Saturday, September 24, 2011

काश ! भस्म हो जाए सोने की लंका !

         अगर आपका या मेरा चार सदस्यों वाला परिवार शहर में रहकर रोज बत्तीस रूपए और गाँव में रहकर रोज छब्बीस रूपए में अपने दो वक्त के भरपेट भोजन का इंतजाम कर सकता है , तो यकीन मानिए कि आप और मै कतई  गरीब नहीं है. यह हम नहीं कह रहे हैं ,बल्कि हमारे देश का  योजना आयोग कह रहा है , जिसने  इक्कीस सितम्बर को देश की सबसे बड़ी अदालत में हलफनामा दायर कर यह दलील दी है. मेरे विचार से अगर यह राशि  किसी परिवार के दो वक्त के भर पेट भोजन के लिए काफी हैं, तो ऐसा कहने वाले सबसे पहले खुद इतने ही रूपए  में अपना परिवार पाल कर दिखाएँ .तभी तो जनता को मालूम होगा कि हमारे मुखिया कहलाने वालों की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है .
       गरीबी रेखा निर्धारण के लिए  जब छब्बीस और बत्तीस रूपए भोजन खर्च की यह  दलील अदालत में पेश की गयी , ठीक उसी दिन एक बड़े शहर में लोक निर्माण विभाग के एक मुख्य अभियंता के घर पर सतर्कता विभाग वालों ने छापा मार कर साढ़े छह करोड़ रूपए की अनुपातहीन चल-अचल सम्पत्ति  का खुलासा किया था क्या मजाक है ? एक तरफ तो हमारे देश के लिए विकास योजनाओं का स्वरुप तय करने वाला सबसे बड़ा आयोग कह रहा है कि एक परिवार महज छब्बीस या बत्तीस रूपए रोज के हिसाब से भोजन कर ले, यानी महीने में हज़ार रूपए से भी कम खर्च में जीवन चला ले ,तो वह गरीबी के अभिशाप से मुक्त माना जाएगा ,वहीं दूसरी तरफ एक सरकारी अफसर साढ़े छह करोड़ की बेहिसाब सम्पत्ति के ढेर पर बैठा हुआ है .कुछ माह पहले मध्यप्रदेश के एक अफसर दम्पत्ति के घर छापे में सैकड़ों करोड़ रूपए की बेहिसाब दौलत का पता चला  था. इधर हसन अली जैसे डाकू  तो आठ सौ करोड़ रूपयों के मालिक बनकर बैठे हैं,जबकि देश की आबादी महज़ एक सौ इक्कीस करोड़ है .मुबई में अम्बानी सेठ अपनी शान-शौकत के प्रदर्शन के लिए सत्ताईस मंजिला बिल्डिंग तान लेता है और कोई उसे कुछ भी नहीं कहता ! इसके जैसे कई सेठों ने देश के नागरिकों के शेयर के रूपयों को अपनी सम्पत्ति मान कर फैक्ट्री और महल, क्या -क्या नहीं खड़े कर लिए हैं ?
           बहरहाल, अमीरों के वैभव-प्रदर्शन के बीच  निर्धनता  की एक अनोखी परिभाषा  देकर शायद योजना आयोग भारत में गरीबी के आंकड़ों को कम दिखाने की कोशिश कर रहा है ,ताकि दुनिया को बताया जा सके कि भारत अब एक अमीर देश है.आयोग का यह हलफनामा  ऐसे समय में आया है , जब देश में डीजल-पेट्रोल से लेकर चावल, गेहूं, शक्कर ,दाल,तेल जैसी हर ज़रूरी चीज की कीमत रोज आसमान छू रही हैं .अभी पिछले हफ्ते १६ सितम्बर के एक सांध्य दैनिक 'छत्तीसगढ़'  में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के हवाले से छपी एक रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र सरकार के अधिकाँश यानी सतहत्तर प्रतिशत मंत्री करोड़पति हैं और उनमें से कई मंत्रियों की संपत्ति सिर्फ दो साल में चार गुना ,आठ गुना और बारह गुना तक बढ़ गयी है . क्या ये लोग गाँव में छब्बीस रूपए और शहर में बत्तीस रूपए में अपने परिवार का पेट पाल सकते है.दैनिक 'लोकमत समाचार ' के पन्द्रह सितम्बर के अंक में छपी एक खबर के अनुसार विदेशों में जमा भारतीयों के काले धन की वापसी के लिए हमारी भारत सरकार प्रोत्साहन के रूप में आम-माफी की एक  आकर्षक योजना ला सकती है. केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है कि विदेशी बैंकों में छुपाए अपने काले धन की स्वयम घोषणा कर दे ,तो उसे माफ कर देना चाहिए !  यानी सफेदपोश डाकुओं को मिल सकती है माफी और गरीबों के  दो टाईम के भोजन के लिए  सिर्फ छब्बीस और बत्तीस रूपए ही काफी ? क्या  महंगे पांच सितारा और सात सितारा होटलों में भी सिर्फ इतने ही रूपयों में भोजन मिल सकता है ? क्या जनता के शेयर के अरबों रूपयों से मुंबई में अपने लिए सत्ताईस मंजिला महल खड़ा करवाने वाले सेठ जी भी सिर्फ छब्बीस रूपए या बत्तीस रूपए रोज के हिसाब से अपने परिवार का पालन-पोषण कर पाएंगे ? देश में ऐसे कई आलीशान महल हैं ,जहां रहने वालों के वैभव-विलासिता का जीवन देख कर लगता है कि रामायण में वर्णित  स्वर्ण-लंका भी कुछ ऐसी ही रही होगी !
           कुछ दिनों पहले सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत में  प्रति लीटर तीन रूपए का इजाफा करके महंगाई की आग में घी डालने का काम किया और अब योजना आयोग निर्धनता की नई परिभाषा बना कर गरीबों  के दिल में लगी आग में पेट्रोल डालने का प्रयास कर रहा है . हे भगवान ! काश ! गरीबों के दिल की ये आग आज के किसी रावण के सोने की लंका को भस्म कर पाती !  रामायण की कहानी से भी  यह साबित हो जाता है कि राम राज तभी आया ,जब लंका भस्म हो गयी   !
                                                                                                                   स्वराज्य करुण


