो जाती है ,जिसका रिमोट कहीं दूर अपने वातानुकूलित ,आलीशान घर मे बैठे नेताओं के हाथों में होती है । वो अपने रिमोट से इन्हें जैसा चाहें ,वैसा नचाते रहते हैं। अगर ये नेता  ऐसा नहीं करेंगे तो उनकी ऐशोआराम की ज़िन्दगी का क्या होगा
     लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि देश के जो युवा इस भीड़ का हिस्सा नहीं बनते और अपना पूरा ध्यान पढ़ाई लिखाई में लगाते हैं ,गंभीरता से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं , वो ही आगे चलकर अच्छे डॉक्टर ,इंजीनियर ,अध्यापक ,प्राध्यापक ,वैज्ञानिक और सरकारी अधिकारी ,कर्मचारी बनकर , सफल उद्यमी बनकर  बेहतर किसान बनकर ,स्वयं का और देश का भविष्य बनाते हैं। देश को उम्मीद इन्हीं लोगों से है । नशे में डूबी  हिंसक,  उन्मादी  और उपद्रवी  भीड़ से नहीं ।
-- स्वराज करुण
   (पत्रकार एवं ब्लॉगर )

Wednesday, March 23, 2022

क्या इन युवा शहीदों से प्रेरणा लेंगे आज के युवा ?

          (आलेख    - स्वराज करुण )

 जवानी की दहलीज पर  आज के ज्यादातर युवा हसीन सपनों की रंगीन दुनिया में खोए रहते हैं और इस आधुनिक दौर में मोबाइल फोन पर वाट्सएप यूनिवर्सिटी के अधकचरे ज्ञान में भी उलझे रहते हैं । वे किसी भी तरीके से फोकट में धन कमाने के चक्कर में स्वार्थी नेताओं के दुमछल्ले बनकर उनके आगे -पीछे घूमते रहते हैं । हमारे आज के अधिकांश युवा  काले धन के ग्लैमर और प्रचार तंत्र के दम पर  महान नज़र आते नेताओं और फ़िल्मी अभिनेताओं को आदर्श मानकर अपना करियर बर्बाद कर  लेते हैं  , महँगाई ,गरीबी और बेरोजगारी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के बजाय वो  बेतुके धार्मिक नारों  के जहरीले मायाजाल में उलझे रहते हैं। ऐसे में उन्हें कहाँ फिक्र होगी कि आज हम 135 करोड़ देशवासियों के गाढ़े पसीने की कमाई मुट्ठी भर पूंजीपतियों की तिजोरियों में कैद है और  शिक्षा और चिकित्सा सुविधाएँ महँगी से महँगी होती जा रही हैं ? क्या उन्हें मालूम है कि आज देश में सामाजिक न्याय और  आर्थिक आज़ादी का सपना महज़ सपना बनकर रह गया है ,जिनके बिना देश की राजनीतिक आज़ादी निरर्थक है ?
      लेकिन  उम्र  के ऐसे  नाजुक दौर में आज से 91 साल पहले हमारे ही देश के तीन युवा क्रांतिकारियों ने वतन की आज़ादी के लिए क्रांति की राह पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए,जिन्हें तत्कालीन परिस्थितियों में भी  इस प्रकार की ज्वलंत समस्याओं की गहरी समझ थी। क्या आज की युवा पीढ़ी उनसे कुछ प्रेरणा ग्रहण कर पाएगी ?उनके बलिदानों से देशवासियों को राजनीतिक  आज़ादी तो मिल गयी ,लेकिन सामाजिक -आर्थिक आज़ादी का मिलना अभी बाकी है। 

                      
            
