Wednesday, July 29, 2020

(कविता ) शहर में बारिश

          -- स्वराज करुण 


                       काले ,घुंघराले बादलों 
                       के बीच सूर्योदय और सूर्यास्त !
                       उनकी रिमझिम बरसती
                       जल बूंदों की सरसराहट से भरा 
                       एक भीगा हुआ दिन ! 
                       जब दोपहर को भी लगता है जैसे
                      अभी तो सुबह के छह बजे हैं !
                      शहर की सीमेंट -कांक्रीट वाली
                      उबड़ -खाबड़ सड़कों से टकरा कर
                       टपकती ,उछलती बूंदें भी नहीं बुझा पातीं
                       धरती की प्यास !
                       सोख लेता है उन्हें 
                       वन ,टू ,थ्री ,फोर बी.एच.के.वाला 
                       पथरीला बेजान -सा जंगल , 
                       या फिर पी जाते हैं  बहुमंजिले फ्लैट्स के
                       गगनचुंबी पहाड़ !
                      कभी बहुत ज़्यादा पड़ी बौछारें 
                     तो निचली बस्तियों की 
                     बजबजाती नालियों से सैलाब बनकर 
                    ग़रीबों की झुग्गियों में 
                    घुस जाती हैं आषाढ़ ,सावन और 
                   भादो  के काले ,घुंघराले बादलों की बूंदें 
                   और कर देती हैं उनका जीना मुहाल !
                   झुग्गियाँ  पीढ़ी -दर -पीढ़ी  देख रही हैं -
                   इस तरह होती है शहर में बारिश 
                    बहुत कुछ बदल गया देश में ,
                   लेकिन नहीं बदला तो 
                   शहरों में होने वाली 
                   बारिश का यह सालाना मंज़र !

               ---स्वराज करुण 
              
     
   
   
  


  

Tuesday, July 28, 2020

(कविता ) कहीं न कहीं तो होगा ऐसा कोई देश

कहीं न कहीं  तो होगा कोई  ऐसा देश !
       ****
इस धरती पर नहीं तो
इस ब्रम्हांड में
और इस  ब्रम्हांड में नहीं तो
सुदूर आकाश गंगाओं में
कहीं न कहीं  तो होगा 
ऐसा देश ,
जहाँ इंसानों को सिर्फ़ और सिर्फ
इंसान समझा जाता हो ,
हिन्दू या मुसलमान नहीं ,
सिक्ख या ईसाई नहीं !
जहाँ न होते हों
मन्दिर , मस्ज़िद के झगड़े ,
किसी बीमार बच्चे का लाचार पिता
अस्पताल के दरवाज़े पर जहाँ
मज़बूरी में अपना माथा न रगड़े !
कहीं तो होगा कोई ऐसा देश
जहाँ मुट्ठी भर लोग खुद को
न समझें मुल्क का मालिक
और विशाल जन समूह को
अपना नौकर !
जहाँ कोई किसी को
न मारे अपने अहंकार की ठोकर !
जहाँ इंसान की हैसियत उसके
ओहदे से न तौली जाती हो ,
जहाँ धर्म , जाति और दौलत के नाम पर
ओहदों की नीलामी न बोली जाती हो !
जहाँ न हो खदानों की खतरनाक धूल,
जहाँ खिलते हों खेतों में
फसलों के रंगबिरंगे फूल !
मैं देख रहा हूँ ऐसे किसी अपने
वतन का सपना
जहाँ हम एक -दूसरे को
कह सकें अपना !
         - स्वराज करुण
   
      

Saturday, July 25, 2020

महाग्रंथ 'गांधी मीमांसा ' के भूले -बिसरे रचनाकार पं. रामदयाल तिवारी


               
                    आलेख : स्वराज करुण 

"राष्ट्र अपना मुख साहित्य के दर्पण में ही देखता है। साहित्य राष्ट्र के दिल का खजाना है।"  - ये पंक्तियां छत्तीसगढ़ के महान लेखक और चिन्तक स्वर्गीय पण्डित रामदयाल तिवारी के हैं ,जो उन्होंने वर्ष 1930 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन में प्रमुख वक्ता की आसंदी से व्यक्त किए थे।
     महात्मा गांधी के जीवन काल में उनके सम्पूर्ण जीवन -दर्शन की गहन समीक्षा करके हिन्दी में  'गांधी मीमांसा ' और अंग्रेजी में 'गांधीज्म एक्सरेड ' जैसे विशाल ग्रंथों की रचना करने वाले तिवारीजी का जन्म 23 जुलाई 1892 को छत्तीसगढ़ की वर्तमान राजधानी रायपुर में हुआ था और निधन भी अपने गृह नगर रायपुर में हुआ। यहाँ के दाऊ कल्याण सिंह अस्पताल में 21 अगस्त 1942 को जब उनका देहावसान हुआ ,उस समय वह सिर्फ़ 50 वर्ष के थे। लेकिन इतनी अल्पायु में ही वह देश के हिन्दी जगत को अपनी प्रकाशित ,अप्रकाशित रचनाओं की विशाल और  अनमोल धरोहर सौंप गए। उन्हें हिन्दी साहित्य के' समर्थ समालोचक'  जैसी अघोषित उपाधि उस जमाने की लोकप्रिय पत्रिका 'माधुरी ' से मिली थी।
       इस महान  लेखक के जन्म स्थान रायपुर में उनसे जुड़ी एक मात्र स्मृति 'आर .डी .तिवारी शासकीय स्कूल " के नाम से शेष रह गयी है। उनके सुपुत्र लखनलाल तिवारी वर्ष 1973 में रायपुर छोड़कर मुम्बई चले गए । अब रायपुर में उनके परिवार का कोई नहीं रहता । रामदयाल तिवारी अब सिर्फ  एक भूले -बिसरे लेखक का नाम है।  हरि ठाकुर और उनके सुपुत्र आशीष सिंह के अलावा शायद विगत कई दशकों में उन्हें किसी ने शिद्दत से  याद किया हो ,मुझे याद नहीं! हरि ठाकुर  तो 3 दिसम्बर 2001 को दुनिया छोड़ गए ,लेकिन उन्होंने अपने विशाल  ग्रंथ 'छत्तीसगढ़  गौरव गाथा ' में  छत्तीसगढ़ की महान विभूतियों पर अपनी लेख माला में रामदयाल तिवारी पर भी एक विस्तृत लेख लिखा है। यह ग्रंथ ठाकुर साहब के।मरणोपरांत वर्ष 2003 में प्रकाशित हुआ ।इसके अलावा आशीष सिंह ने बड़ी मेहनत से वर्ष 2012 में तिवारी जी के चर्चित महा ग्रंथ 'गांधी मीमांसा" का एक संक्षिप्त संस्करण प्रकाशित करवाया और 2017 में उनकी 125 वीं जयंती पर स्मारिका प्रकाशित की।
     हरि ठाकुर लिखते हैं ---   तिवारीजी के पिता रामबगस तिवारी प्राथमिक स्कूल के अध्यापक थे। रामदयाल तिवारी का  बाल्यकाल अत्यंत गरीबी में बीता । ट्यूशन करके वे अपनी फीस और किताबों के लिए  पैसे जुटा पाते थे। गरीबी का यह आलम था कि उन्हें रात्रि में घर के पास लगे म्युनिसिपल के लैम्प पोस्ट के नीचे बैठ कर उसके उजाले में अध्ययन करना पड़ता था। तब कौन जानता था कि म्युनिसिपल के लैम्प पोस्ट के उजाले में पढ़ने वाला बालक एक दिन हिन्दी समालोचना का अत्यंत प्रकाशवान लैम्प पोस्ट बन जाएगा ?
                           