                                                                                                      

Wednesday, September 21, 2011

प्याज से आएँगे खून के आँसू !


देश के हर घर की रसोई में सलाद और सब्जियों के लिए ज़रूरी आयटम है प्याज ,लेकिन क्या अब वह भी हमें रुलाएगा खून के आंसू? आज के अखबारों की सुर्खियाँ देख कर तो दिल में यही सवाल कौंध रहा है.नई  दिल्ली से खबर  छपी है कि भारत से विदेशों के लिए प्याज भेजने पर इसी महीने की आठ तारीख को अ जो पाबंदी लगी हुई थी ,उसे सिर्फ बारह दिनों के भीतर यानी  कल  से हटा लिया गया है .यानी अब प्याज निर्यात किया जा सकेगा. क्या इससे हमारे देश में प्याज की मांग के मुकाबले आपूर्ति कम नहीं होगी और क्या इसके फलस्वरूप देश के खुले बाज़ारों में इसकी कीमत और भी ज्यादा नहीं बढ़ जाएगी ? कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों ने प्याज निर्यात पर लगे प्रतिबंध का भारी विरोध किया था , इसलिए उनकी मांग स्वीकार करते हुए केन्द्र ने निर्यात पर लगी रोक हटाने का निर्णय लिया है. क्या इन दोनों राज्यों के किसान देश के अन्य राज्यों की जनता के हितैषी नहीं हैं ?क्या महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों को महंगाई से परेशान देश की कोई फ़िक्र नहीं है ? ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता .समाचारों में यह स्पष्ट नहीं है कि इन दोनों राज्यों के कितने किसानों ने कब और कहाँ प्याज निर्यात पर पाबंदी का विरोध किया था ? दरअसल यह सारा खेल और कुचक्र कुछ मुट्ठी भर ऐसे लोगों का है ,जो देश के बाज़ारों में अनाज और दूसरी खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति में इसी तरह का खलल डालकर महंगाई बढाने में लगे रहते. हैं ! क्या हमारे किसानों को देशी बाजारों में प्याज की बेहतर कीमत नहीं मिल सकती ? क्या महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान आम भारतीयों से अलग है?वास्तव में ऐसा कुछ भी नही है ,लेकिन यह मात्र मुट्ठी भर मुनाफाखोर व्यापारियों की साजिश है, जो भोलेभाले किसानों के नाम पर ऐसा घटिया खेल खेल रहे हैं ,जिससे देश की जनता महंगाई के कुचक्र में फँसी रहे और मुनाफाखोरों के महलों में दौलत की बारिश होती रहे !
                                                                                                              स्वराज्य करुण

Tuesday, September 20, 2011

(गीत ) मेरे गाँव का पनघट !