             अग्रणी पथ -प्रदर्शक 
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             आज 23 मार्च को उन्हीं तीन अमर शहीदों -- भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु की शहादत को याद करने का दिन है ।आज ही के दिन 1931 में लाहौर के केन्द्रीय जेल में तीनों ने इंकलाब ज़िंदाबाद का उद्घोष करते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर लटककर आज़ादी की लड़ाई में अपने प्राणों का बलिदान किया था। भगतसिंह उस दौर के युवा क्रांतिकारियों के अग्रणी पथ प्रदर्शक थे । वह  महान क्रांतिकारी अमर शहीद चंद्र शेखर आज़ाद के भी अभिन्न सहयोगी थे। आर्थिक विषमता पर आधारित समाज व्यवस्था को ध्वस्त करना और समानता पर आधारित स्वतंत्र और समाजवादी भारत का निर्माण उनका सपना था।  इन क्रांतिकारियों ने देश की आज़ादी के लिए हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना की स्थापना  की थी। इस संगठन का नाम ही यह साबित करने के लिए पर्याप्त था कि लोकतंत्र और समाजवाद में देश आज़ादी के इन महान योद्धाओं की गहरी आस्था थी।
     शहीदे-ए-आज़म भगत सिंह का जन्म तत्कालीन अविभाजित गुलाम भारत के लायलपुर जिले के ग्राम बंगा में  में 27 सितम्बर 1907 को हुआ था ,  जो अब पाकिस्तान में है । हालांकि उनका पारिवारिक गाँव खटकर कला स्वतंत्र भारत के ,पंजाब प्रांत में है ,जहाँ कुछ दिनों पहले विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से विजयी आम आदमी पार्टी की सरकार के मुखिया भगवंत मान ने अपने पद की शपथ ली थी। आज़ाद भारत के इतिहास में यह शायद पहला मौका है ,जब किसी नव निर्वाचित मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह देश के।एक महान सपूत और महान शहीद के गाँव में आयोजित किया गया।
 भगतसिंह ,सुखदेव और राजगुरू की शहादत के  करीब सोलह साल बाद अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' वाली नीति ने 15अगस्त 1947  को भारत की आज़ादी के समय  देश का बंटवारा कर दिया ,जिनकी गलतियों से और जिनके क्षुद्र स्वार्थों से हमें एक अखंड भारत के बजाय एक खंडित भारत मिला, उन पर चर्चा करके वक्त जाया करने में अब कोई फायदा नहीं ,फिर भी किसी शायर की यह एक पंक्ति आज भी बार-बार ज़ख्मों को कुरेदा करती है –  ‘लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पायी ‘। 
         शहीद भगतसिंह के विचारों को भी याद करें
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लेकिन आज तो हमें  अमर शहीद भगत सिंह को उनकी पुण्यतिथि  पर याद करते हुए देश और समाज को नयी दिशा  देने वाले उनके क्रांतिकारी विचारों को भी याद करना चाहिए , जिनसे यह पता चलता है कि चौबीस साल से भी कम उम्र में अपने समय के इस युवा-ह्रदय सम्राट ने क्रांतिकारी –आन्दोलनों में भूमिगत जीवन जीते हुए और जेल की सलाखों के पीछे भी हर तरह के तनावपूर्ण माहौल में धैर्य के साथ विभिन्न विषयों की किताबों का कितना गहरा अध्ययन किया और अपनी जिंदगी के आख़िरी लम्हों तक जनता को नए विचारों की नयी रौशनी देने की लगातार कोशिश की । उनका लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ ' हमारी दुनिया में 'ईश्वर ' के काल्पनिक अस्तित्व को लेकर उनकी क्रांतिकारी जिज्ञासाओं को प्रकट करता है। 
       
      बहरों को सुनाने ऊँची आवाज़ 
          की जरूरत होती है !
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   अंग्रेज –हुकूमत भारत की आज़ादी के आंदोलन की लगातार अनदेखी कर रही थी. दमन और दबाव का हर तरीका वह अपना रही थी और जनता की आवाज़ को  उसने जान-बूझ कर अनसुना कर दिया था. ऐसे में उस बधिर विदेशी शासक के कानों तक देशवासियों की आवाज पहुंचाने के लिए 08 अप्रेल 1929 को भगत सिंह ने दिल्ली केन्द्रीय असेम्बली में दो बम फेंके उनके सहयोगी बटुकेश्वर दत्त ने उसी वक्त असेम्बली  में भगत सिंह द्वारा लिखित पर्चा गिराया , जिसमे अंग्रेज –सरकार को हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना की तरफ से साफ़ शब्दों में यह चेतावनी दी गयी थी कि बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की ज़रूरत होती है  ।
  
   दमनकारी कानूनों के ख़िलाफ़ 
  असेम्बली में किया  हल्का बम विस्फोट
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 आज़ादी के जन-आंदोलन की ओर ब्रिटिश –सरकार का ध्यान आकर्षित करने के साथ-साथ उस विदेशी –हुकूमत के सार्वजनिक-सुरक्षा विधेयक, औद्योगिक  विवाद विधेयक और अखबारों की आजादी पर अंकुश लगाने वाले दमनकारी  क़ानून जैसे जन-विरोधी कदमों का विरोध करना भी उनका उद्देश्य था , यह उस पर्चे से स्पष्ट हुआ.  उन्होंने असेम्बली में बहुत सोच-समझ कर इतनी कम शक्ति का बम फेंका , जिससे सिर्फ एक खाली बेंच को मामूली नुकसान पहुंचा और केवल छह लोग मामूली घायल हुए । यह हल्का बम विस्फोट केवल प्रतीकात्मक था। 
     . भगत सिंह का इरादा किसी  को गंभीर चोट पहुंचाना या फिर किसी की ह्त्या करना नहीं था , बल्कि वे चाहते थे कि इस हल्के धमाके के जरिए अंग्रेज सरकार के बहरे कानों तक जन-भावनाओं की अनुगूंज  तुरंत पहुँच जाए . ध्यान देने वाली एक बात यह भी है कि बम फेंकने के बाद भगत और बटुकेश्वर ने हिम्मत का परिचय देते हुए तुरंत अपनी गिरफ्तारी भी दे दी . इससे ही उनके नेक इरादे और निर्मल ह्रदय का पता चलता है.फिर भी अंग्रेजों ने इसे अपनी सरकार के खिलाफ एक युद्ध माना और उन पर राज-द्रोह का मुकदमा चलाया । 
   भगत सिंह की उम्र उस वक्त सिर्फ बाईस साल थी , जब उन्होंने  भारत माता की मुक्ति के लिए अपने क्रांतिकारी मिशन के तहत अंग्रेजों की विधान सभा में जन-भावनाओं का धमाका किया था । जेल की काल-कोठरी में भी भगत सिंह अपने क्रांतिकारी –चिंतन में लगे रहे ।
           हमें गोली से उड़ा दिया जाए !
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उन्होंने अपने साथियों –राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी पर लटकाए जाने के महज तीन दिन पहले पंजाब के गवर्नर को एक लंबा पत्र लिख कर साफ़ शब्दों में कहा –हमें फाँसी  देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाए। 
              
