Friday, November 7, 2014

(पुस्तक चर्चा ) भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर एक ज़रूरी किताब

                                        

         संगीत की अपनी भाषा होती है ,जो दुनिया के हर इंसान के दिल को छू जाती है और चाहे कोई देश-प्रदेश हो या विदेश,  कहीं का भी संगीत , कहीं के भी इंसान को सहज ही अपनी ओर आसानी से खींच लेता है.  भारतीय संगीत और वाद्य यंत्रों की भी अपनी कई विशेषताएं हैं .उनकी उत्पत्ति का अपना इतिहास है .   अवनद्ध वाद्य भी इनमे अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं . संगीत में अवनद्ध वाद्यों की जरूरत भोजन का जायका बढ़ाने वाली  मसालेदार सब्जियों और स्वादिष्ट चटनियों की तरह है . 
      भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर  डॉ.जवाहरलाल नायक का शोध-ग्रन्थ लगभग तीस साल बाद पुस्तक के रूप में सामने आया है .लेखक के अनुसार  चमड़े से ढंके वाद्य-यंत्रों के बारे में शायद अपने किस्म की यह पहली शोध पुस्तक है .. डॉ जवाहर नायक छत्तीसगढ़ में महानदी के किनारे ग्राम लोधिया (जिला -रायगढ़ ) के निवासी हैं. मध्यप्रदेश के जमाने में उस जिले के सरिया क्षेत्र से विधायक भी रह चुके हैं .उनकी पहचान एक कुशल तबला वादक के रूप में भी है .उन्होंने छत्तीसगढ़ के इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से तबले में एम .ए. की उपाधि प्राप्त की है.और इसी विश्वविद्यालय से भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर पी.एच-डी की है. 
      डॉ. नायक के अनुसार चर्म-आच्छादित वाद्यों जैसे तबला , पखावज ,मृदंग खंजरी , डफ ,ढोलक, ,आदि के लिए 'अवनद्ध ' संज्ञा दी गयी है. उन्होंने इस बारे में पुस्तक में अवनद्ध वाद्य  यंत्रों  के बारे में कई विद्वानों की परिभाषाएं भी संकलित की हैं .स्वर्गीय डॉ. लालमणि मिश्र के अनुसार -वे वाद्य जो भीतर से पोले तथा चमड़े से मढ़े हुए होते हैं और हाथ या किसी अन्य वस्तु के ताड़न से ध्वनि या शब्द उत्पन्न करते हैं ,उन्हें 'अवनद्ध ' या ' वितत ' भी कहा गया है. डॉ. जवाहर नायक ने 407 पृष्ठों की अपनी इस पुस्तक मे भारतीय अवनद्ध वाद्यों का वर्गीकरण करते हुए प्राचीन काल के अवनद्ध वाद्यों , मध्यकालीन अवनद्ध वाद्यों और आधुनिक अवनद्ध वाद्यों का दिलचस्प विश्लेषण किया है. सर्वाधिक प्रचलित अवनद्ध वाद्य 'तबला ' पर भी उन्होंने प्रकाश डाला है.प्रत्येक अवनद्ध वाद्यकी उत्पत्ति, बनावट, निर्माण विधि की जानकारी भी इसमें दी गयी है. 