                                             
                                                            
                                                     तूफानों से तहस-नहस
                                                     गाँवों के देश में ,
                                                     रोटी के लिए दौड़ते
                                                     पांवों के देश में !
                                                         
                                                       मदमस्त मचलती विष-कन्याओं का जमघट ,                                                                                           ये देख के घबराया  मेरे गाँव का पनघट !
                                              
                                                  बाढ़ से बेघर , बेहाल 
                                                  किसानों  के देश में ,
                                                  चिथड़ों को तरसते
                                                  इंसानों के देश में !
                                                    
                                                        शौक से निर्वसन  औरतों की खिलखिलाहट ,
                                                        ये देख के घबराया  मेरे गाँव  का पनघट !

                                                रुपयों के खुले खेल में
                                                मांसल मुस्कान लिए
                                                उतरी हैं आसमान से
                                                देह की दुकान लिए !

                                                            दूर कहीं फेंक आयीं  रिश्तों का घूंघट ,
                                                            ये देख के घबराया मेरे गाँव का पनघट  !

                                               इन्हें नहीं  कुछ लेना-देना
                                               चट्टान तोड़ती राधा से ,
                                               दुधमुँहे  के  दूध के लिए
                                               हाथ जोड़ती राधा से !
                     
                                                       इन आँखों से कहाँ दिखेगी उसकी  घबराहट ,
                                                       ये देख के घबराया मेरे गाँव का पनघट !
                                                                                                --- स्वराज्य करुण  


(  सन्दर्भ -  बेंगलुरु में सन 1996 में आयोजित विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता  )
  प्रतीक फोटो google से साभार

Monday, September 19, 2011

बिन भूकम्प यहाँ डोले धरती !