   पण्डित रामदयाल तिवारी ने वर्ष 1911 में  बी.ए. की परीक्षा पास की। वह वकालत की पढ़ाई करना चाहते थे ,लेकिन  उसी वर्ष  उनके पिता का निधनहो जाने पर ।परिवार का दायित्व उनके कंधों पर आ गया। उन्होंने रायगढ़ के स्टेट हाई स्कूल में अध्यापन किया। वेतन से थोड़ी -थोड़ी राशि बचाकर उन्होंने वकालत की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 1915 से रायपुर में वक़ालत का अपना व्यवसाय शुरू किया। यहाँ उन्हें पण्डित माधवराव सप्रे ,ठाकुर प्यारेलाल सिंह और मावली प्रसाद श्रीवास्तव जैसे विद्वान साहित्यिकों का  सानिध्य मिला। उनके लेख हितवाद , मॉडर्न रिव्यू और हिन्दू आदि पत्र -पत्रिकाओं में छपने लगे। हरि ठाकुर के अनुसार  हिन्दी ,अंग्रेजी , संस्कृत , ओड़िया ,बांग्ला , मराठी और उर्दू भाषाओं पर तिवारीजी का समान अधिकार था।वे मूलतः अंग्रेजी के लेखक थे । हिन्दी में लिखना उन्होंने बहुत बाद में आरंभ किया था। वर्ष 1930 के बाद उन्होंने अपना सारा ध्यान हिन्दी लेखन पर केन्द्रित किया।
    वक़ालत के साथ -साथ तिवारीजी रायपुर के सावर्जनिक जीवन में भी सक्रिय रहते  थे। स्वतन्त्रता संग्राम के उस दौर में  यहाँ वर्ष 1930 से 1932 के बीच राष्ट्रीय आंदोलनों में भी तिवारीजी काफी   सक्रिय थे । जून 1930 के अंतिम सप्ताह में आंदोलन के दौरान  ठाकुर प्यारेलाल सिंह और कई अन्य नेताओं को गिरफ़्तार किया गया । इन गिरफ्तारियों के विरोध में हजारों की संख्या में लोगों ने प्रदर्शन किया।। शाम को धारा 144 के बावजूद आम सभा हुई ,जहाँ तिवारीजी ने जनता को सम्बोधित करते हुए अंग्रेज हुकूमत की दमनात्मक कार्रवाई की कड़े शब्दों में निन्दा की। वर्ष 1930 में ही बंदी सत्याग्रहियों के स्वागत के लिए रायपुर रेल्वे स्टेशन पर इकट्ठा हुए हजारों लोगों पर पुलिस ने बेरहमी से  लाठीचार्ज किया , जिसकी जांच के लिए गठित नागरिकों की समिति में तिवारीजी प्रमुख सदस्य थे।उन्होंने नगर में घूम - घूमकर घायलों के बयान लिए ,उनके इलाज का। इंतज़ाम किया और समिति को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। रायपुर में 15 अप्रैल 1930 को आयोजित प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में पण्डित रामदयाल तिवारी ने स्वागताध्यक्ष का दायित्व बखूबी निभाया।
    पण्डित रामदयाल तिवारी ने   सड़क दुर्घटना में घायल होने के बावज़ूद बिस्तर पर बैठ कर महात्मा गाँधी के जीवन -दर्शन की समीक्षा करते हुए  वर्ष 1935 में लगभग 850 पन्नों के विशाल ग्रन्थ गांधी -मीमांसा ' की रचना की थी । आज भले ही वर्तमान पीढ़ी  के स्मृति पटल पर उनकी यादें धुँधली पड़ गयी हों ,लेकिन वर्ष 1941में 36 अध्यायों के  इस महा ग्रंथ  के  प्रकाशित होते ही  छत्तीसगढ़ के ये लगभग अल्प ज्ञात लेखक  देश भर के विद्वानों के बीच चर्चा का केंद्र बन गए थे , क्योंकि हरि ठाकुर के शब्दों में -- "इस ग्रंथ  की रचना के समय गाँधीजी अपनी ख्याति के चरम शिखर पर थे । उनको लेकर लोक -जीवन में अनेक दंतकथाएं प्रचलित थीं । उस समय जो भी लिखा जा रहा था , अधिकांश रचनाएं स्तुति परक थीं ।उनके विचारों को लेकर तर्क -वितर्क करने का साहस किसी नेता या लेखक में नहीं था ।ऐसे समय में तिवारीजी ने 'गांधी-मीमांसा'  की रचना इस दावे के साथ की कि अंध श्रद्धा और अनुदारता ,दोनों से परे होकर विचार करने वाले गांधी साहित्य का निर्माण होने को है। प्रस्तुत ग्रन्थ इस दिशा में किया गया पहला प्रयास है।
     तिवारीजी की 125 वीं जयंती पर 23 जुलाई 2017 को हरि ठाकुर स्मारक संस्थान रायपुर द्वारा आशीष सिंह के सम्पादन में उन पर  केन्द्रित स्मारिका प्रकाशित की गयी थी। स्मारिका के प्रकाशकीय वक्तव्य में आशीष सिंह ने लिखा है - " गांधी मीमांसा महात्मा गांधी के सिद्धांतों ,आदर्शों और कार्यक्रमों का ऐसा विवेचन है ,जिसमें पण्डित रामदयाल तिवारी ने जहाँ एक ओर गांधीजी की दिल खोलकर प्रशंसा की है ,वहीं वे जहाँ कहीं महात्मा जी से असहमत हुए ,बिना भय के अपनी बेबाक राय रखी। गांधी मीमांसा में कुछ स्थानों पर पूरी श्रद्धा और शालीनता के साथ महात्मा गांधी की कटु आलोचना भी है। " आशीष आगे लिखते हैं -" राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को भला कौन नहीं जानता ? पर उन्हें जानने योग्य जिस पण्डित रामदयाल तिवारी ने बनाया ,वे आज अनजान हैं।गुप्तजी की 'साकेत' और 'यशोधरा ' की समालोचना  तिवारी जी ने की थी ,जो 'माधुरी" में प्रकाशित हुई थी। उस समीक्षा ने ही हिन्दी साहित्य जगत का ध्यान गुप्तजी की ओर आकृष्ट किया था।"
  स्मारिका के अपने प्रकाशकीय आलेख में आशीष ने बहुत व्यथित होकर लिखा है -"
  सच में पण्डित रामदयाल तिवारी का समुचित मूल्यांकन आज तक नहीं हो पाया है।इसमें दुर्भाग्य उनका नहीं है।दुर्भाग्य हमारा है। हमने उनके लिए ऐसा कुछ भी नहीं किया कि उनकी ख्याति देशव्यापी हो सके। अपने समय के दिग्गज अख़बार 'मॉडर्न रिव्यू' के सम्पादक ने  तिवारीजी की अनमोल कृति 'गांधीज्म एक्सरेड' (अब लुप्त )की पांडुलिपि को पढ़कर पत्र लिखा था कि  यदि यह छप जाए तो इंग्लैंड और अमेरिका का दृष्टिकोण बदल जाएगा।अर्थात वो मानते थे कि तिवारीजी की लेखनी में वो दम -खम है ,जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होने की क्षमता रखती है।।कैसा दुर्भाग्य है कि ऐसे सामर्थ्यवान विद्वान को आज छत्तीसगढ़ नहीं जानता !"
       तिवारी जी को समर्थ समालोचक के नाम से प्रसिद्धि क्यों मिली ,इस बारे में हरि ठाकुर ने अपने एक आलेख में लिखा है --"सन 1932 -33 और 1934 में उनके अनेक समालोचनात्मक निबन्ध 'माधुरी " में प्रकाशित हुए ।उनमें से एक निबन्ध का शीर्षक 'समर्थ समालोचक' था  उनका यह निबन्ध 'माधुरी' के दो अंकों में 15 पृष्ठों में प्रकाशित हुआ था।। इसके पूर्व समालोचना विधा पर इतनी गंभीरता और विस्तार से कभी चर्चा नहीं हुई थी  । यह सच है कि पण्डित माधवराव सप्रे ने 'छत्तीसगढ़ मित्र ' में हिन्दी समालोचना की बुनियाद रखी ,किन्तु उनके पास समालोचना के मानदंडों पर विस्तारपूर्वक विचार करने का अवसर न था। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए कार्य को पूरा करने का कार्य पण्डित रामदयाल तिवारी ने किया। प्रेमचंद और निराला जैसे शीर्षस्थ साहित्यकार जिसकी समालोचना का लोहा मानते थे ,उन्हें यदि 'माधुरी 'जैसी उत्कृष्ट पत्रिका ने 'समर्थ समालोचक' की  उपाधि से विभूषित किया ,तो यह अत्यंत स्वाभाविक ही था ।"
        पण्डित रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' के अनुसार तिवारीजी का यह लेख आदर्श साहित्य समालोचना धर्म का दस्तावेज है। माधुरी ने उन्हें समर्थ समालोचक की उपाधि दे ही  दी थी ,निराला भी पण्डित रामदयाल तिवारी के उन लेखों की विवेचनात्मक पकड़ के प्रशंसक थे।। प्रेमचंद ने बनारसीदास चतुर्वेदी को  अपने एक इंटरव्यू में 'भविष्य किनका है ' प्रश्न के उत्तर में भविष्यवान समालोचक के रूप में तिवारी जी की बड़ी प्रशंसा की थी। यह इंटरव्यू अंग्रेजी दैनिक 'लीडर ' में प्रकाशित हुआ था।
     तिवारी जी ने हिन्दी में 'गांधी मीमांसा' के बाद अंग्रेजी में एक महाग्रन्थ 'गांधीज्म एक्सरेड' लिखा ,जो 6 खण्डों ,35 अध्यायों और 80 शीर्षकों में था। हरि ठाकुर के अनुसार गांधी मीमांसा का लेखन समाप्त कर तिवारीजी को  संतोष नहीं हुआ। गांधीजी और उनके विचारों को
लेकर वे अधिक व्यापक धरातल पर उन्हें प्रतिष्ठित करना चाहते थे।अतः उन्होंने अंग्रेजी में गांधीज्म एक्सरेड नामक अति विशाल ग्रंथ का निर्माण किया ,जो 'गांधी मीमांसा 'का अंग्रेजी अनुवाद नहीं , बल्कि उसका स्वतंत्र रूप से किया गया विकसित रूप  है। यह विशाल ग्रंथ तिवारी जी के निधन के बाद दुर्भाग्यवश   प्रकाशित नहीं हो पाया। हरि ठाकुर का मत है कि छपने पर 'गांधीज्म एक्सरेड ' एक हज़ार पृष्ठों से भी अधिक आकार ग्रहण करता किन्तु तिवारी जी के असमय निधन के कारण यह महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाश में नहीं आ सका ।
        लेकिन इस पुस्तक की पांडुलिपि पर दादा धर्माधिकारी ,आचार्य काका कालेलकर, आचार्य पी.सी.राय , पण्डित जवाहर लाल नेहरू और बाबू राजेन्द्र प्रसाद जैसी महान विभूतियों ने जो  सकारात्मक टिप्पणियाँ भेजी थीं ,वे बहुत महत्वपूर्ण हैं । नेहरू जी ने लिखा था --"यह पुस्तक गांधीजी के विभिन्न रुचिपूर्ण पक्षों  पर प्रकाश डालती है। ऐसी पुस्तकों का हम स्वागत करते हैं।यह पुस्तक यदि मैं लिखता तो सर्वथा भिन्न ढंग से लिखी जाती ।मैं यह मानता हूँ कि गांधीजी पर विभिन्न दृष्टिकोणों से लिखा जाना चाहिए । यह पुस्तक हमारे विचारों को उत्तेजित करती है। "
   दादा धर्माधिकारी ने लिखा --" गांधीजी के मूल्यांकन को लेकर अनेक स्थलों पर मेरी आपसे मतभिन्नता हो सकती है।किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि  गांधीजी के प्रति आपके हॄदय में कोई दूषण या पूर्वाग्रह है। आपके गांधीजी के साथ जो मतभेद हैं ,वे सैद्धांतिक हैं।आश्चर्य  इस तथ्य में नहीं कि आपने गांधीजी के दृष्टिकोण का निर्भयता के साथ विश्लेषण और आलोचना की है,बल्कि इसमें है कि आपने गांधीजी के प्रति अगाध प्रेम व्यक्त करते हुए उन्हें इस युग का सबसे बड़ा मसीहा माना है। इन सुन्दर पृष्ठों को पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति  आपकी स्पष्टवादिता ,निष्पक्षता  और शालीनता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इस भावना से की गयी आलोचना का मैं न केवल स्वागत करता हूँ ,बल्कि उसमें सहयोग भी देने को तैयार हूँ।कुल मिलाकर गांधीजी के विचारों तथा कार्यक्रमों को लेकर उनके सैद्धांतिक आधारों की आपकी उदारतापूर्ण आलोचना अपने प्रकार का अकेला प्रयास है।   
    काका कालेलकर का अभिमत था  -" गांधीज्म एक्सरेड की पांडुलिपि पढ़कर लगा कि यह एक शानदार प्रस्तुति है।एक समाज शास्त्री की दृष्टि से  आपने विषय का प्रतिपादन किया है।यदि आलोचना मैत्रीपूर्ण हो और मित्र आलोचक हों तो गांधीजी भारत की बेहतर सेवा कर सकते हैं।"
    बाबू राजेन्द्र प्रसाद की टिप्पणी थी -- लेख अत्यंत सुंदर और वैज्ञानिक ढंग से लिखे गये हैं।आपने बहुत ही ध्यानाकर्षक और विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी है।"
      वर्ष 1936 -37 में तिवारी जी ने विद्यार्थियों के लिए 'हमारे नेता '  और 'स्वराज्य प्रश्नोत्तरी ' शीर्षक से दो किताबें लिखीं । इनका प्रकाशन तो हुआ ,लेकिन उन्होंने 'कांग्रेस का इतिहास ' नामक ग्रंथ भी लिखा था ,जो छपने के लिए इलाहाबाद के दीक्षित प्रेस में दिया गया था ,लेकिन उनके  के देहावसान के बाद वह ग्रंथ भी लापता हो गया।
        तिवारीजी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए हरि ठाकुर लिखते हैं - गांधीजी और उनके कार्यक्रमों पर उन्हें अटूट श्रद्धा थी।कोहनी पर लटकती आस्तीन वाली कमीज या कुरता और खादी की धोती ,यही उनकी वेशभूषा थी।श्यामल किन्तु पानीदार चेहरे से गंभीरता टपकती थी।घनी  मूंछों ने उनके चेहरे को रुआबदार बना दिया था।सब मिलाकर उनका व्यक्तित्व सरल ,किन्तु आकर्षक था।उनके व्यक्तित्व से मोहित होकर सुप्रसिद्ध चित्रकार पण्डित गणेशराम मिश्र ने उनका एक जीवंत चित्र बनाया था।वही एक मात्र चित्र है ,जो उपलब्ध है।तिवारीजी को कभी फोटो खिंचवाने की न फिक्र थी ,न  फ़ुरसत ।
                आलेख -स्वराज करुण
(यह आलेख स्वर्गीय हरि ठाकुर की पुस्तक "छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' और 'समर्थ समालोचक रामदयाल तिवारी 125 वीं जयंती स्मारिका  के तथ्यों और आलेखों पर आधारित है ।)