        शोध-ग्रन्थ नौ अध्यायों में है. विषय प्रवेश के साथ पहले अध्याय में अवनद्ध वाद्य : शब्द व्युत्पत्ति , परिभाषा , अवनद्ध वाद्यों की निर्माण सामग्री , अवनद्ध वाद्यों का महत्व और उत्पत्ति का संक्षिप्त विवेचन है . दूसरे अध्याय में अवनद्ध वाद्यों का वर्गीकरण किया गया है. तीसरे अध्याय में भारत के प्राचीन अवनद्ध  वाद्य यंत्रों का उल्लेख है .इसमें भूमि- दुन्दुभि ,  दुन्दुभि , केतुमत और मृदंग जैसे वाद्य यंत्रों पर प्रकाश डाला गया है. चौथे अध्याय में संजा , धोंसा , तम्बकी , ढक्का, हुडुक जैसे  मध्यकालीन अवनद्ध वाद्यों पर, पांचवें अध्याय में खंजरी , दफ़ , दुक्कड , दमामा , ढोल  जैसे आधुनिक अवनद्ध वाद्यों पर और छठवें अध्याय में सर्वाधिक प्रचलित अवनद्ध वाद्य 'तबला' पर शोधकर्ता लेखक ने ज्ञानवर्धक जानकारी दी है. सातवें अध्याय में प्रमुख भारतीय अवनद्ध वाद्यों के अनेक प्रसिद्ध वादकों का परिचय दिया गया है .लेखक ने आठवें अध्याय में पाश्चात्य अवनद्ध वाद्यों का विश्लेषण किया है .इसमें लेखक डॉ.नायक की  ये पंक्तियाँ संगीत कला को लेकर उनके व्यापक और प्रगतिशील नज़रिए को प्रकट करती हैं - पाश्चात्य और हिन्दुस्तानी ,इन दो संगीत पद्धतियों के नाम से सभी संगीत रसिक परिचित हैं .दोनों ही संगीत पद्धतियाँ अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं .आज वैज्ञानिक विकास के युग में जब सम्पूर्ण विश्व की दूरी नगण्य -सी हो गई है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की सांस्कृतिक उपलब्धियों का पूर्ण सहिष्णुता के आधार पर समाकलन प्रस्तुत करें ,जिससे विस्तृत वसुन्धरा के प्रत्येक कला में स्वाभाविक सामंजस्य स्थापित हो सके .समय की आवाज को यदि आज के परिवेश में सही रूप से पहचाना जाए तो प्रत्येक विचारधारा का निष्कर्ष राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर विश्व-बन्धुता की प्रेरणा प्रदान करता हुआ मिलेगा .
           शोधार्थी डॉ. नायक के अनुसार भारतीय अवनद्ध वाद्यों के स्वतंत्र अध्ययन की दृष्टि से संभवतः यह पहला प्रयास है. उन्होंने छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और इंदिरा संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के पूर्व उप-कुलपति स्वर्गीय डॉ. अरुण कुमार सेन के मार्ग दर्शन में यह शोध-कार्य पूर्ण किया था . लगभग तीस साल के लंबे अंतराल के बाद वर्ष .2012 में डॉ. नायक की मेहनत पुस्तक के रूप में सामने आयी .उन्हें बहुत-बहुत बधाई. (स्वराज्य करुण )

