छत्तीसगढ़ के गाँवों और शहरों में
सुआ गीतों की अनुगूँज : हर घर -आंगन में सुआ नृत्य की रौनक
(आलेख - स्वराज्य करुण )
तरी हरि नाना , मोर नाहना रे सुआना,
तरी हरि नाना ओ....
आमा के डार बोले मैना,
तोर बंसी मिठ लागे कन्हैया,
बोलत हे सुग्घर परेवना.
ये पंक्तियाँ हैं उन बेटियों के समूह स्वरों की, जो कल 7नवम्बर की दोपहर गाँव के घरों में घूमते हुए मेरे घर में भी सुआ नृत्य के लिए आई थीं. दीवाली के इस मौसम में छत्तीसगढ़ के गाँवों और शहरों में, विशेष रूप से मैदानी इलाकों में पारम्परिक सुआ गीतों के साथ सुआ नृत्य की भी धूम मची हुई है. सड़कों और गलियों में सुआ गीतों की सामूहिक अनुगूँज है.हर घर -आंगन में सुआ नृत्य की रौनक है. आंगन गाँव की बेटियों के मीठे सामूहिक स्वरों से गुलज़ार हैं.रंग -बिरंगे कपड़ों में सज -धज कर बेटियाँ समूह में घर -घर जाकर गोल घेरा बनाकर, ताली बजाते हुए छत्तीसगढ़ी सुआ गीत गाती हैं और नृत्य करती हैं.बाँस की एक टोकनी में थोड़े धान या चावल के साथ बीच में प्रतीक स्वरूप मिट्टी से निर्मित सुआ ( तोता या मिट्ठू )भी रखा जाता है.जिस घर से चावल और थोड़ा रुपया या पैसा, जो भी मिल जाए, टोकनी में हँसी - खुशी से लेकर घर के लोगों को शुभकामनाएँ देते हुए बेटियाँ आगे बढ़ जाती हैं. इनमें से कई बेटियाँ स्कूलों में पढ़ाई भी करती हैं, लेकिन अभी दीवाली की छुट्टियां चल रही हैं, इसलिए इसलिए उत्साह के साथ इस नृत्य में शामिल हो रही हैं.सुआ नृत्य का सिलसिला दीवाली से कुछ दिन पहले शुरू हो जाता है और देवउठनी एकादशी तक चलता है. कृषि संस्कृति पर आधारित छत्तीसगढ़ में धान कटाई के मौसम में महिलाओं के इस लोकनृत्य की रंगत देखते ही बनती है.
ग्राम -सरकड़ा की बेटियों की सुआ नृत्य मंडली
बेटियों का सुआ नृत्य प्रदर्शन
बेटियों की ऐसी ही एक सुआ नृत्य मंडली 7नवम्बर की दोपहर मेरे गाँव के मोहल्लों में भी लोगों के घरों में जाकर नृत्य कर रही थीं. जिस घर में भी वे जातीं , वहाँ के आंगन की रौनक देखते ही बनती थी। ये मेरे पड़ोस के गाँव सरकड़ा की हैं.वे मेरे घर भी आईं. मैंने सपरिवार उनका स्वागत किया.उन्होंने उत्साहपूर्वक नृत्य किया और सहर्ष फोटो भी खिंचवाया . उनके साथ मृदंग पर संगत कर रहे युवक खिलेश्वर भी सरकड़ा के हैं, लेकिन वे कर्नाटक के एक पोल्ट्री फार्म में मुर्गे -मुर्गियों की बीमारियों से बचाव के लिए टीका लगाने का काम करते हैं. खिलेश्वर ने बताया कि अपने गाँव सरकड़ा की इस सुआ नृत्य मंडली में मृदंग वादन के लिए कर्नाटक से ख़ास तौर पर यहाँ आए हैं.हालांकि तोते को प्रतीक बनाकर गाया जाने वाला सुआ गीत छत्तीसगढ़ी भाषा का पारम्परिक लोकगीत है जो बेटियों द्वारा गाया जाता है.खिलेश्वर का कहना है कि सुआ नृत्य के साथ मृदंग और कुछ अन्य साधारण वाद्य यंत्रों के वादन की यह परम्परा सिर्फ़ महासमुन्द जिले में है. सुआ गा रही बेटियाँ स्वयं इन गीतों की रचना कर लेती हैं. आज वे अपना स्वरचित गीत गा रही थीं. उनके साथ एक बुजुर्ग खंजरी वादक भी थे.
तरी हरि नाना, मोर नाहना रे सुआना,
तरी हरि नाना ओ....
समूह स्वरों में इन शब्दों के साथ सुआ गीत की शुरुआत होती है. इस गीत की ये प्रारंभिक पंक्ति है, जो स्थायी रूप से प्रचलित है,जिसमें आगे के अंतरा की पंक्तियाँ नृत्य मंडली में शामिल बेटियाँ अलग -अलग प्रसंगों के साथ अपनी तरफ से जोड़ती जाती हैं.जैसे ग्राम सरकड़ा की बेटियाँ आज इसमें यह अंतरा बनाकर गा रही थीं -
आमा के डार बोले मैना,
तोर बंसी मिठ लागे कन्हैया,
बोलत हे सुग्घर परेवना
अर्थात् - "आम की डाली में मैना बोल रही है कि हे कन्हैया, तेरी बंशी की आवाज़ बहुत मीठी लग रही है. एक सुन्दर कबूतर ऐसा बोल रहा है."
इस नृत्य मंडली में शामिल बेटियों में चन्द्रमा ठाकुर और कामिनी ठाकुर 12वीं कक्षा की और जान्हवी सिंह 7वीं की छात्रा हैं. कुछ बेटियों ने पढ़ाई छोड़ दी है. सुआ मंडली में एक बुजुर्ग पुरुष और दो बुजुर्ग महिलाएं भी साथ चल रही थीं, बुजुर्ग महिला टोकनी में घरों से मिले चावल और रूपए पैसों को संभाल रही थीं. उनकी टोकनी में सुआ (मिट्ठू )नहीं थे. उनका कहना था कि शाम को सुआ सजाकर अन्य घरों में जाएँगी. आज गाँव के नज़दीक पिथौरा कस्बे में बेटियों की कई सुआ नृत्य मंडलियाँ दुकानों में जाकर समूह स्वरों में नृत्य कर रही थीं. गलियाँ और सड़कें उनके सुआ गीतों से गूँज रही थीं.वे आसपास के गाँवों से आईं थीं.
-स्वराज्य करुण


बनी रहे सुआ के गीतों की मिठास और जीवित रहे संस्कृति की महक
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