           अंतिम युद्ध निर्णायक होगा 
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पत्र में  तीनों क्रांतिकारियों ने लिखा था ---हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी ,जब तक कि शक्तिशाली लोगों ने भारत की जनता और मेहनतकश मजदूरों की आमदनी के साधनों पर एकाधिकार कर रखा है । चाहे वे अंग्रेज-पूंजीपति हों या भारतीय पूंजीपति... ! हो सकता है कि यह लड़ाई विभिन्न दशाओं में अलग-अलग स्वरुप धारण करते हुए चले.. निकट भविष्य में अंतिम युद्ध लड़ा जाएगा ,जो निर्णायक होगा । 

साम्राज्यवाद और पूंजीवाद कुछ दिनों के मेहमान 
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साम्राज्यवाद और पूंजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं.  यही वह लड़ाई है ,जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है और हमें इस पर गर्व है .इस युद्ध को न तो हमने शुरू किया है और न ही यह हमारे जीवन के साथ खत्म होगा .हम आपसे किसी दया की विनती नहीं करते ...हमें युद्ध-बंदी मान कर फांसी  देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाए.  अपने देश के लिए मर मिटने की ऐसी चाहत देख कर  भगत और उनके साथियों के क्रांतिकारी ज़ज्बे को सलाम करने की इच्छा भला किस देश-भक्त को नहीं होगी ?
                   इंकलाब यानी प्रगति के लिए 
                   परिवर्तन की भावना 
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  समाज –नीति, राजनीति ,राष्ट्र-नीति और अर्थ-नीति सहित मानव जीवन के हर पहलू का भगत सिंह ने गहरा अध्ययन किया था  ,जो उनके वैचारिक आलेखों में साफ़ झलकता है .इन्कलाब जिंदाबाद के विचारोत्तेजक नारे को जन-जन की आवाज़ बना देने वाले भगत सिंह ने  अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ 22 दिसंबर 1929 को’माडर्न-रिव्यू’ नामक पत्रिका के संपादक श्री रामानंद चट्टोपाध्याय को लिखे पत्र में यह स्पष्ट किया था कि इन्कलाब जिंदाबाद क्या है ? 
     उन्होंने इस पत्र में बहुत साफ़ शब्दों में लिखा -  इस वाक्य में इन्कलाब (क्रांति ) शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना और आकांक्षा है । लोग आम-तौर पर जीवन की परम्परागत दशाओं से चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से कांपने लगते  हैं ।  यही एक अकर्मण्यता की भावना है , जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जाग्रत करने की ज़रूरत है . क्रांति की इस भावना से मानव-समाज की आत्मा स्थायी रूप से जुड़ी रहनी चाहिए. यह भी ज़रूरी है कि पुरानी व्यवस्था हमेशा न रहे और वह नयी व्यवस्था के लिए जगह खाली करती रहे .ताकि एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके . यही हमारा अभिप्राय है ,जिसे दिल में रख कर हम ‘इन्कलाब जिंदाबाद ‘ का नारा बुलंद करते हैं . 
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        छुआछूत की समस्या पर भगतसिंह 
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 तत्कालीन भारत की छुआ-छूत जैसी गंभीर सामाजिक –समस्या पर भी भगत सिंह ने गंभीर चिंतन के बाद एक आलेख लिखा ,जिसे उन्होंने ‘विद्रोही’ के नाम से ‘किरती’ नामक पत्रिका के जून 1928 के अंक में प्रकाशित कराया . अछूत –समस्या पर अपने विचार उन्होंने इसमें कुछ इस तरह व्यक्त किए- 
      ‘ हमारे देश जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश में नहीं हुए ।  यहाँ अजब-अजब सवाल उठते रहते हैं । एक अहम सवाल अछूत-समस्या का है . तीस करोड की आबादी के देश में जो छह करोड लोग अछूत कहलाते हैं , उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा ! मंदिरों में उनके प्रवेश से देवता नाराज़ हो जाएंगे, अगर वे किसी कुएं से पानी निकालेंगे ,तो वह कुआँ अपवित्र हो जाएगा ! ऐसे सवाल बीसवीं सदी में हो रहे हैं , जिन्हें सुनकर शर्म आती है. ‘ भगत सिंह ने यह आलेख अपनी उम्र के महज़ इक्कीसवें साल में लिखा था । इतनी कम उम्र में यह उनकी वैचारिक परिपक्वता का एक अनोखा उदाहरण है  ।      भगतसिंह वर्ष 1917 की महान रूसी क्रांति के नायक लेनिन के विचारों से  भी काफी प्रभावित थे। कहा जाता है कि अपनी फाँसी के कुछ घंटे पहले तक वे जेल में  लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे।
          