Tuesday, November 4, 2014

क्या सपना ही रह जाएगा अपने मकान का सपना ?

          आधुनिक भारतीय समाज में यह आम धारणा है कि इंसान को अपनी कमाई बैंकों में जमा करने के बजाय ज़मीन में निवेश  करना चाहिए . कई लोग ज़मीन खरीदने में पूँजी लगाने को बैंकों में  'फिक्स्ड  डिपौजिट' करने जैसा मानते हैं . यह भी आम धारणा है कि सोना खरीदने से ज्यादा फायदा ज़मीन खरीदी में है . समाज में प्रचलित इन धारणाओं में काफी सच्चाई है, जो साफ़ नज़र आती है .
       अपने शहर में किसी ने आज से पचीस साल पहले अगर दो हजार वर्ग फीट जमीन कहीं बीस रूपए प्रति वर्ग फीट के भाव से चालीस हजार रूपए में खरीदी थी तो आज उसकी कीमत चालीस लाख रूपए हो गयी है . पीछे  मुड़कर बहुत दूर तक देखने की जरूरत नहीं है .याद कीजिये तो पाएंगे कि  छोटे और मंझोले शहरों में आज से सिर्फ दस  साल पहले एक हजार  वर्ग फीट वाले जिस मकान की कीमत छह -सात लाख रूपए थी आज वह बढकर पैंतीस-चालीस लाख रूपए की हो गयी है . कई कॉलोनियां ऐसी बन रही हैं ,जहां एक करोड ,दो करोड और पांच-पांच करोड के भी मकान बिक रहे हैं .उन्हें खरीदने वाले कौन लोग हैं और उनकी आमदनी का क्या जरिया है , इसका अगर ईमानदारी से पता लगाया जाए तो काले धन के धंधे वालों के कई चौंकाने वाले रहस्य उजागर होंगे .प्रापर्टी का रेट शायद ऐसे ही लोगों के कारण तेजी से आसमान छूने लगा है . प्रापर्टी डीलिंग का काम करने वाले कुछ बिचौलियों की भी इसमें काफी संदेहास्पद भूमिका हो सकती है .  कॉलोनियां बनाने वालों के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वे उनमे दस-पन्दरह प्रतिशत मकान आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी बनवाएं ,लेकिन अधिकाँश निजी बिल्डर इस क़ानून का पालन नहीं करते और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता .
           ज़मीन और मकानों की  कीमतें  इस तरह बेतहाशा बढने के पीछे क्या गणित है ,यह कम से कम मुझ जैसे सामान्य इंसान की समझ से बाहर है ,लेकिन इस रहस्यमय मूल्य वृद्धि की वजह से  गरीबों और सामान्य आर्थिक स्थिति वालों पर जो संकट मंडराने लगा है , वह देश और समाज दोनों के भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है. जब किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति या उसके परिवार को रहने के लिए एक अदद मकान नहीं मिलेगा तो उसके दिल में सामाजिक व्यवस्था के प्रति स्वाभाविक रूप से आक्रोश पैदा होगा .अगर यह आक्रोश सामूहिक रूप से प्रकट होने लगे तो फिर क्या होगा ? सोच कर ही डर लगता है .
        यह एक ऐसी समस्या है जिस पर सरकार और समाज दोनों को मिलकर विचार करना और कोई रास्ता निकालना चाहिए . रोटी और कपडे का जुगाड तो इंसान किसी तरह कर लेता है ,लेकिन अपने परिवार के लिए मकान खरीदने या बनवाने में उसे पसीना आ जाता है.  खुद का मकान होना सौभाग्य की बात होती है ,लेकिन यह सौभाग्य हर किसी का नहीं होता . खास तौर पर शहरों में यह एक गंभीर समस्या बनती जा रही है . जैसे-जैसे रोजी-रोटी के लिए , सरकारी और प्राइवेट नौकरियों के लिए ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन हो रहा है , यह समस्या और भी विकराल रूप धारण कर रही है .जहां आज से कुछ साल पहले शहरों में आवासीय भूमि की कीमत पच्चीस-तीस या पचास  रूपए प्रति वर्ग फीट के आस-पास हुआ करती थी ,आज वहाँ  उसका  मूल्य सैकड़ों और हजारों रूपए वर्ग फीट हो गया है . ऐसे में कोई निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार स्वयं के घर का सपना कैसे साकार कर पाएगा ?
        सरकारी हाऊसिंग  एजेंसियां शहरों में लोगों को सस्ते मकान देने का दावा करती हैं ,लेकिन उनकी कीमतें भी इतनी ज्यादा होती हैं कि  उनका मकान  खरीद पाना हर किसी के लिए संभव नहीं हो पाता .इधर निजी क्षेत्र के बिल्डरों की भी  मौज ही मौज है . अगर किसी मकान की प्रति वर्ग फीट निर्माण लागत अधिकतम एक हजार  रूपए प्रति वर्ग फीट हो तो सीधी-सी बात है कि  पांच सौ वर्ग फीट का मकान पांच  लाख रूपए में बन सकता है .लेकिन बिल्डर लोग इसे पन्द्रह -बीस लाख रूपए में बेचते हैं ,यानी निर्माण लागत का तिगुना -चौगुना दाम वसूल करते हैं . ज़ाहिर है कि गरीब या कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार के लिए खुद के मकान का सपना आसानी से साकार नहीं हो सकता . ऐसे में सरकार को अलग-अलग आकार के मकानों की  प्रति वर्ग फीट  एक निश्चित निर्माण लागत तय कर देनी  चाहिए ,जो  सरकारी तथा निजी दोनों तरह के बिल्डरों के लिए अनिवार्य हो . शहरों में आवासीय ज़मीन की बेलगाम बढती कीमतों पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है . अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश के शहरों में अधिकाँश लोगों के लिए अपने मकान  का सपना सिर्फ सपना बनकर रह जाएगा .(स्वराज्य करुण )