Friday, July 24, 2020

पुस्तक चर्चा : हल्बी लोकभाषा का पहला व्याकरण

                      आलेख : स्वराज करुण 
जब कभी साहित्यिक -सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न   लोकभाषाओं को सम्पूर्ण भाषा के रूप में स्वीकार करने की बात होती है ,तो अक्सर कुछ लोग इस तरह की चर्चा को यह कह कर ख़ारिज कर देते हैं कि इनका  न तो कोई व्याकरण है और न ही इनकी कोई लिपि । लेकिन वो भूल जाते हैं कि जहाँ तक सम्पूर्ण कही जाने वाली भाषाओं की लिपि का सवाल है तो हमारे पड़ोसी देश नेपाल की राजभाषा नेपाली  भी देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है। हमारे देश की मराठी भाषा की वर्णमाला भी मामूली अंतर से देवनागरी ही है। 
   भले ही इन सम्पूर्ण मानी जाने वाली भाषाओं का अपना व्याकरण है ,लेकिन लिपि वही है जो हम लोग अपनी  राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिए इस्तेमाल करते हैं। यानी देवनागरी । छत्तीसगढ़ प्रदेश में भी छत्तीसगढ़ी सहित अनेक आंचलिक लोक भाषाएं प्रचलित हैं। अलग से कोई लिपि न होने के बावज़ूद उनका अपना व्याकरण है ,  अपना लोक साहित्य है  , अपने लोकगीत हैं और अपना लोक संगीत है ,अपने लोकनृत्य हैं। इन लोकभाषाओं को भी देवनागरी वर्णमाला में ही लिखा जाता है।
                         