        झांसी की रानी की शहादत 
          भी मात्र 23 की उम्र में 
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         देश की आज़ादी का और एक समता मूलक समाज का जो सपना भगत सिंह ने देखा और जिसके लिए उन्होंने कठिन संघर्ष किया , उसके साकार होने के सोलह साल पहले ही वे अपनी कुर्बानी देकर देश और दुनिया से चले गए. यह भी एक ऐतिहासिक संयोग है कि सन 1857  के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की महान योद्धा झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की शहादत भी महज तेईस साल की उम्र में हुई और इस घटना के करीब चौहत्तर साल बाद जब सन 1931 में भगत सिंह वतन की आज़ादी के लिए फांसी के फंदे पर अपने जीवन की आहुति दे रहे थे , तब उनकी उम्र भी करीब-करीब उतनी ही थी । उनके दोनों साथी सुखदेव और राजगुरु भी इसी हल्की उम्र के आस -पास थे।
    क्या हमें अपनी आज की पीढ़ी में इतनी कम उम्र का ऐसा कोई नौजवान मिलेगा ,जो आज़ादी , लोकतंत्र और  समाजवाद जैसे गंभीर विषयों के साथ-साथ देश की अन्य ज्वलंत समस्याओं पर व्यापक सोच के साथ इतना कुछ लिख चुका हो ,जो आने वाली कई पीढ़ियों तक चर्चा का विषय बन सके ? 
  क्या अपने वतन की आज़ादी और अपने लोकतंत्र की रक्षा के लिए भगत सिंह के बताए मार्ग पर चलने का हौसला हमारे दिलों में है ?
       -- स्वराज करुण
    (फोटो : इंटरनेट से साभार )

Tuesday, March 22, 2022

भावी पीढ़ियों के लिए बचाइए नदियों और तालाबों को

(आलेख : स्वराज करुण )
 जल और वन मिलकर ही न सिर्फ़ जीवन का निर्माण करते हैं ,बल्कि उसकी रक्षा भी करते हैं। थोड़ा समय निकाल कर हमें अपने आस पास के तमाम जल स्रोतों के संरक्षण और उनकी शुद्धता के बारे में सोचना चाहिए। स्थानीय तालाबों और नदी --नालों की हालत पर विचार करना चाहिए। 
    अच्छी सेहत के लिए अच्छी हवा के साथ अच्छा यानी साफ पानी भी जरूरी है। आज की दुनिया में कई बीमारियाँ वायु प्रदूषण और जल -प्रदूषण के कारण भी हो रही हैं। जब हमारे नदी -नाले प्रदूषित होंगे तो समुद्रों को प्रदूषित होने से भला कौन बचा पाएगा ? उनका पानी तो आखिर इन्हीं समुद्रों में ही जाता है।  आधुनिक जीवन शैली का अभिन्न अंग बन चुके प्लास्टिक और पॉलीथिन से भी जल प्रदूषण का कारण बन रहे है।  अब समुद्रों के भीतर भी प्लास्टिक और पॉलीथिन के पहाड़  खड़े होने लगे हैं। देर सबेर इसका भी खमियाजा हमें भुगतना ही पड़ेगा ।

                  

     कई नदियाँ ,कई बरसाती नाले और कई तालाब प्रदूषण के कारण मरणासन्न होते जा रहे हैं। भूमिगत जल स्तर के लगातार घटते चले जाने का भी यह एक मुख्य कारण है। नलकूपों और हैंडपम्पों के इस आधुनिक  युग में  कुओं को तो हम लगभग भूल ही चुके हैं ,जबकि भू -जल स्तर को बनाए और बचाए रखने में कुओं का भी बड़ा योगदान रहता था। 
      
विलुप्त हो रही सामूहिक श्रमदान की संस्कृति
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जल स्रोतों की साफ -सफाई के लिए पहले सामूहिक श्रमदान भी होता था। लेकिन जन -सहयोग पर आधारित श्रमदान की वह शानदार संस्कृति भी अब लगभग विलुप्त -सी हो गयी है और लगता है कि सब कुछ सरकारों के भरोसे छोड़ दिया गया है । सरकारी मदद एक सीमा तक हो सकती है ,लेकिन क्या नागरिक होने के नाते हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती ? हमें अपनी न सही ,लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए भी तो सोचना चाहिए। हम उनके जीवन के लिए कैसा जल स्रोत छोड़कर जाएंगे ? बारिश के पानी को सहेजने के लिए भी जल स्रोतों को स्वच्छ बनाए रखना जरूरी है।          नदी -नाले और तालाब हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं । कई तरह के महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान इन्हीं के किनारे पर आयोजित होते हैं। कई देवी देवताओं के मंदिर भी इन्हीं के तट पर स्थित होते हैं।  
  भक्त लोग धार्मिक मामलों में जितने संवेदनशील बनते हैं , तथाकथित धर्म रक्षा के लिए  मरने -मारने पर उतारू हो जाते हैं ,उतनी संवेदनशीलता  अपने इन  पवित्र स्थलों के आस -पास के जल स्रोतों की साफ -सफाई के लिए क्यों नहीं दिखाते ? कई तालाबों के  आस पास रहने वाले लोग ही उनके किनारे  अपने घरों का कचरा डालते रहते हैं। 
    
 तालाबों  की छाती पर 
 सीमेंट -कांक्रीट के पहाड़ 
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पिछले कुछ वर्षों में देश के  कई शहरों में कुछ  अदृश्य ताकतों  ने  बड़ी चालाकी से पुराने और ऐतिहासिक
तालाबों की भूमि पर कचरा डाल डाल कर उन्हें पटवा  दिया  और मौका देखकर उनमें शॉपिंग कॉम्प्लेक्स या आवासीय   कॉलोनियाँ भी खड़ी कर दी ! जब तालाबों की छाती पर मानव निर्मित सीमेंट -कांक्रीट के पहाड़ खड़े हो जाएंगे ,तब ऐसे में शहरों का भू -जल स्तर भला कैसे बढ पाएगा ?