Friday, October 31, 2014

पुस्तक चर्चा -- छत्तीसगढ़ के चटनी


भारत के हर प्रदेश में खान-पान की अपनी विशेषताएं होती हैं .छत्तीसगढ़ भी देश का ऐसा राज्य है ,जहां रसोई की अपनी विशेष विधाएं और खूबियाँ हैं . भोजन का स्वाद बढ़ाने में चटनी का अपना महत्वपूर्ण योगदान होता है .   अड़तालिस पेज की इस छोटी - सी पुस्तिका में आचार्य डॉ. दशरथ लाल निषाद'विद्रोही' ने छत्तीसगढ़ के घरों में  बनने वाली अड़तीस प्रकार की चटनियों का वर्णन किया है. पुस्तिका में प्रत्येक चटनी की निर्माण विधि का उल्लेख हिन्दी में और उसके गुणों का बखान छत्तीसगढी कुंडलियों में कुछ इस तरह किया है कि पढ़ते -पढ़ते जीभ चटकारे लेने लगती है और मुँह में अनायास पानी आ जाता है . लेखक ने चटनी की परिभाषा अत्यंत सहज भाव से दी है- जेन ला चांट के खाय जाथे,वोला चटनी कहिथें .आमा... के चटनी , लिमऊ यानी नीबू की चटनी , आँवरा (आँवला ) की चटनी ,अमली (इमली )की चटनी , अदरक आलू कांदा , चिरपोटी फर, बोईर (बेर ),करेला , करौंदा की चटनी का नाम सुनते ही लार टपकने से खुद को भला कैसे रोक पाएगी ? अखबारी प्रचार-प्रसार से लगभग दूर रहने वाले दशरथ लाल जी छत्तीसगढ़ के ऐसे समर्पित साहित्यकार हैं ,जो अपनी लेखनी से इस राज्य के जन -जीवन की विशेषताओं को देश और दुनिया के सामने लाने के.लिए लम्बे समय से लगे हुए हैं .वह धमतरी जिले में महानदी के किनारे ग्राम मगरलोड में रहते हैं . छत्तीसगढ़ के चटनी के अलावा राज्य के खान -पान की खूबियों पर प्रकाशित उनकी पुस्तिकाओं में छत्तीसगढ़ के भाजी , छत्तीसगढ़ के कांदा , छत्तीसगढ़ के पान , छत्तीसगढ़ के बासी , छत्तीसगढ़ के रोटी , छत्तीसगढ़ के मछरी -मास भी उल्लेखनीय हैं . इन्हें मिलाकर छत्तीसगढ़ के जन -जीवन, इतिहास , लोक -परम्परा आदि कई पहलुओं पर छिहत्तर वर्षीय निषाद जी की अब तक छब्बीस किताबें छप चुकी हैं और बाईस अप्रकाशित हैं वर्ष १९७५ में देश में लगे आपातकाल के दौरान उन्होंने मीसा -बंदी के रूप में जेल-यात्रा भी. की और वहाँ से लौटे तो उन्होंने ' मीसा के मिसरी ' शीर्षक कविता संग्रह लिख डाला . कुछ वर्ष पहले यह प्रकाशित हुआ ..सजने-धजने इस राज्य  की परम्परओं को उन्होंने 'छत्तीसगढ़ के सिंगार' शीर्षक अपनी पुस्तिका में सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है. वह आयुर्वेद चिकित्सक भी हैं . उनका डाक्टरी ज्ञान 'आयुर्वेद बोधनी' में खुलकर सामने आता है .इस किताब का पहला भाग प्रकाशित हो गया है . गौ वंश की महत्ता ,छत्तीसगढ़ के फूल ,छत्तीसगढ़ के तिहार (त्यौहार ) .धर्म बोधनी' अभी प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं उनकी अधिकांश किताबें संगम साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति .मगरलोड द्वारा प्रकाशित की गयी हैं.(स्वराज्य करुण )

Thursday, October 30, 2014

देश का रूपया सीधे विदेशी बैंकों में जमा करने पर प्रतिबंध ज़रूरी !