             फैक्ट्री की सुबह  की पाली शुरू  होने से पहले  सुखीराम   के टपरे में  कुछ मजदूर चाय-भजिये  के साथ आज का  अखबार देख रहे थे. सुर्ख़ियों में देश के कुछ राज्यों में आए भूकम्प की खबरों के साथ वहाँ जान-माल को हुए नुकसान की तस्वीरें भी छपी थीं. बड़े-बड़े गड्ढों और दरारों वाली एक क्षतिग्रस्त सड़क की तस्वीर देख कर बनमाली कहने लगा- अरे ! ये तो अपने शहर की सड़क लग रही है .हमारे यहाँ तो भूकम्प आया नहीं था ! फिर ये इस सड़क की फोटो उधर की  भूकम्प पीड़ित सड़क के नाम पर तो नहीं छप गयी ?  इस गंभीर सवाल पर सुखीराम के इस  टपरेनुमा रेस्टोरेंट में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण 'गोल-मेज सम्मेलन ' बिना किसी ताम-झाम के शुरू  हो गया .
               दयालू   ने बनमाली की शंका का समाधान किया-भाई ! फोटो  असली है और कुदरती भूकम्प से नष्ट हो चुकी सड़क की ही है .बनमाली को समझाने के बाद वह  कहने  लगा -वाकई  असली भूकम्प से टूटी- फूटी सड़क और बगैर भूकम्प के उखड़ी सड़क में आज कोई फर्क नज़र नहीं आता . इसलिए तुम्हारा चकित होना स्वाभाविक ही था .अब तो भारत  में ऐसे कई शहर हैं ,जहां बिना भूकम्प के भी सडकें भूकम्पग्रस्त  लगने लगी हैं .धरती के डोले बिना ही  उनमें  गड्ढे बन जाते हैं ,जिनमें बारिश के मौसम में लोग  बड़े आराम से मछली पालन भी कर सकते हैं ,   हम-तुम  ऐसी खंडहरनुमा  सडकें तो हमारे शहर में चारों तरफ  रोज देखते हैं, उन पर मजबूरी में चलते भी हैं. दुपहिया , तिपहिया और  चौपहिया गाड़ियों में हिचकोले खाते हुए हम लोग तो इन सड़कों पर रोज आते-जाते हैं.गनीमत है कि इन हिचकोलों से अब तक किसी ह्रदय-रोगी का ह्रदय नहीं हिला  और   न ही किसी गर्भवती माता का प्रसव सड़क पर हुआ .लेकिन  रिक्टर पैमाने पर आशंकाओं की तीव्रता तो महसूस की ही जा सकती है .कुछ सड़कों पर कल बिछाई गयी डामर की परतें आज  उखड़ जाती हैं .पता नहीं , कौन कब उनमें बिछी हुई बजरी और गिट्टियों को  बाहर निकाल देता है और वह बिखर कर भूकम्प का नजारा पेश करने लगती है.
            आधी कप चाय की बची हुई बूंदों को सुड़कने के बाद रामगोपाल ने कहा -- हाँ यार !   किसी भी निर्माण कार्य को देखो, इंजीनियरों का तो कहीं दूर-दूर तक पता ही नहीं चलता . सारा जिम्मा मजदूरों के भरोसे छोड़ पता नहीं, कहाँ घूमते  रहते हैं ? कहीं टेलीफोन कम्पनियों के मजदूर केबल बिछाने के नाम पर गड्ढे खोद जाते हैं , तो कहीं जल-आपूर्ति की पाइप  -लाइन  मरम्मत के नाम पर सड़क की खोदाई हो जाती है ,खोदने वाले खोद कर चले जाते हैं और उन्हें खोजने वाले खोजते रहते हैं . कहीं चौड़ीकरण के नाम पर तोड़-फोड़ दस्ते  सड़कों से लगी निजी और सरकारी दोनों तरह की दीवारें ढहा कर चले जाते हैं और मलबा सफाई के लिए मुड़कर भी नहीं देखते ! मलबे का ढेर वहाँ कई-कई दिनों तक लगा रहता है  बिना सोचे-समझे वर्षों पुराने हरे-भरे पेड़  बेरहमी से काट दिए जाते हैं  .गर्मियों में राहगीर छाया के लिए तरसते रहते हैं . कई शहरों में ओवर -ब्रिजों का निर्माण अधूरा पड़ा है , उन पर हम जैसे राहगीर हर दिन बेतरतीब यातायात की यातना झेलते रहते हैं .उधर भूकम्प की वजह से  भवनों में  दरारें  पड़ जाती हैं, जबकि इधर भूकम्प आए बिना ही कल की  बनी  इमारतों  में  भी आज   क्रेक  आ जाती हैं . फिर भी हम लोग आराम से जी रहे हैं .धरमू ने टोका - आराम से जी नहीं ,बल्कि लाचारी में जी रहे हैं . करें भी तो क्या करें ? कौन सुनने वाला है ?
       बनमाली ने कहा -  हाँ भाई ! हम हर तरह का भूकम्प आराम से झेल लेते हैं  .हमारी झेलन-शक्ति गज़ब की है .लेकिन अपनी  उन सड़कों और इमारतों का क्या कहें ,जो  भ्रष्टाचार के भयानक भूकम्प से भयभीत होकर भसकने की हालत में आ चुकी हैं. ? लगता है ,यहाँ धरती बिना किसी भूकम्प के डोल  रही है . क्या कोई बता सकता है -  रिक्टर स्केल पर इस गैर कुदरती भूकम्प की तीव्रता कितनी होगी ? उसके  इस सवाल का किसी के पास कोई ज़वाब नहीं था !  तभी उधर पाली शुरू होने का सायरन बजा और इधर सुखीराम के टपरे में मजदूरों का 'गोल मेज सम्मेलन ' खत्म हुआ और  वे चल पड़े फैक्ट्री के भीतर . 
                                                                                                      -  स्वराज्य करुण 

  ( फोटो : google  से साभार )

Saturday, September 17, 2011

पेट्रोल बम का धमाका !

                                     दाम बढाकर पहले ही
                                     छीन लिया है दम ,         
                                     आज फिर से फोड़ दिया                                       
                                     उसने पेट्रोल बम /
                                     पूछो  तो सही कौन है वो
                                     चीख रही है  जनता
                                     और मौन है वो ?
                                 