     क्या से क्या हो गए हमारे नदी -तालाब ?
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     जरा सोचिए , पहले हमारे गाँवों और शहरों में  कितने तालाब थे और आज कितने हैं ? क्या से क्या हो गए हमारे नदी -तालाब ?कई कस्बों और शहरों में तो बसाहटों की  नालियों का अंतिम छोर  तालाबों से जोड़कर पूरा गंदा पानी उनमें डाल दिया जाता है । कई शहरों की नालियाँ भी नदियों से   जोड़कर शहर भर का गंदा पानी उनमें बहा दिया जाता है। गंगा यमुना जैसी पवित्र नदियों के किनारे संचालित कई उद्योगों का गंदा पानी उनमें मिलने की वजह से ये नदियाँ भी जल प्रदूषण की बीमारी से पीड़ित हैं। हालांकि उन्हें प्रदूषण से बचाने के प्रयास भी हो रहे हैं।  लेकिन कुछ एक शहरों को छोड़कर अधिकांश इलाकों में ठोस पहल नज़र नहीं आ रही है। 
         
       इंदौर में हुई अनुकरणीय पहल :
        दो नदियों को नया जीवन 
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कुछ शहरों में इसके लिए जरूर सराहनीय और अनुकरणीय पहल भी हो रही है।जैसे मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में कान्ह और सरस्वती नामक दो छोटी नदियों को प्रदूषण से मुक्त कर उन्हें नया जीवन दिया गया है। इस बड़ी कामयाबी की कहानी मुझे   दैनिक नईदुनिया में 15 मार्च 2022 में पढ़ने को मिली।
कान्ह की लम्बाई 21 किलोमीटर और सरस्वती की 15 किलोमीटर है।  इंदौर शहर के 5500 बड़े और 1800 छोटे तथा घरेलू नालों का गंदा पानी इन दोनों नदियों में बहाया जाता था। इसके फलस्वरूप दोनों मरणासन्न हो चुकी थीं। इनसे जुड़े शहरी गंदे पानी के नालों को बंद कर दिया गया ताकि नदियों को स्वच्छ बनाया जा सके। 
    गंदे पानी के उपचार के लिए उसे 7 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांटों में भेजकर उसकी सफाई की जाती है और   इस स्वच्छ जल को दोनों नदियों में प्रवाहित किया जाता है। सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांटों में उपचारित 312 एमएलडी पानी हर रोज दोनों नदियों में पहुँचता है। सरस्वती नदी वर्ष 1970 तक एकदम स्वच्छ रहती थी । अब वह अपने उसी पुराने निर्मल स्वरूप में लौट आयी है। इसी तरह 21 किलोमीटर लम्बी कान्ह नदी का अधिकांश हिस्सा भी स्वच्छ हो चुका है । इसके लिए इंदौर नगर निगम की सराहना की जानी चाहिए। वैसे भी स्वच्छ भारत अभियान के तहत इंदौर लगातार देश का सर्वाधिक साफ -सुथरा शहर बना हुआ है । इसके लिए उसे कई बार राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं। इस बार केन्द्र ने उसे इन नदियों को प्रदूषण मुक्त करने शहरी आबादी को स्वच्छ जल आपूर्ति के लिए भी वाटर -प्लस नगर निगम के रूप में  सम्मानित किया है।
       उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने देश के प्रमुख शहरों  को जल प्रदूषण से बचाने के लिए अमृत योजना की शुरुआत की है।इस योजना के तहत नगर निगमों को केन्द्र  से आर्थिक सहायता भी मिलती है। इंदौर नगर निगम ने अपनी दोनों नदियों के पुनर्जीवन के लिए इस योजना से भी राशि प्राप्त की।  महानगर के गंदे पानी की निकासी व्यवस्था के बेहतर बनाने के लिए अमृत मिशन के तहत 220 करोड़ रुपए खर्च कर सीवरेज नेटवर्क का विस्तार किया गया और 7 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए गए। जल स्रोतों को बचाने और स्वच्छ बनाने की दिशा में इंदौर वालों का यह निश्चित रूप से प्रेरणादायक है।बशर्ते आज विश्व जल दिवस के मौके पर  हम सब उनसे प्रेरणा ल सकें।
     -- स्वराज करुण

Monday, March 21, 2022

कटते जंगल : उजड़ती दुनिया


(आलेख : स्वराज करुण)