 वर्ष  2000 में राज्य बनने के बाद वर्ष 2007 में विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर  छत्तीसगढ़ी को तो  इस प्रदेश की राजभाषा का भी दर्जा दिया जा चुका है। छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला व्याकरण आज से 135 साल पहले वर्ष 1885 में  धमतरी में व्याकरणाचार्य हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा लिखा गया था। वह शिक्षक थे और अपनी लोकप्रियता के कारण बाद में धमतरी नगरपालिका के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए  थे। उनके छत्तीसगढ़ी व्याकरण के प्रकाशन के लगभग 52 साल बाद  बस्तर जैसे उस समय के बेहद पिछड़े  अंचल में  वहाँ की प्रमुख लोक भाषा हल्बी का व्याकरण तैयार करने का ऐतिहासिक कार्य हुआ । वर्ष 1937 में जगदलपुर के ठाकुर पूरनसिंह की पुस्तक 'हल्बी भाषा बोध ' का पहला प्रकाशन हुआ था  । बस्तर के इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना के लगभग आठ दशक बाद इसका द्वितीय संस्करण वर्ष  2016 में प्रकाश में आया।  ठाकुर पूरनसिंह के  पौत्र और जगदलपुर निवासी कवि विजय सिंह ने  अपनी साहित्यिक संस्था 'सूत्र प्रकाशन" के बैनर पर नये कलेवर में  इसे पुनः प्रकाशित किया  है। विजय सिंह कहते हैं कि ' हल्बी भाषा -बोध ' दरअसल इस लोकभाषा का पहला व्याकरण है।  
     इसमें दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल वनांचल बस्तर  अपनी समृद्ध लोक संस्कृति के लिए देश और दुनिया में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस राजस्व संभाग का भौगोलिक क्षेत्रफल 39 हजार 171 वर्ग किलोमीटर है । क्षेत्रफल की  दृष्टि से यह केरल राज्य के क्षेत्रफल से कुछ अधिक है। केरल का क्षेत्रफल 38 हजार 863 वर्गकिलोमीटर है ।  यानी छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग केरल प्रदेश से भी बड़ा है।  बस्तर राजस्व संभाग में  7 जिले हैं - उत्तर बस्तर (कांकेर ), कोंडागांव , बस्तर (जगदलपुर), दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा ), बीजापुर , सुकमा और नारायणपुर । देश की आज़ादी के पहले यह  सम्पूर्ण इलाका रियासती शासन के अंतर्गत आता था।  वैसे तो बस्तर अंचल में मुख्य रूप से पांच जनजातीय बोलियां (लोक भाषाएं ) प्रचलित हैं -हल्बी ,भतरी ,गोंडी ,दोरली और धुर्वी ।  इन सबमें हल्बी यहाँ की प्रमुख सम्पर्क भाषा है। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान  तब वहाँ नियुक्त  और पदस्थ होने वाले बाहर के सरकारी अधिकारी और कर्मचारी हल्बी सीख सकें ,ताकि उनके द्वारा जनता से जुड़े शासकीय काम-काज सुगमता से हो सकें , इस  उद्देश्य को अपनी किताब 'हल्बी भाषा बोध ' के माध्यम से  पूरा किया ठाकुर पूरनसिंह ने । हम कह सकते हैं कि जिस तरह व्याकरणाचार्य हीरालाल काव्योपाध्याय ने छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला व्याकरण लिखा ,उसी तरह बस्तर में सबसे पहले ठाकुर पूरनसिंह  ने  हल्बी भाषा -बोध के नाम से हल्बी व्याकरण की पहली किताब  लिखी ।
      वरिष्ठ साहित्यकार जगदलपुर निवासी   स्वर्गीय लाला जगदलपुरी ने अपनी पुस्तक 'बस्तर इतिहास एवं संस्कृति ' में ठाकुर पूरनसिंह की इस पुस्तक का  जिक्र किया है। लालाजी लिखते हैं --"हल्बी यद्यपि बस्तर -स्टेट में 'राजभाषा ' के पद पर आसीन रह चुकी थी , फिर भी उसमें आंचलिक लेखन का अभाव था।हल्बी में आंचलिक लेखन का शुभारंभ सन 1937 में हुआ था।स्वर्गीय  ठाकुर पूरनसिंह और स्वर्गीय पण्डित गणेश प्रसाद सामंत ने हल्बी में लेखन -प्रकाशन का सूत्रपात किया था । ठाकुर पूरनसिंह ने 'हल्बी भाषा -बोध' की रचना की थी और पण्डित गणेश प्रसाद सामंत ने 'देवी -पाठ ' नामक एक पद्य -पुस्तिका  लिखी थी। सन 1945 में मेजर आर.के.एम .बेट्टी लिखित 'ए हल्बी ग्रामर ' का प्रकाशन हुआ था।सन 1950 में स्वर्गीय पण्डित गंभीरनाथ पाणिग्रही लिखित एक छोटा -सा हल्बी कविता संग्रह ' गजामूँग' प्रकाशित हुआ था।" 
     हल्बी लोकभाषा का प्रारंभिक ज्ञान अर्जित करने की दृष्टि से ठाकुर पूरनसिंह की यह किताब काफी उपयोगी है। जैसा कि बताया गया है -रियासत कालीन बस्तर में यह पुस्तक बस्तर के बाहर के क्षेत्रों से नौकरी में आने  वाले सरकारी कर्मचारियों और अफसरों को हल्बी सिखाने के लिए प्रकाशित की गई थी , तो इसकी जरूरत आज के समय में भी महसूस की जा रही है । अन्य नागरिक भी इस पुस्तक से हल्बी सीख सकते हैं।   यह पुस्तक हल्बी लोकभाषा के शिक्षण और  प्रशिक्षण के लिए पहली प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है। लगभग 70 पृष्ठों के इसके द्वितीय संस्करण के प्रकाशन से बस्तर में निश्चित रूप से हल्बी लोकभाषा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक ऐतिहासिक काम हुआ है।
           आलेख : स्वराज करुण 

Sunday, June 21, 2020

भूले -बिसरे कवि स्वर्गीय मधु धान्धी


 (आज जन्म दिवस 21 जून )

आलेख : स्वराज करुण 

साहित्यिक प्रतिभाओं के मामले में छत्तीसगढ़ की धरती प्रारंभ से ही बहुत धनवान है। स्वर्गीय मधु धान्धी भी यहाँ की इन प्रतिभाओं में से थे। जीवन की  आपाधापी में समाज और वर्तमान साहित्यिक बिरादरी ने भले ही उन्हें भुला दिया हो, उनसे जुड़ी यादें भले ही कुछ धुंधली हो गयी हों और नई पीढ़ी के अधिकांश रचनाकार अपने इस प्रतिनिधि कवि की रचनाधर्मिता से अनजान हों, लेकिन जानने वाले जानते हैं कि हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से लिखने वाले मधु धान्धी बीसवीं सदी के सातवें-आठवें दशक में छत्तीसगढ़ के साहित्यिक क्षितिज पर एक चमकदार सितारे की तरह तेजी से उभर रहे थे।
दउनका जन्म 21 जून 1951 को वर्तमान बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के  ग्राम पिसीद (विकास खंड-कसडोल) में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दुर्ग और पिथौरा में और बी.ए. पूर्व तक कॉलेज की पढ़ाई महासमुन्द में हुई। उन्होंने एक सरकारी योजना के तहत मध्यप्रदेश के नौगांव (जिला -छतरपुर ) स्थित मत्स्योद्योग प्रशिक्षण संस्थान में मछली पालन का तकनीकी प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। हालांकि वहाँ से लौटकर इस व्यवसाय को अपनाने के बजाय वह हमेशा काव्य सृजन में ही लगे रहे।
   आंचलिक कवि सम्मेलनों में उनकी काव्य प्रतिभा शोहरत की बुलंदियों को छूने लगी थी.अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं प्रकाशित होती रहीं। आकाशवाणी के रायपुर केन्द्र से समय-समय पर उनकी रचनाओं का प्रसारण भी होता रहा, लेकिन दुर्भाग्यवश, 3 अप्रैल 1977 को वर्तमान महासमुन्द जिले के अपने गृहग्राम खुटेरी में उनका निधन हो गया. उस वक्त वह सिर्फ़ 26 वर्ष के थे। मित्रों ने उनके साहित्यिक योगदान को यादगार बनाए रखने के लिए पिथौरा में उनकी स्मृति में साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति का गठन किया था। समिति के तत्वावधान में उनकी 13 हिन्दी और 12 छत्तीसगढ़ी कविताओं का संकलन ‘हॄदय का पंछी’ वर्ष 1977 में प्रकाशित किया गया, जो उनका पहला और इकलौता काव्य संग्रह है।
किसी घने जंगल में या किसी रेगिस्तान में राह से भटके मुसाफ़िर की बेचैनी हो, चाहे खेतों में पसीना बहाकर भी दिन रात ग़रीबी की पीड़ा झेलते किसानों और मज़दूरों का दुःख-दर्द, मधु धान्धी की कविताएं हर हाल में आज के संघर्षशील मनुष्य की संवेदनशील अभिव्यक्ति का पर्याय है। उनकी रचनाओं में देशभक्ति की भावनाओं के साथ मानवीय प्रेम, मिलन और विछोह के अलग-अलग रंग भी हैं।