                                     रोज-रोज के धमाके
                                     और ये सितम
                                     लोग मरें या डरें,
                                     उनको नहीं गम  /
                                     जनता की जेब
                                     हो रही खाली  ठंडी
                                      पर उनकी तिजोरी
                                      दिनों-दिन गरम /

                                      जनतन्त्र  के मैदान में 
                                      जोड़ कर हाथ ,
                                      जीत कर लड़ाई  
                                      जनता   से करे  घात /
                                      पूछो तो सही कौन है वो ,
                                      चीख रही जनता
                                      और मौन है वो /


                                      कहाँ गया सौ दिन में
                                      कीमत कम करने  का वादा,
                                      अब तो है केवल
                                      लूट-खसोट का इरादा /
                                      नेता और अफसर का 
                                      गोपनीय समझौता  ,
                                      बाँट लेंगे आपस में
                                      आधा -आधा  /
                                      देखते ही देखते
                                      हो गए  दोनों  करोड़पति
                                      साधू के वेश में
                                      न  जाने किसको साधा /


                                     न्याय और अन्याय के 
                                     महाभारत में
                                     खामोश हैं जो मजबूरी में ,
                                     शायद  आचार्य द्रोण  हैं वो /  
                                     चीख रही जनता 
                                     और  मौन हैं वो  /

                                                               -   स्वराज्य करुण

Friday, September 16, 2011

आग में घी बना पेट्रोल !

                                    बोल जमूरे बोल.
                                    अब क्या होगा बोल ,
                                    महंगाई की आग में
                                    घी बना पेट्रोल  !
                                    इधर तीन रूपए लीटर
                                    बढ़ गया दाम,
                                    उधर सरकारी लोगों का
                                    बन गया काम  /
                                    उडाएंगे खूब धुंए के छल्ले ,
                                    हो गई उनकी बल्ले-बल्ले ,
                                    पेट्रोल की कीमतों के साथ
                                    बढा उनका महंगाई भत्ता ,
                                    उनकी तो हमेशा रहेगी सत्ता ,
                                     पम्प मालिकों की भी
                                     हो गयी चाँदी,
                                     इसी तरह चलती रहेगी
                                     महंगाई की आँधी
                                     जय हो सोनिया -राहुल गांधी  /
                                     गरीब की रसोई पर भी
                                     होने वाला है हमला ,
                                     आटे-दाल के साथ जब
                                     बढ़ेगी रसोई गैस की कीमत ,
                                     तब क्या करेगी कमला  ?
                                                 
                                                              -  स्वराज्य करुण                            
                         

Thursday, September 15, 2011

अकल-कर्मी और सकल-कर्मी !


          देश में इन दिनों दो तरह के कर्मी साफ़ नज़र आ रहे हैं - अकल कर्मी और सकल कर्मी . वैसे शिक्षा -कर्मी और पंचायत कर्मी भी यहाँ पाए जाते हैं , लेकिन आबादी में  अकल कर्मियों और सकल कर्मियों की  संख्या ज्यादा है.  अकल-कर्मी केवल अकल से काम लेता है और लोगों से काम निकलवा भी लेता है . वह समुद्र न सही अपनी बस्ती में अवैध कब्जे की भेंट चढ़ रहे तालाब की लहरें गिन कर भी कमाई कर लेने की अकल रखता है . दूसरी तरफ 'सकल कर्मी है , जो काला बाजारी ,मुनाफाखोरी और रिश्वतखोरी समेत हर तरह के काम आसानी से  करता रहता  है , लेकिन ऐसा कोई भी काम वह अकल-कर्मी से अकल उधार लेकर ही करता है, भले ही  उधार चुकता कर पाए या न भी कर पाए.  सकल-कर्मी तो बाबा तुलसीदास की इन पंक्तियों को अपना आदर्श मान कर चलता है-
                                    सकल पदारथ है जग माही 
                                     करमहीन नर पावत नाही !