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  धरती पर जीवन भी तब तक है जब तक हरे -भरे वन हैं। लेकिन आधुनिकता के इस दौर में तीव्र शहरीकरण और बेतहाशा और बेतरतीब औद्योगिक विकास की वजह से  जंगल कट रहे हैं और हमारी नैसर्गिक दुनिया उजड़ रही है। उसके बदले जो दुनिया बन रही है ,वह प्राकृतिक नहीं ,बनावटी है। फलस्वरूप ग्लोबल वार्मिंग की समस्या हमारे सामने है। हर साल 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाया जाता है । इस मौके पर वनों की रक्षा और उनके विस्तार में आ रही समस्याओं और चुनौतियों के बारे में  गंभीरता से विचार करना बहुत जरूरी है। वनों का हरा -भरा नैसर्गिक सौन्दर्य सबको आकर्षित करता है , लेकिन सवाल यह है कि उनकी सुरक्षा की चिन्ता कितने लोग करते हैं ?  इन दिनों वसंत के इस फागुनी मौसम में सड़कों के किनारे के जंगलों में किंशुक यानी पलाश (टेसू )के खिलते लाल सुर्ख़ फूल  हर आने जाने वाले के मन को लुभा रहे हैं। 
                     

    लेकिन ऐसे लुभावने दृश्य अब कहीं -कहीं पर ही बाकी रह गए हैं। सड़कों के चौड़ीकरण और नई सड़कों के निर्माण के लिए उनके दोनों किनारों के प्राकृतिक पेड़ों की कटाई करनी पड़ती है। इस वजह से बड़ी संख्या में  पलाश जैसे कई उपयोगी वृक्ष कट जाते हैं। उनके स्थान पर उन्हीं सड़कों के किनारे नये पेड़ लगाने के लिए सुरक्षित तरीके से सघन पौध रोपण किया जाना चाहिए। वरना पलाश जैसे कई  ख़ूबसूरत वृक्षों की प्रजातियाँ विलुप्त हो जाएंगी। यह दृश्य छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले के अंतर्गत महासमुन्द -बागबाहरा मार्ग का है।
                


            वर्तमान में कहीं बेमौसम बारिश तो कभी मानसून की बेरुख़ी सम्पूर्ण विश्व को परेशान कर रही है ।कहीं बड़ी -बड़ी फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलते धुएँ से हवा दूषित हो रही है तो उनके जहरीले पानी से नदियाँ गंभीर रूप से बीमार हो रही हैं।  कहीं परमाणु परीक्षणों से होने वाले विषैले विकिरणों  से और कहीं दुनिया के कुछ देशों में चल रही  भयंकर लड़ाइयों  में बमों और मिसाइलों के पागलपन भरे इस्तेमाल से भी धरती का वायुमंडल  प्रदूषित हो रहा है। इन सब प्रदूषणों का दुष्प्रभाव दुनिया के हरे -भरे वनों पर भी पड़ रहा है। इंसानी आबादी बढ़ रही है। इसके फलस्वरूप  मानवीय जरूरतों के लिए वनों पर भी इस आबादी का दबाव बढ़ रहा है।
    वनों की अंधाधुंध कटाई से वन्य प्राणियों का जीवन भी संकट में पड़ता जा रहा है।  उनके लिए चारे और पानी का संकट बढ़ रहा है। इसे हम अपने देश में  भी महसूस कर सकते हैं। प्राकृतिक वनों के असंतुलित दोहन से वन्य जीवों का वहाँ रहना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। इस वजह से वो  भोजन और पानी की तलाश में गाँवों और शहरों तक पहुँच रहे हैं।  देश के कई इलाकों में हाथियों ,भालुओं और बंदरों का मानव -बस्तियों में आकर फसलों और कच्चे मकानों को नुकसान पहुँचाना चिन्ताजनक है। कई बार  जंगली हाथियों के झुण्ड ग्रामीणों की जान के दुश्मन बन जाते हैं। अगर इन इलाकों में सघन वन होते तो शायद इन जंगली जानवरों को मनुष्यों की बसाहटों में ख़तरनाक ढंग से दस्तक नहीं देनी पड़ती।  मानव आबादी वाले इलाकों में लोग अब  बंदरों का उत्पात झेलने के भी अभ्यस्त हो चुके हैं।  
        स्वच्छ हवा , स्वच्छ पानी और  बहुमूल्य वनौषधियों सहित  वनों के हम पर ढेरों एहसान हैं।  इसलिए वनों को उजाड़ कर हमें एहसानफरामोश नहीं बनना चाहिए । वनौषधियों की बात चली तो हमें सोचना चाहिए कि कोरोना सहित कई बीमारियों से बचाव के लिए भी वनों में दवाइयों की संभावनाओं को खँगाला जा सकता है । आयुर्वेद ,होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में जिन दवाइयों का इस्तेमाल होता है , उनका मुख्य स्रोत कई तरह के पेड़ -पौधे ही होते हैं।वनों का संरक्षण और विस्तार होगा तो इन पद्धतियों के  तहत चिकित्सा  अनुसंधान  और दवाइयों के उत्पादन के लिए भी एक अच्छा वातावरण बनेगा । वन क्षेत्रों के आस -पास के गाँवों में रहने वाले लोग शहरी इलाकों के लोगों की तुलना में अधिक स्वस्थ रहते हैं। यह भी चिकित्सा वैज्ञानिकों के लिए रिसर्च का विषय हो सकता है।
    आपने ध्यान दिया होगा कि देश के कई  राज्यों में हर साल    गर्मी के मौसम में वनों में आग लग जाती है। कई बार तो यह आग पहाड़ियों में भी धधकने लगती है।कभी वनों के रास्ते गुजरते मुसाफिरों द्वारा बीड़ी ,सिगरेट के अधजले टुकड़े लापरवाही से फेंक देने के कारण और कभी  महुआ बीनने वाले ग्रामीणों द्वारा भालू आदि वन्य जीवों को दूर रखने के लिए सूखे पत्तों को बेतरतीबी से जलाने के कारण वनों में आग फैल जाती  है। कभी जंगलों की अवैध कटाई करने वाले लकड़ी तस्कर जानबूझकर वनों में आग सुलगा देते हैं।   कभी सड़क निर्माण सहित कई अन्य विकास परियोजनाओं के लिए और उद्योगों के लिए आधिकारिक रूप से वनों की कटाई की जाती है।  जितने वन काटे जाते हैं ,उनकी भरपाई के लिए राष्ट्रीय स्तर पर क्षति पूर्ति पौध रोपण की भी योजना है ,लेकिन काटे गए चालीस -पचास साल और सौ -सौ साल पुराने पेड़ों की तुलना में  भरपाई के लिए जो पौधे लगाए जाते हैं ,उनके वृक्ष बनने में भी कई साल लग जाते हैं। इसके अलावा इन पौधों की अगर बेहतर देखभाल नहीं हुई तो ये असमय ही मौत का शिकार हो जाते हैं।। 
     हालांकि भारत सरकार सहित सभी राज्य सरकारें वनों की रक्षा और उनके विकास के लिए सजग और सक्रिय रहती हैं। वन संरक्षण के कई अच्छे प्रोजेक्ट भी चल रहे हैं । लेकिन जब तक सबकी भागीदारी नहीं होगी , किसी भी योजना अथवा परियोजना को कोई भी सरकार अकेले नहीं चला सकती । उसमें जनता का सहयोग भी जरूरी होता है।।
अक्सर देखा जाता है कि वन विभाग हर साल  बारिश के मौसम में वन महोत्सवों का आयोजन करके आम जनता और स्कूल -कॉलेजों के विद्यार्थियों की भागीदारी से करोड़ों पौधे लगवाता है ,लेकिन नियमित देखरेख नहीं होने के कारण ये पौधे कुम्हलाकर धरती में समा जाते हैं  या फिर लावारिस गाय -बैलों और बकरे -बकरियों का भोजन बन जाते हैं।  
भारत सरकार की  संयुक्त वन प्रबंधन योजना भी एक अच्छी योजना है। इसके तहत देश के सभी प्रांतों में राज्य सरकारों ने ग्रामीणों की भागीदारी से वन प्रबंध समितियों का गठन किया है। इनमें लाखों -करोड़ों ग्रामीण जन सदस्य के रूप में शामिल हैं।  इन समितियों पर भी वनों की देखभाल की ज़िम्मेदारी है। सरकार भी इनकी मदद करती है। जहाँ ये समितियाँ जागरूक हैं,वहाँ वनों का प्रबंधन बेहतर ढंग से हो रहा है ।कई इलाकों की वन समितियों में  वनौषधियों का भी उत्पादन हो रहा है 
  विगत कुछ वर्षों में अमेरिका ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और ब्राजील के प्राकृतिक वनों  में आग से हज़ारों वर्ग किलोमीटर के दायरे में वनों को  भयानक नुकसान हो चुका है ।  पता नहीं किसकी लापरवाही से यह  नुकसान हुआ ? बहरहाल , उम्मीद की जानी चाहिए कि  दुनिया के सभी देश इस बारे में गंभीरता से विचार करेंगे ,सबके प्रयासों से धरती पर वनों का विनाश रुकेगा  और  हमारे वनों , वन्य प्राणियों और  हम मनुष्यों का  जीवन  फिर से हरा -भरा होगा ।
     --- स्वराज करुण
      (पत्रकार एवं ब्लॉगर )