अपने नाम के अनुरूप मधुर स्वरों में अपने सुमधुर गीतों के जरिए सुनने वालों के दिल की गहराइयों में उतर जाना उनकी एक बड़ी विशेषता थी। ग़रीबों को और ज़्यादा ग़रीब और धनवानों को और भी अधिक अमीर बनाने वाली समाज-व्यवस्था में कोई भी सजग और संवेदनशील साहित्यकार आम जनता की पीड़ा को अपने शब्दों की वाणी दिए बिना नहीं रह सकता।

मधु धान्धी भी आम जनता के कवि थे। इस नाते आम जनों की आँखों से बहता पानी उन्हें भी झकझोरता था। तभी तो आर्थिक विषमताओं से घिरे आज के मेहनतकश मनुष्य की व्यथा से विचलित होकर उन्होंने लिखा था-

“कितना खटना पड़ता है तब
मानव को रोटी मिलती है ।
कितने उघरे देह यहाँ हैं ,
बरसों में धोती मिलती है।।
भूखे को कब रोटी मिलती ,
कब नंगे को वस्त्र मिला है ।
हम बंदी ,धन वाले शासक,
कैदी को कब अस्त्र मिला है ।।”

वास्तव में रोटी से वंचित, धोती से वंचित और कैदियों जैसी ज़िन्दगी जीने वाले इस देश के मेहनतकशों की हालत देखकर भला कौन यकीन करेगा कि हम एक आज़ाद मुल्क के निवासी हैं? तभी तो मधु धान्धी ने अपनी इस रचना में आगे लिखा था–

“यहाँ सांस तक रहन रखे हैं ,
धन वालों का ईश्वर साथी ।
इनके ही घी के दियों में
बैठे प्रभु हैं बनकर बाती ।।
मित्र मुझे विश्वास नहीं है
बहुत सुखी यह देश है मेरा ।
कुछ सड़कों में काट रहे हैं,
किया कुछों ने रैनबसेरा ।।”

समाज की बदहाली के लिए ज़िम्मेदार असामाजिक तत्वों की उन्हें गहरी पहचान थी। एक सजग रचनाकार के रूप में उन्होंने अपनी साहित्यिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते हुए ऐसे तत्वों को झिंझोड़ कर बेनकाब किया। एक सम्पन्न नेता और एक निर्धन व्यक्ति की मौत के विरोधाभास को उन्होंने ‘चल बसा निर्धन’ शीर्षक अपनी एक कविता में  कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया है —

“कर गए हैं वो तो बीमा लाख भर का ,
घर उनके ना रहे कोई कमी में ।
खा रहे कुछ और कुछ हैं फेंक देते ,
या लुटा दें सारा धन ,चाहे रमी में ।।
दिवस बीते ,फिर से देखी एक अर्थी ,
फूल की क्या बात ,कांटे भी नहीं थे ,।
कब मरा ,कैसे मरा ,यह  कौन जाने ,
रेडियो संदेश भी बाँटे नहीं थे।
मैंने  सोचा हो नहीं सकता ये नेता ,
जैसे कोई दे रहा था खड़ा भाषण ,
यह नहीं कर पाया होगा कोई बीमा
चल बसा निर्धन बिना पाए ही राशन ।”

देश के किसान कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि से पीड़ित होते रहते हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं ने छत्तीसगढ़ के किसानों को भी कई बार तोड़ा है। अकाल का सामना करते किसानों के दर्द को  मधु धान्धी ने अपने एक छत्तीसगढ़ी गीत में कुछ इस तरह अभिव्यक्ति दी है-

“फेर परगे संगी अकाल ,कइसे करबो ,
दुकाल एसो  फेर परगे ना ।
पानी के दिन भागिस
त आगिस जाड़ ।
बिन घर के कतको ल
कर डारिस बाढ़ ।।
दू बेरा कतको त नइ पावैं भात ।
बिन ओन्हा ,चेंदरा के
काटत हन रात ।।
फेर आगे संगी जंजाल ,
कइसे करबो
ए जाड़ बैरी जर गे हे ना ।।”

मधु धान्धी का रचना संसार दरअसल प्रगतिवाद और छायावाद का अदभुत संयोजन है। उनकी कविताओं की दुनिया में जहाँ देश की सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों पर प्रहार करती प्रगतिवादी रचनाएं हैं, वहीं छायावादी काव्य धारा से निकली उनकी कविताएं कहीं प्रकृति प्रेम तो कहीं संयोग और वियोग श्रृंगार के अलग-अलग रंगों में उभरकर कई भावुक दृश्यों का निर्माण करती हैं। प्रयोगधर्मिता भी उनके कला पक्ष की एक बड़ी ख़ूबी है, लेकिन वह कृत्रिम नहीं, बल्कि स्वाभाविक है। उनकी अभिव्यक्ति के रूप, रंग और रस पहाड़ी झरनों की तरह बिल्कुल नैसर्गिक हैं। बानगी देखिए-

“मेरी पीड़ा ने आँसू के
आभूषण हैं त्याग दिए,
और हँसी को अपने आँगन
का मेहमान बना डाला ।
घिरा मेघ से गगन सघन है ,
हुए नयन के रीते कोर ,
पता नहीं ,विश्वास मुझे है
जाने ले जाए किस ओर ।
फिर भी आशाएं वरमाला
लिए खड़ी हैं द्वार पर ,
निर्निमेष हैं भाव लोटते
सपनों के अंगार पर ।”
उनके इकलौते काव्य संग्रह ‘हॄदय का पंछी’ के इसी शीर्षक वाले उनके एक गीत की इन पंक्तियों में उनकी भावनाओं को महसूस कीजिए-

“मेरे मुरझाए फूलों को
मत अपना अपमान समझकर
बहुत दूर से मैं लाया हूँ ,
कसम तुम्हें , ठुकरा न देना ।
बरसों बाद हॄदय का पंछी
पास तुम्हारे ले आया हूँ,
टूटा मन है और न टूटे ,
यह कहकर बहला न देना ।”

उन्होंने छत्तीसगढ़ी में भी अनेक भावपूर्ण, सुमधुर गीत लिखे। अपने प्रियतम के इंतज़ार में व्याकुल प्रियतमा की भावनाएं मधु के इस गीत में कुछ इन शब्दों में प्रकट होती हैं –

“कहिके  गे हावै  आहां अषाढ़,
आँखी होगे बदरा ,दिन मोर होगे पहार ।
कछु नई सुहावै रे जर जुड़हा घाम ,
ठोसरा मारै संगी ले -ले तोर नावं।
मन के बारी हा होगे कछार ,
आँखी होगे बदरा ,दिन मोर होगे पहार।”

इसी तरह नायिका के वियोग में बेचैन नायक की अभिव्यक्ति –
“जब सुरता के फांस पिराही
नइ काहीं जब तोला भाही ,
रोज घठौन्दा जाये बेरा
मन ला पथरा कस कर लेबे ।
जानत हांवव मोर बिना तयं
तन ला कचरा कस कर लेबे ।
मोर सुरता के वृंदावन मा
मन ला बदरा कस कर लेबे ।”

इसी कड़ी मे बिदाई (गौना )के पहले एक बेटी और माँ के हॄदय के उदगार मधु के एक गीत में कुछ इस तरह प्रकट हुए हैं —
“बांचे हे चार दिन, गवनवा हो ही ।
दाई झन रोबे तयं, जाहूं ससुरार ,
इहैं असन पाहूँ मैं उहाँ दुलार ।
आँसू लुका के मोर भइया रोही ।
बांचे हे चार दिन, गवनवा होही ।
आँसू मा लुगरा के अँचरा भर गे,
आँखी के काजर आँसू मा जर गे।
बेटी मोर सुन्ना अंगनवा होही ।
बांचे हे चार दिन, गवनवा होही ।”