 इसलिए सकल पदारथ पाने के लिए ही सकल-कर्मियों की जमात अकल-कर्मियों को साध कर चलती है. अकल-कर्मी उन्हें नोटिंग से लेकर वोटिंग तक हर जगह 'अकल-दान 'करते रहते हैं और उन्हीं के सहयोग से सकल-कर्मी सकल करम करने से नहीं घबराते. साल में दो-तीन बार सकल-कर्मी और अकल-कर्मी  एक साथ पर्यटन के लिए भी निकल पड़ते हैं.  सकल-कर्मियों   और अकल-कर्मियों के रिश्ते ग्राहक और दुकानदार जैसे होते तो हैं,लेकिन दोनों एक दूसरे के पूरक होने के कारण इस रिश्ते में खटास नहीं होती .हमेशा मिठास बनी रहती है क्योंकि लक्ष्य दोनों का एक ही होता है .सच तो यह है कि दुकानदार और ग्राहक के बीच अच्छे संबंध हों  तो कारोबार में  कोई रुकावट नहीं आती. इसलिए तीर्थ यात्राएं भी बिना किसी रुकावट के, चलती रहती हैं. रिश्ता   बिगड जाने पर एक बार एक अकल-कर्मी ने एक सकल-कर्मी  के घर छापे डलवा दिए . बिस्तर  के नीचे से , बाथरूम की दीवारों से , बैंक-खातों से , न जाने कहाँ -कहाँ से कम  से कम ढाई सौ करोड रूपए नगद निकले. .छापा डालने वालों को नोट गिनने की मशीन मंगवानी पड़ी. बेचारा सकल कर्मी बहुत परेशान हुआ . अकल-कर्मी से रिश्ता अच्छा बनाने के लिए पंडित जी की सलाह पर उसने 'रिश्वत-यज्ञ ' किया. दोनों की दोस्ती फिर बहाल  हो गयी . तब से लेकर अब तक यह दोस्ती बदस्तूर कायम है. अब सारे अकल-कर्मी और सकल-कर्मी एक साथ ,एक ही थाली में खाते हैं . देश के अनेक नामी-गिरामी अकल-कर्मी और सकल-कर्मी आज-कल   'तिहाड़ '   की तीर्थ-यात्रा पर हैं.
    साथियों ! कोयले की दलाली और  ज़मीन-दलाली समेत सकल करम करने के बाद जब करने के लिए और कुछ बाकी नहीं रह जाता  तो सारे सकल-कर्मी अपने-अपने साथी अकल-कर्मियों को साथ लेकर तीर्थ -यात्रा पर निकल पड़ते हैं . स्विस-बैंकों की गंगोत्री से इंटरनेट की सूक्ष्म तरंगों के ज़रिये प्रवाहित  गुप्त-गंगा के किनारे इन दिनों तीर्थ यात्रियों के रूप में सकल-कर्मी और अकल -कर्मी ,  दोनों ही तरह के कर्मियों की भारी भीड़ है. दोनों इस बहती गंगा में जमकर हाथ धो रहे हैं.  .  अकल-कर्मी और सकल -कर्मी के बीच एक अघोषित समझौता है . उनकी स्विस-बैंक वाली तीर्थ-यात्रा में विघ्न-संतोषी किसी प्रकार का विघ्न मत डाले, इसके लिए दोनों हमेशा सचेत रहते हैं. कबीरदास जी ने करीब छह सौ साल पहले एक दोहा इन पुण्यात्माओं को सादर समर्पित किया था  -
                                             तीरथ चले दोई जन, चित चंचल मन चोर ,
                                             एकौ पाप ना उतरया , दस मन लाए और !

भावार्थ यह कि चंचल मन के साथ तीर्थ यात्रा पर गए थे अपना पाप धोने ,पर एक भी पाप नहीं उतरा ,बल्कि दस मन पाप और भी लादकर लौट आए . इसे पढकर तो लगता है कि जो छह सौ साल पहले होता था , वही आज भी हो रहा है. चंचल और चोर ह्रदय के साथ तीर्थ यात्रा करने वालों का ही आज हर जगह बहुमत है. इस दोहे से यह भी मालूम होता है कि हर तीर्थ यात्री में कम से कम दस मन पाप का बोझ खुद पर लादकर चलने की ताकत होनी चाहिए . ज्यादा से ज्यादा आप चाहे  जितना लाद सकें,यह आपकी हैसियत और हौसले पर निर्भर है. तीर्थ यात्रा के लिए यह भी ज़रूरी है कि यात्री का चित्त चंचल हो, यानी वह सरकारी ,गैर-सरकारी , हर तरह के तौर-तरीकों के अनुसार इधर-उधर मुँह मारने की कला में दक्ष हो. यात्रा के आयोजक और प्रायोजक यानी अकल-कर्मी और सकल-कर्मी उसे हर जगह मिल जाएंगे .मिल क्या जाएंगे, आपसे मिलने वह खुद आपके पास दौड़े चले आएँगे.
                                                                                                       --  स्वराज्य करुण