अपने देश में कई राष्ट्रीयकृत बैंक हैं ,फिर भी कुछ लोग अपनी कथित धन-राशि   विदेशी बैंकों में ही क्यों जमा करते हैं ?   इससे तो उनकी बदनीयती साफ़ झलकती है . वे जिसे अपना धन समझ रहे हैं , वह तो वास्तव में इस देश की माटी से हासिल पूँजी है ,    जिसे उनके द्वारा टैक्स चोरी के लिए देश के बाहर के बैंकों में जमा किया जाता है .अगर यह दौलत  साफ़-सुथरी होती और उनके दिल भी पाक-साफ़ होते ,तो  ऐसे लोग यह रूपया अपने ही देश के सरकारी बैंकों में जमा करते . उन बैंकों के माध्यम से भले ही उन्हें विदेशों में पैसों की जरूरत होने पर राशि का हस्तांतरण हो जाता .यह माना जा सकता है कि कुछ लोगों को अपने बेटे-बेटियों की विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए ,या विदेश में स्वयं के  अथवा अपने किसी नाते-रिश्तेदार के इलाज के लिए भी राशि की ज़रूरत हो सकती है , दूसरे देशों में  उद्योग-व्यापार में निवेश  अथवा समाज-सेवा के कार्यों में दान देने के लिए भी पूँजी की जरूरत होती है .अगर ऐसे प्रयोजनों के लिए कोई अपना रूपया विदेश भेजना चाहे तो उसे अपने देश के किसी सरकारी बैंक के माध्यम से भेजना चाहिए ,ताकि उसका पूरा हिसाब देश की सरकार के पास रहे ,लेकिन यहाँ तो पता नहीं ,किस जरिये से देश की दौलत विदेशी बैंकों में कैद हो रही है .कुछ लोग  अपने ही देश की लक्ष्मी का अपहरण कर रहे हैं . वह धन विदेशों में किस काम में लगाया जा रहा है ,कौन देखने वाला है ?    हो सकता है इस दौलत का इस्तेमाल वे अपने ही देश के खिलाफ साजिश रचने में कर रहे हों  ! ऐसे लोगों के नाम बेनकाब होने ही चाहिए . .पारदर्शिता के इस युग में इन सफेदपोश डाकुओं के नाम गोपनीय रखना किसी भी मायने में उचित नहीं है . .ऐसे बेईमानों का मुँह काला करके सड़कों पर उनका जुलूस निकाला जाना चाहिए और चौक-चौराहों पर जूतों की मालाओं से ' नागरिक अभिनन्दन ' भी होना चाहिए .देश का धन विदेशी बैंकों में सीधे जमा करने की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए . भारत में विदेशी बैंकों की शाखाएं हैं तो केन्द्र सरकार उन्हें  साफ़ -साफ़ यह निर्देश जारी  कि वे किसी भी भारतीय नागरिक अथवा अप्रवासी भारतीय का रूपया भारत सरकार के अनापत्ति-प्रमाण पत्र के बिना  अपने बैंक में जमा नहीं  करें.! .देश में संचालित विदेशी बैंकों का दिन-प्रतिदिन  पूरा हिसाब भारतीय रिजर्व बैंक को भी अपने पास अनिवार्य रूप से रखना  चाहिए . (स्वराज्य करुण )

Wednesday, October 29, 2014

सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों की असलियत !