अपने कृतित्व और व्यक्तित्व से उन्होंने अनेक वरिष्ठ कवियों को प्रभावित किया था। उनके निधन पर शोक प्रकट करते हुए धमतरी निवासी कवि और लेखक नारायणलाल परमार (अब स्वर्गीय) ने मुझे एक पत्र में मधु धान्धी के प्रथम कविता संग्रह ‘हॄदय का पंछी’ का उल्लेख करते हुए लिखा था– ” इस संकलन में मधु की जितनी भी रचनाएं संकलित हो पाई हैं, वे निःसन्देह कवि की गहरी अनुभव क्षमता का परिचय देती हैं। आज छत्तीसगढ़ में उभरती पीढ़ी के जितने भी लोग कविताएँ लिख रहे हैं, उनमें मधु का स्वर मुझे सर्वाधिक ईमानदार और प्रभावी लगा।”
स्वर्गीय मधु धान्धी के इस काव्य संग्रह की कविताओं पर बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक की टिप्पणी इस प्रकार है —

“एक ‘हॄदय का पंछी’ पिथौरा को भी उपलब्ध हुआ, किन्तु जैसे ही उसके पर निकलने आरंभ हुए थे, काल-कराल ने उसके पंख काट दिए। छत्तीसगढ़ का ‘सुवा’ अपनी वाणी में शब्द उच्चरित कर ही रहा था कि उसका कंठ अवरुद्ध हो गया। युग की वक्र दृष्टि का शिकार हो गया ‘हॄदय का पंछी’, किन्तु उसकी साधना आज भी जीवित है-युग की शक्ति को चुनौती देने के लिए।”

वहीं राजधानी रायपुर निवासी प्रदेश के सुप्रसिद्ध गीतकार रामेश्वर वैष्णव ने लिखा था -“मधु धान्धी एक दुलारा कवि, एक प्यारा इंसान। पैरी कवि सम्मेलन की प्रथम मुलाकात में ही मुझमें अपेक्षाएं बो गया। सधा हुआ नादित स्वर, जमी हुई लेखनी , उसके अंदर एक बहुत बड़ा कवि संभावनाओं के द्वार खटखटा रहा था। मगर अफ़सोस!  अखिल भारतीय स्तर को छूते-छूते उसकी ख्याति एक अविस्मरणीय गुमनामी में बदल गयी। छत्तीसगढ़ का सशक्त गीतकार उठ गया ।”
अपने अल्पकाल के साहित्यिक जीवन में  मधु धान्धी की कुछ रचनाओं का छत्तीसगढ़ के कुछ  समाचार पत्रों के अलावा नईदिल्ली की ‘सरिता’ और ‘मुक्ता’ जैसी राष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी प्रकाशन हुआ।
मरणोपरांत उनका परिचय सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य क्षेमचन्द्र सुमन द्वारा सम्पादित और वर्ष 1981-82 में प्रकाशित ‘दिवंगत हिन्दी सेवी ग्रंथ’ में भी छपा, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों के हजारों दिवंगत कवियों और लेखकों का सचित्र परिचय शामिल है। लेकिन क्या सिर्फ़ इतना ही पर्याप्त है ?
मधु धान्धी जैसे अनेक दिवंगत कवियों और विभिन्न साहित्यिक विधाओं के दिवंगत रचनाकारों की प्रकाशित, अप्रकाशित रचनाओं का समग्र मूल्यांकन अभी बाकी है। क्या उनकी पांडुलिपियों और प्रकाशित कृतियों का संग्रहालय भी बनवाया जा सकता है, ताकि वहाँ उनकी रचनाओं को सुव्यवस्थित रूप से प्रदर्शित करते हुए उन्हें सुरक्षित भी रखा जा सके?
  क्या प्रदेश के विश्वविद्यालयों के भाषा और साहित्य विभागों द्वारा  ऐसा किया जा सकता है? अगर ऐसा हो सका तो मुझे विश्वास है कि इस प्रकार का संग्रहालय शोध छात्र-छात्राओं के लिए भी बहुत उपयोगी साबित होगा। साहित्यिक संस्थाएं भी इसके लिए अपने स्तर पर पहल कर सकती हैं। संभावनाओं पर विचार किया जाना चाहिए।
 आलेख --स्वराज करुण

Wednesday, May 27, 2020

शायद अब न दिल मिलेंगे न हाथ !


               -- स्वराज करुण 
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये !
हाथ मिलाते रहने से दिल भी कभी न कभी मिल ही जाते हैं । ऐसा मानकर शायर ने ऐसा लिखा होगा, ,लेकिन  क्या अब ऐसा नहीं लग रहा निदा फ़ाज़ली साहब की ग़ज़ल की यह लोकप्रिय पंक्ति वर्षों बाद सिर्फ़ चार महीने के भीतर  अप्रासंगिक हो गयी है ?  क्या दिल और क्या हाथ ! अब तो शायद  दोनों का ही मिलना मुश्किल है ।
    सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी इंसानों को असामाजिक बना रही है। आँखों से नज़र नहीं आने वाले एक सूक्ष्म वायरस ने मानव सभ्यता के सामाजिक ताने -बाने को तहस -नहस कर दिया है। अब कहा जा रहा है कि इंसानों को इसी वायरस के साथ जीना है ,जो उन्हें न तो हाथ मिलाने देंगे और न ही दिल ! (स्वराज करुण ) दुकानों में ,बाज़ारों में अगल -बगल या आमने -सामने खड़े या बैठे इंसान मन ही मन एक -दूसरे को सन्देह की नज़र से देख रहे हैं। भले ही कोई मास्क लगाया हुआ ही क्यों न हो ! मित्रता में या नाते -रिश्तेदारियों में  एक -दूसरे के घर आना -जाना लगभग बन्द हो गया है। एक ही शहर या गाँव में लोगों का स्वाभाविक और परम्परागत मेल -जोल समाप्ति की ओर है। गरीबों तथा निम्न आय और मध्यम आय वालों की ज़िन्दगी भी गहरी चिन्ता और बेचैनी में गुज़र रही है।
     खौफ़ का ऐसा माहौल बन गया है कि अगर किसी के घर में नल की टोंटी ख़राब हो जाए तो प्लम्बर को और इस भयानक गर्मी   बिजली का  कोई उपकरण जैसे कूलर ख़राब हो जाए तो इलेक्ट्रीशियन को बुलाने के बारे में दस बार सोचना पड़ता है ! दूध और सब्जी बेचने वाले छोटे कारोबारियों को भी सन्देह घेरे में कैद कर दिया गया है । शादी -ब्याह ,तीज -त्यौहार और मेले -ठेलों की रौनक और रंगत भी अब फ़ीकी पड़ने लगी है। विवाह और मृतक संस्कार में शामिल होने के लिए सरकार द्वारा तय संख्या में ही लोगों को आना है और  उसके लिए अगर एक जिले से दूसरे जिले में या एक राज्य से दूसरे राज्य में आना -जाना हो तो कतारबद्ध होकर सरकारी अनुमति लेना जरूरी हो गया है। 
     यानी इंसान अपने ही देश में विदेशी जैसा हो गया है ,जिसे पासपोर्ट और वीजा के लिए आवेदन करना पड़ता है। जन - जीवन की स्वाभाविकता विलुप्त होती जा रही है। आख़िर कब ख़त्म होगा यह उद्विग्न और विचलित कर देने वाला माहौल ?
   सन्दर्भ --चायनीज कोरोना वायरस 

साहित्य गगन के चमकदार सितारे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