Saturday, February 12, 2022

कौन कुचल रहा है हमारी बेटियों के सपनों को ?


      (आलेख : स्वराज करुण )
जब  हमारी बेटियाँ स्कूली यूनिफॉर्म में मुस्कुराती हुई  साइकिलों से स्कूल आती - जाती हैं,तब देश की सड़कों पर यह दृश्य कितना मनभावन लगता है ! उन्हें देखकर गर्व की अनुभूति होती है। ऐसा आभास होता है मानो सभी धर्मों की हमारी ये बेटियाँ  अपने सपनों की मंजिलों को पाने के लिए दौड़ रही हैं। उनकी आँखों में तैरते सपनों को महसूस कीजिए । इन्हीं में से कोई डॉक्टर ,कोई इंजीनियर ,कोई  वैज्ञानिक ,कोई प्रोफेसर ,कोई अध्यापिका बनेगी ,समाज की सेवा करेंगी।  समाज का नेतृत्व करेंगी  । कर भी रही हैं। 

   कहने का मतलब भारत की बेटियाँ  जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ेंगी। बढ़ भी रही हैं। देश के निर्माण में सहभागी बनेंगी । इन्हें हिजाब और भगवा दुपट्टे के  विवाद में झोंककर इनके सपनों को मत कुचलो।   यह अच्छी बात है कि देश के कई राज्यों की सरकारें वहाँ की बेटियों को स्कूल आने -जाने के लिए निःशुल्क साइकिल और यूनिफॉर्म भी दे रही है ,ताकि पढ़ लिखकर वो अपना भविष्य गढ़ सकें। बेटियों के लिए सरकारों की यह सदाशयता ,सहृदयता सराहनीय है।