         निजी क्षेत्र में सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के नाम पर लूट-मार जारी है. हालांकि अपवाद स्वरुप कुछ अच्छे अस्पताल और अच्छे डॉक्टर भी होते हैं , जिनमे  परोपकार और समाज  सेवा  की भावना जीवित है ,लेकिन अधिकाँश अस्पतालों की व्यवस्था देखकर लगता है कि मानवता खत्म हो गई है .अपने एक मित्र के बीमार पिताजी को देखने एक ऐसे ही स्वनाम धन्य अस्पताल गया तो मित्र ने बताया --- इस अस्पताल के डॉक्टरों की आपसी बातचीत अगर सुन लें तो आपको डॉक्टर और हैवान में कोई अन्तर नज़र नहीं आएगा .ये डॉक्टर अपने लंच टाईम में आपसी चर्चा में मरीजों को क्रिकेट का 'विकेट' कहते हैं. .एक डॉक्टर दूसरे से कहता है -आज चार विकेट आए थे ,एक विकेट गिरा है .
 दरअसल  सुपर स्पेशलिटी में स्पेशल बात ये होती है कि वहाँ किसी गंभीर मरीज को ले जाने के बाद सबसे पहले बिलिंग काऊंटर में बीस-पच्चीस या पचास हजार रूपए जमा करवा लिए जाते हैं . उसके बाद शुरू होता है असली लूट -खसोट का सिलसिला . मरीज को आई.सी. यू .में भर्ती करने के बाद तरह-तरह के मेडिकल टेस्ट करवाने और हर दो -चार घंटे बाद नई -नई दवाइयों की लिस्ट उसके परिजन को थमा दी जाती है .उसी अस्पताल के परिसर में अस्पताल मालिक का मेडिकल स्टोर भी होता है .यह मरीज के घर के लोगों के लिए सुविधा की दृष्टि से तो ठीक है ,लेकिन वहाँ दवाईयां मनमाने दाम पर खरीदना उनकी मजबूरी हो जाती है.मरीज को छोड़कर ज्यादा दूर किसी मेडिकल स्टोर तक जाने -आने का जोखिम उठाना ठीक भी नहीं लगता . खैर किसी तरह अगर दवाई खरीद कर डॉक्टर को दे दी जाए तो उसके बाद यह पता भी नहीं चलता कि उन सभी दवाइयों का इस्तेमाल मरीज के लिए किया गया है या नहीं ?गौर तलब है कि आई.सी. यू. में मरीज के साथ हर वक्त उसके परिजन को मौजूद रहने की अनुमति नहीं होती .उसे बाहर ही बैठकर इन्तजार करना होता है .वह बड़ी व्याकुलता से समय बिताता है. उसे केवल आई.सी.यू. में दाखिल अपने प्रियजन के स्वास्थ्य की चिन्ता रहती है,लिहाजा डॉक्टर से कई प्रकार के मेडिकल टेस्ट का और मरीज के लिए खरीदी गयी दवाइयों के उपयोग का हिसाब मांगने की बात उसके मन में आती ही नहीं. इसका ही बेजा फायदा उठाते हैं कथित सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के मालिक और डॉक्टर .वैसे इस प्रकार के ज्यादातर अस्पतालों के मालिक स्वयं डॉक्टर होते हैं .सरकार तो जन-कल्याण अच्छे  इरादे के साथ गरीब परिवारों को स्मार्ट -कार्ड देकर उन्हें सालाना एक निश्चित राशि तक निशुल्क इलाज की सुविधा देती है यह सुविधा पंजीकृत अस्पतालों में दी जाती है ,लेकिन वहाँ डॉक्टर कई स्मार्ट कार्ड धारक परिवार के किसी एक सदस्य के एक बार के इलाज में ही अनाप-शनाप खर्च बताकर स्मार्ट कार्ड की पूरी राशि निकलवा लेते हैं.
     दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी अस्पताल हैं ,जहां गंभीर से गंभीर बीमारियों का मुफ्त इलाज होता है.जैसे - नया रायपुर और पुट्टपर्थी  स्थित श्री सत्य साईसंजीवनी अस्पताल ,जहां जन्मजात ह्रदय रोगियों का पूरा इलाज और ऑपरेशन मुफ्त किया जाता है .यह एक ऐसा अस्पताल है ,जहाँ कोई बिलिंग काऊंटर नहीं है. मरीजों के और उनके सहायकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था भी निशुल्क है .-स्वराज्य करुण

Monday, October 13, 2014

( ग़ज़ल ) भोली आँखों से दुनिया को ...!

                                देख रहे भोली आँखों से दुनिया को सीधे-सादे लोग,
                                समझ न पाएं इस फरेबी महफ़िल के इरादे लोग !

                                 नकाबपोशों के नगर में नक्कालों का  स्वागत खूब ,
                                 दहशत में जाने कहाँ गए इस बस्ती के आधे लोग !
                                
                                सच्चाई की बात भी करना पागलपन कहलाता है ,
                                झूठी कसमों के संग करते सौ-सौ झूठे वादे लोग !
                                
                                उल्टी- सीधी  चालें चलती चालबाज की माया है ,
                                नासमझी में बन जाते हैं सियासतों के प्यादे लोग !
                               
                                हीरे-मोती के चक्कर में चीर रहे धरती का सीना .
                                खेती के रिवाज़ को चाहे पल भर में  गिरा  दें लोग !
                                
                                उनकी पुस्तक में न जाने दिल वालों का देश कहाँ ,
                                शायद असली के बदले दिल नकली दिलवा दें लोग ! 
                                