(आज 27 मई को जयंती पर विशेष)
     आलेख : स्वराज करुण 
 साहित्य और पत्रकारिता के नक्शे पर छत्तीसगढ़ को  देश और दुनिया में  पहचान दिलाने वाली दिग्गज विभूतियों में स्वर्गीय डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी का नाम भी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।  वह आधुनिक हिन्दी साहित्य गगन  के चमकदार सितारे थे ,जो अपनी रचनाओं से  लगभग छह दशकों तक  सम्पूर्ण हिन्दी संसार को आलोकित करते रहे। सचमुच ऋषितुल्य था उनका व्यक्तित्व । उन्होंने अपनी 77 वर्षीय जीवन - यात्रा के लगभग 60 वर्ष एक तपस्वी की तरह देवी सरस्वती की उपासना में अर्पित कर दिए।  आज 27 मई को उनकी जयंती है। इस उपलक्ष्य में  उन्हें याद करते हुए आइए आज डालते हैं उनकी जीवन यात्रा के साथ  रचना संसार पर एक नज़र।
    हिन्दी साहित्य के इतिहास में बख्शीजी की गिनती द्विवेदी युग के महान लेखकों और साहित्यिक पत्रकारों में होती है। साहित्यकार और पत्रकार होने के अलावा उन्होंने  स्कूल अध्यापक और कॉलेज  प्राध्यापक के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी भूमिकाओं का बड़ी कुशलता से निर्वहन किया ।
 उनका जन्म छत्तीसगढ़ के वर्तमान राजनांदगांव जिले के अंतर्गत एक   छोटे -से रियासती मुख्यालय  खैरागढ़ में 27 मई सन 1894 में हुआ था। यह वही खैरागढ़ है जहाँ  एशिया का  पहला संगीत एवं कला विश्वविद्यालय है , जो  खैरागढ़ रियासत की राजकुमारी इंदिरा के नाम पर विगत लगभग छह दशकों से संचालित हो रहा है। इसकी स्थापना 14 अक्टूबर 1956 में हुई थी ।  इस अनोखे विश्वविद्यालय ने खैरागढ़ का नाम देश -विदेश में रौशन तो किया ही ,लेकिन इसकी स्थापना से पहले वहाँ की माटी में जन्मे साहित्य मनीषी बख्शीजी की रचनाओं से यह  कस्बाई शहर भी देश और दुनिया की साहित्यिक बिरादरी में प्रसिद्ध हो गया था।। रायपुर के दाऊ कल्याण सिंह अस्पताल (डी.के.अस्पताल )में 28 दिसम्बर 1971 को बख्शीजी का निधन हो गया ।
       उनके पिता का नाम पुन्नालाल बख़्शी और माता का नाम मनोरमा देवी था।  पदुमलाल जी की प्रारंभिक शिक्षा खैरागढ़ में हुई ,जहाँ पण्डित रविशंकर शुक्ल उनके स्कूल के प्रधान अध्यापक थे ,जो आगे चलकर देश के महान  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और वर्ष 1947 में देश की  आज़ादी के 9 साल बाद 1956 में बने मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री  बने । बख्शीजी की साहित्य साधना वर्ष 1911 में  शुरू हो चुकी थी। तब वह  मात्र 17 वर्ष के किशोर थे । उन दिनों उनकी एक रचना जबलपुर से छपने वाली 'तारिणी ' नामक पत्रिका में छपी । यह एक अंग्रेजी कहानी का भावानुवाद था। मिडिल उत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने खैरागढ़ के विक्टोरिया हाई स्कूल में प्रवेश लिया था । वर्ष  1911की मेट्रिक परीक्षा में वह फेल हो गए थे ,लेकिन अगले साल इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने बनारस के सेंट्रल हिन्दू कॉलेज में दाखिला लिया और  वर्ष 1916 में  वहाँ से बी.ए.की उपाधि हासिल की। वर्ष 1913 में उनका विवाह मण्डला  के ग्राम महाराजपुर निवासी हरिप्रसाद श्रीवास्तव की सुपुत्री लक्ष्मीदेवी के साथ सम्पन्न हुआ । बी.ए. उत्तीर्ण होने के बाद  वर्ष 1916 में बख्शीजी को  स्टेट हाई स्कूल राजनांदगांव में संस्कृत शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गयी ।  उन्हीं दिनों उनका एक निबन्ध 'सोना निकालने वाली चींटियां ' शीर्षक से उस जमाने की प्रसिद्ध पत्रिका 'सरस्वती' में प्रकाशित हुआ।  सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 'इण्डियन प्रेस'  की इस पत्रिका के सम्पादक थे। यह पत्रिका इलाहाबाद से छपती थी।  बख्शीजी वर्ष 1920 में  इस पत्रिका के सहायक सम्पादक नियुक्त किए गए  उन्हें महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे दिग्गज साहित्यकार और पत्रकार के मार्गदर्शन में काम करने का अवसर मिला । उनकी विलक्षण प्रतिभा को देखते हुए अगले ही साल जनवरी  1921में उन्हें पदोन्नत कर  'सरस्वती ' का  प्रधान सम्पादक बना दिया गया।
          स्वतंत्रता संग्राम का दौर था और  पूरे भारत में राष्ट्रीय चेतना की लहर चल रही थी।  बख्शीजी ने भी  'सरस्वती ' पत्रिका के माध्यम से आज़ादी के आंदोलन की धार को तेज करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने इस पत्रिका में 'देश की दशा ' और 'संसार की गति ' शीर्षक से दो स्तंभ शुरू किए ,जिनसे पत्रिका की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। वर्ष 1925 में उन्होंने अपने पिता पुन्नालाल बख़्शी के निधन के बाद कुछ पारिवारिक कारणों से इस पद से इस्तीफा दे दिया और अपने घर खैरागढ़ लौट आए।  प्रकाशकों के अनुरोध पर वर्ष 1927 में उन्होंने  पुनः 'सरस्वती' के  सम्पादक पद का कार्यभार संभाल लिया ।लेकिन वर्ष 1929 में कुछ कारणों से  फिर इस्तीफा दे कर खैरागढ़ आ गए और  वर्ष 1930 में एक बार फिर स्टेट हाई स्कूल राजनांदगांव में अध्यापक बन गए । वहाँ वर्ष 1934 तक अध्यापन कार्य के बाद वह  अपने गृह नगर  खैरागढ़ लौट गए  , जहाँ विक्टोरिया हाई स्कूल में वर्ष 1935 से 1949 तक उन्होंने अंग्रेजी के अध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दी। राज्य सरकार ने इस हाई स्कूल का नामकरण उनके नाम पर किया है। आज यह  पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला के नाम से संचालित हो रहा है। उन्होंने कुछ समय तक नरहरदेव हाई स्कूल कांकेर में भी शिक्षकीय कार्य किया। अपने गृह नगर खैरागढ़ में रहकर उन्होंने  वर्ष 1952 से 1956 तक पुनः 'सरस्वती' का सम्पादन किया ।
        दरअसल स्वास्थ्यगत कारणों से उनके लिए इलाहाबाद में नियमित रूप से रह पाना असंभव था ,लेकिन प्रकाशकों का आग्रह था कि वह अपने घर में रहकर ही  इसके सम्पादन का दायित्व पुनः संभालें ।   उन्होंने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया । सहायक सम्पादक देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्त' स्वयं पत्रिका की प्रकाशन सामग्री लेकर  बख्शीजी से सम्पादन करवाने के लिए इलाहाबाद से खैरागढ़ आते-जाते  थे।  यह बख्शीजी की  प्रतिभा और विद्वता  का ही कमाल था कि उन्हें वर्ष 1920 से 1956 तक 36 वर्षों में  चार अलग -अलग कालखण्डों में  'सरस्वती' जैसी राष्ट्रीय स्तर की  प्रतिष्ठित पत्रिका की   सम्पादकीय कमान संभालने का अवसर मिला । ।वर्ष 1920 में सहायक सम्पादक ,वर्ष 1921 में प्रधान सम्पादक और वर्ष 1927 से 1929 तक तथा वर्ष 1952 से 1956 तक पुनः सम्पादकीय दायित्व । एक पत्रकार के लिए यह निश्चित रूप से सम्मान की बात थी । बख्शीजी में  साहित्य और पत्रकारिता की अभिरुचि किशोरवय से ही अंकुरित हो चुकी थी ,जो  युवावस्था से लेकर जीवन पर्यन्त  और भी अधिक पुष्पित और पल्लवित होती रही।।   वह  मित्रों के साथ मिलकर खैरागढ़ से हस्तलिखित वार्षिक पत्रिका 'जन्म भूमि '  लगातार तीन वर्षों तक निकालते रहे। उन्होंने 'सरस्वती ' पत्रिका की नौकरी छोड़कर खैरागढ़ वापस आने पर वहाँ के  रियासती शासन के समाचार पत्र ' प्रजाबंधु ' का भी कुछ समय तक सम्पादन किया। यह वही खैरागढ़ है जहाँ  एशिया का  पहला संगीत एवं कला विश्वविद्यालय है जो  खैरागढ़ रियासत की राजकुमारी इंदिरा के नाम पर विगत लगभग छह दशकों से संचालित हो रहा है।   बख्शीजी ने  रायपुर से प्रकाशित छत्तीसगढ़ के प्रथम दैनिक 'महाकोशल' के साहित्य सम्पादक के रूप में वर्ष 1955 में  रविवारीय अंकों का भी  सम्पादन किया।  वह बी.ए. पास थे ,लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर  उनकी महत्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 1959 में उन्हें दिग्विजय कॉलेज राजनांदगांव में हिन्दी का प्राध्यापक नियुक्त किया गया । उन दिनों छत्तीसगढ़ अंचल के कॉलेज सागर विश्वविद्यालय के अधीन संचालित होते थे। पण्डित द्वारिका प्रसाद मिश्र इस विश्वविद्यालय के उपकुलपति हुआ करते थे। उन दिनों राज्यपाल विश्वविद्यालयों के 'कुलपति ' कहलाते थे । वर्तमान में  उन्हें कुलाधिपति'कहा जाता है।