         

     लेकिन कर्नाटक जैसे राज्य में कुछ लोग उनके मासूम सपनों पर सामाजिक वैमनस्यता का ज़हरीला रंग डालकर उनके दिलों में नफ़रत का विष घोल रहे हैं ? उन्हें साइकिलों से स्कूल आती जाती बेटियों के काफिले का ऐसा मनोरम दृश्य देखकर क्यों जलन हो रही है ?ऐसे अराजक तत्वों को चिन्हित कर उनके ख़िलाफ़ कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
    ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि यह विवाद कर्नाटक सहित कुछ अन्य राज्यों में भी फैला दिया गया है। ऐसे जिलों में वहाँ के प्रशासन को तुरंत शांति समितियों की बैठक बुलाकर सभी धर्मों के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा करनी चाहिए ।हर जिले में सरकारों के निर्देशों के अनुसार जिला और अनुमंडल स्तर पर स्थायी रूप से शांति समितियां होती हैं ,जिनमें सभी समाजों और धर्मो के प्रमुख लोग सदस्य के रूप में शामिल रहते हैं।
    त्यौहारों के समय प्रशासन द्वारा इनकी बैठकें बुलाई जाती हैं । कर्नाटक में और अन्य राज्यों में जहाँ हिजाब विवाद चल रहा है ,शांति समितियों की बैठकें हुई हैं या नहीं ,यह मुझे नहीं पता ।अगर नहीं हुई हैं तो तत्काल बुलाई जाए,ताकि प्रभावित जिलों में अमन चैन बहाल हो सके।
      जैसे भारत की तीनों सेनाओं  का अपना ड्रेस कोड  होता है ,जैसे हर राज्य की पुलिस की निर्धारित वर्दी होती है ,जैसे  स्कूल कॉलेजों में राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) के कैडेटों का विशेष यूनिफॉर्म होता है , वकीलों ,जजों , डॉक्टरों और नर्सों के भी अपने ड्रेसकोड होते हैं ,ठीक उसी तरह स्कूलों में भी छात्र -छात्राओं के लिए निर्धारित यूनिफॉर्म का रिवाज आज से नहीं ,बल्कि विगत कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। 
     कर्नाटक में कुछ छात्राएं  स्कूल - कॉलेजों में  हिजाब के साथ बुर्का पहनकर आने की जिद्द कर रही हैं ,  उनकी मांग मान ली जाए और बुर्के की आड़ लेकर कोई असामाजिक तत्व स्कूल में घुसकर किसी  आपराधिक घटना को अंजाम देकर फरार हो जाए तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा ? दुनिया के कई देशों में स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे और शरीर को पूरा कव्हर करके आने -जाने की सख़्त मनाही है। वहाँ के लोग ऐसे सरकारी प्रतिबंधों का पालन भी करते हैं। 
   धार्मिक पोशाक आप अपने घरों में या अपने धार्मिक स्थलों में पहनिए ,कौन मना करेगा ?लेकिन सार्वजनिक और सरकारी संस्थाओं और स्कूल -कॉलेजों को तो बख़्श दीजिए । अगर आप उन संस्थाओं से जुड़े हुए हैं तो वहाँ के ड्रेसकोड का पालन कीजिए।
     संस्थाओं के निर्धारित यूनिफॉर्म उन्हें पहनने वालों को एक विशेष पहचान देती हैं  । यह पहचान उनमें परस्पर एकता की भावना बढ़ाती है। अगर कोई सैनिक अपने लिए निर्धारित सैन्य वर्दी न पहनें तो उसे सैनिक के रूप में कौन  पहचानेगा ?इसी तरह शैक्षणिक संस्थाओं में अगर विद्यार्थी वहाँ की निर्धारित पोशाक न पहनें तो कौन उन्हें उन संस्थाओं के विद्यार्थी के रूप में देखेगा ? मैं तो इस पक्ष में भी हूँ कि न सिर्फ स्कूलों में ,बल्कि कॉलेजों में भी विद्यार्थियों के लिए ड्रेसकोड अनिवार्य होना चाहिए ,उनके शिक्षकों और वहाँ के कर्मचारियों के लिए भी।( वर्तमान में मेडिकल कॉलेजों के विद्यार्थियों को सफ़ेद ड्रेसकोड में देखा जाता है । अच्छी बात है। ) 
   अभी देश भर में नागरिक सेवाओं से जुड़े सरकारी दफ्तरों में लघु वेतन कर्मचारियों यानी चपरासियों के लिए तो वर्दी निर्धारित है  ,हर दो साल में सरकार की ओर से उनको वर्दी  मिलती भी है और ड्यूटी के समय  नियमित रूप से नहीं पहनने पर डाँट फटकार भी सुननी पड़ती है ,लेकिन उन्हीं दफ्तरों में अफसरों के लिए कोई ड्रेसकोड नहीं है।  इसलिए  मेरा एक सुझाव यह भी है कि केन्द्रीय कर्मचारियों और अधिकारियों समेत देश के सभी राज्यों के कर्मचारियों और अफसरों के लिए भी यूनिफॉर्म ड्रेसकोड अनिवार्य कर दिया जाए। अपनी संस्थाओं की पोशाक पहनकर  लोगों को गर्व महसूस करना चाहिए । इसे अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए।
          -- स्वराज करुण