                                 वक्त आ गया अब चलने  का इस मुसाफिरखाने से ,
                                 आने  वाले हैं यहाँ  भी हुक्कामों  के शहजादे  लोग !
                                                                         -- स्वराज्य करुण

Saturday, June 14, 2014

विज्ञापनों के लिए भी बनाया जाए सेंसर बोर्ड !

            विज्ञापनों की विश्वसनीयता का भी कोई क़ानून सम्मत वैज्ञानिक प्रमाण होना चाहिए. मेरे विचार से  केन्द्र सरकार को फिल्म सेंसर बोर्ड की तरह विज्ञापन सेंसर बोर्ड भी बनाना चाहिए .उपभोक्ता वस्तुओं के प्र्काशित और  प्रसारित  होने वाले विज्ञापनों में सेंसर बोर्ड का प्रमाणपत्र भी जनता को दिखाया जाना चाहिए ताकि फूहड़ और अश्लील विज्ञापनों को समाज में प्रदूषण फैलाने से रोका जा सके . 
      आजकल टेलीविजन चैनलों में और अखबारों में तरह -तरह की दवाइयों, कई प्रकार के तेल और साबुनों ,विभिन्न प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों ,बिस्किट आदि पैकेट बन्द खाद्य वस्तुओं के विज्ञापनों की भरमार है. होर्डिंग्स में भी बड़े-बड़े दावों के साथ विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं . तन्त्र-मंत्र के विज्ञापन भी छपते और प्रसारित होते हैं .बाजारवाद के इस बेरहम और बेशर्म दौर में अधिकाँश विज्ञापनों की भाषा भी सामाजिक-सांस्कृतिक और पारिवारिक मर्यादाओं के खिलाफ नज़र आती है . कई बार टेलीविजन चैनलों में खबरों और कार्यक्रमों के बीच अचानक ऐसे फूहड़ विज्ञापन आने लगते हैं,जिनके शब्दों को किसी भी संस्कारवान भारतीय घर में अशोभनीय माना जाता है .
         औषधियों और उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की विश्वसनीयता जांचने के लिये दर्शकों और पाठकों के पास तत्काल कोई उपाय नहीं होता .ऐसे में प्रत्येक विज्ञापनदाता के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वह अपने विज्ञापन में किए जा रहे दावों का एक विधि सम्मत सरकारी प्रमाण पत्र भी विज्ञापित वस्तु के साथ सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करे ,टेलीविजन के परदे पर भी ऐसे प्रमाणपत्र को  प्रसारित किया जाए करे और अगर अखबार में विज्ञापन छपे तो उसके साथ भी ऐसा एक कानूनी प्रमाणपत्र अनिवार्य रूप से छापा जाए..मिसाल के तौर पर अगर किसी टूथ-पेस्ट ,केश-तेल ,दवाई आदि सेहत से जुडी वस्तुओं का विज्ञापन है तो उसके साथ सरकारी मेडिकल बोर्ड का भी प्रमाण-पत्र लगाना अनिवार्य हो. 
      इसी तरह अन्य वस्तुओं के विज्ञापनों में भी उनसे संबंधित विषयों के तकनीकी जानकारों की एक सरकारी कमेटी उन्हें प्रमाणित करे और उनका प्रमाणपत्र विज्ञापन के साथ प्रसारित-प्रदर्शित और प्रकाशित हो. वस्तुओं के पैकेटों और डिब्बों में भी यह प्रमाणपत्र लगाया जाना चाहिए .संक्षेप में यह कि चाहे प्रिंट मीडिया में छपने वाले विज्ञापन हों ,या इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रदर्शित या प्रसारित होने वाले विज्ञापन , उनके दावों की सच्चाई और उनकी भाषा की मर्यादा  को जांचने और उसे अनुमोदित करने के लिए सेंसर बोर्ड जैसी एक सरकारी संस्था  बननी चाहिए .यदि विज्ञापनों के लिए कोई सुस्पष्ट नियम-क़ानून बन सके और उन पर निगाह रखने वाली कोई संस्था  बन जाए , तो देश की जनता को भ्रामक विज्ञापनों के मायाजाल से काफी हद तक बचाया जा सकेगा .- स्वराज्य करुण