      बख्शीजी की रचनाएं विश्वविद्यालय के हिन्दी पाठ्यक्रम में भी शामिल थीं। इस आधार पर भी  विशेष प्रकरण मानकर उन्हें  दिग्विजय कॉलेज में हिन्दी  प्राध्यापक के पद पर नियुक्त किए जाने के प्रस्ताव पर  विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने अपनी सहमति प्रदान कर दी। इतना ही नहीं बल्कि उपकुलपति पण्डित द्वारिका प्रसाद मिश्र ने बख्शीजी को डी.लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित करने का भी प्रस्ताव रखा ,जिसे विश्वविद्यालय की कार्य परिषद ने सहर्ष अनुमोदित कर दिया। यही पण्डित द्वारिका प्रसाद मिश्र आगे चलकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इस बीच बख्शीजी ने 20 अगस्त 1959 को दिग्विजय कॉलेज राजनांदगांव में प्राध्यापक का पद संभाला और मृत्यु पर्यन्त यानी 1971 तक वहाँ अपनी सेवाएं देते रहे। 
         पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी का रचना संसार बहुत व्यापक है। वह धीर -गंभीर चिन्तक तो थे ही ,समीक्षक ,निबन्ध लेखक ,नाट्य लेखक, कहानीकार  और उपन्यासकार के रूप में भी उन्हें भरपूर प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मिली। दिसम्बर 1960 में डॉ.हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय (सागर विश्वविद्यालय ) ने अपने दीक्षांत समारोह में बख़्शी जी को  डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (डी.लिट्)की मानद उपाधि से सम्मानित किया। इसके पहले  वर्ष 1949 में उन्हें हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा'साहित्य वाचस्पति ' की उपाधि से नवाजा गया था । वर्ष 1965 में  मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन  के रायपुर अधिवेशन में भी बख़्शीजी को सम्मानित किया गया । उन्हें  अपने समय के अनेक दिग्गज साहित्यकारों का स्नेह और सानिध्य मिला । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अलावा मुंशी प्रेमचंद , मैथिलीशरण गुप्त ,सुमित्रानन्दन पंत, भगवतीचरण वर्मा , सुभद्राकुमारी चौहान , महादेवी वर्मा ,सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला',  कामताप्रसाद गुरु ,लोचनप्रसाद पाण्डेय , रामानुजलाल श्रीवास्तव ,डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र और  गजानन माधव मुक्तिबोध सहित अनेक वरिष्ठ और विशिष्ट साहित्यकारों से उनका निकटतम  साहित्यिक सम्पर्क रहा।
           बख़्शी जी के उपन्यासों में'कथाचक्र', 'भोला' और 'वे दिन ' उल्लेखनीय हैं।  उनके लिखे नाटकों के तीन संकलन  भी पुस्तकों के रूप में काफी चर्चित हुए ,जिनमें वर्ष 1916 में प्रकाशित 'प्रायश्चित' , वर्ष 1959 में प्रकाशित ' भोला ' और वर्ष 1965 में छपी 'त्रिपथगा' शामिल हैं।उंन्होने विभिन्न विषयों पर बड़ी संख्या में निबन्ध भी लिखे,जो उन दिनों पत्र -पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपे लेकिन पुस्तक रूप में उनका पहला निबंध  संग्रह 'साहित्य चर्चा ' शीर्षक से  वर्ष 1937 में प्रकाशित हुआ था । इसके बाद 'कुछ' शीर्षक से वर्ष 1948 में तथा 'और कुछ ' शीर्षक से वर्ष 1950 में दो निबंध संग्रह प्रकाशित हुए। उनके  कुल 14 निबंध संग्रह हैं। इनमें कुल 218 निबंध संकलित हैं। मुझे याद आ रहा है कि 'क्या लिखूँ ' शीर्षक से उनका एक निबंध वर्ष 1973-74 में मध्यप्रदेश हायर सेकेंडरी बोर्ड के पाठ्यक्रम में भी शामिल था। यह उनका बड़ा ही दिलचस्प निबंध है। इसमें लेखक अपनी दो छात्राओं -अमिता और नमिता को दो अलग -अलग विषय देकर उन पर निबंध लिखने के लिए कहते हैं। एक का विषय होता है -'दूर के ढोल सुहावने होते हैं 'जबकि  दूसरे को  'समाज सेवा ' पर निबंध लिखना होता है। अपने विद्यार्थियों और पाठकों को निबंध कला की जानकारी देने के लिए उन्होंने 'क्या लिखूँ ' शीर्षक से निबंध  रचना की थी ,जो निबंध विधा  में रुचि लेने वाले नये लेखकों के लिए भी काफी उपयोगी है। बख्शीजी ने बच्चों के लिए भी बहुत लिखा। बाल -साहित्य के अंतर्गत 'कथा वाटिका , गद्य सुषमा , मातृभूमि जैसी  उनकी अनेक  पुस्तकें तत्कालीन मध्य प्रान्त और बरार (सी.पी.एंड बरार )और मध्यप्रदेश सरकार की प्राथमिक शालाओं से लेकर मिडिल और हाई स्कूलों के पाठ्यक्रमों में भी शामिल थीं।।               हिन्दी साहित्य संसार में कहानीकार के रूप में भी उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इनमें 'झलमला ' , 'गुड़िया ' छत्तीसगढ़ की आत्मा' ,' मेरो तो गिरधर गोपाल' ,  'मोटर स्टैंड' 'चक्करदार चोरी ' 'गोमती ' आदि की गिनती हिन्दी की कालजयी कहानियों में होती है। उनकी कहानियों में मानव जीवन के सुख -दुःख की हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति है।   कहानी 'छत्तीसगढ़ की आत्मा " में  'कारी' नामक ममतामयी  स्त्री पात्र  के सहज -सरल आत्मीय स्वभाव को बख्शीजी ने बड़े ही   मार्मिक अंदाज़ में व्यक्त किया है।  बख्शीजी के समग्र रचना संसार को ' बख़्शी ग्रंथावली 'के नाम से आठ खण्डों में प्रकाशित किया गया है। प्रदेश  सरकार की संस्था-छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी ,रायपुर द्वारा उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर   'साहित्य की बगिया का माली ' शीर्षक से गणेश शंकर शर्मा की पुस्तक वर्ष 2007 में प्रकाशित की गयी थी । आलेख में उल्लेखित कई  तथ्य उनकी इस पुस्तक से साभार लिए गए हैं।
      छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी  राजनांदगांव देश के तीन  महान साहित्यकारों की कर्मभूमि के रूप में भी प्रसिद्ध  है ।  पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी सहित डॉ.बल्देवप्रसाद मिश्र और गजानन माधव मुक्तिबोध ने यहाँ  अपनी साहित्य -साधना से इस शहर के साथ -साथ सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का भी गौरव बढ़ाया है। इन तीनों साहित्य मनीषियों के सम्मान में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा  वहाँ त्रिवेणी परिसर और मुक्तिबोध स्मारक की भी स्थापना की गयी है। यह परिसर एक  संग्रहालय के रूप में है । प्रबुद्धजनों के साथ -साथ वर्तमान पीढ़ी के लेखकों और कवियों के लिए भी यह एक साहित्यिक तीर्थ है , जहाँ तीनों विभूतियों के जीवन और साहित्य सृजन से जुड़े छायाचित्रों  , उनके महत्वपूर्ण पत्रों  ,  दैनिक उपयोग की वस्तुओं  और उनकी साहित्यिक पुस्तकों आदि को सुव्यवस्थित रूप से प्रदर्शित किया गया है।  राष्ट्रीय स्तर के अनेक लेखक और कवि समय -समय पर यहाँ आते रहे हैं।               भौतिक रूप से आज बख्शीजी भले ही हमारे बीच नहीं हैं ,लेकिन अपनी अमिट रचनाओं की मूल्यवान धरोहर के साथ वह हमारी यादों  में हमेशा मौज़ूद रहेंगे ।
           आलेख : स्वराज करुण