Sunday, October 2, 2022

(आलेख) महात्मा गांधी की पहली छत्तीसगढ़ यात्रा :दावे और प्रतिदावे

          (आलेख -स्वराज्य करुण   )

 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी  वास्तव में कितनी बार छत्तीसगढ़ आए थे? एक बार या दो बार? यह सवाल इसलिए कि उनकी पहली छत्तीसगढ़ यात्रा  को लेकर विद्वानों के बीच कई दावे और प्रतिदावे हैं। कुछ विद्वानों की मानें तो गांधीजी   दो दिन के दौरे पर 20 दिसम्बर 1920 को पहली बार यहाँ आए थे ।  अगर यह  दावा प्रामाणिक है तो उनके दो दिवसीय  छत्तीसगढ़ प्रवास के प्रसंग को आज  102 साल   पूरे हो गए हैं और वह 13 वर्षों के अंतराल में ,दो बार छत्तीसगढ़ आए थे। आइए , आज गांधी जी की  153 वीं जयंती के मौके पर उन्हें नमन करते हुए  इतिहास के पन्ने पलटकर उनकी इन यात्राओं के कुछ प्रमुख प्रसंगों को याद करें । स्वर्गीय हरि ठाकुर ने अपने महाग्रंथ 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' (प्रकाशन वर्ष 2003) में 'कण्डेल नहर सत्याग्रह के सूत्रधार :बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव' शीर्षक अपने आलेख मे लिखा है कि   20 दिसम्बर 1920 को पंडित सुन्दर लाल शर्मा गांधीजी को लेकर रायपुर पहुँचे। 


                                                   




  पहली यात्रा के दावे पर प्रश्न चिन्ह क्यों ?

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 वहीं दैनिक' हरिभूमि ' के 26 दिसम्बर 2020 के अंक में कनक तिवारी  ने अपने आलेख में गांधीजी की पहली छत्तीसगढ़ यात्रा पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया है। उनके आलेख का शीर्षक है - 'गांधी 1920 में छत्तीसगढ़ आए थे ?' कनक तिवारी इसमें लिखते हैं -- "  कुछ अरसा पहले एक संस्कृति कर्मी बुद्धिजीवी ने  उजागर किया कि वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ के रायपुर तथा धमतरी के प्रचारित प्रथम प्रवास को लेकर भरोसेमंद सबूत नहीं मिल रहे हैं। बीसियों लेख , विवरण ,पुस्तकें , इंटरव्यू और छिटपुट प्रतिक्रियाएं लगातार बताती रही हैं कि गांधी आए थे। ज़्यादातर समर्थक आश्वस्त लेखकों का जन्म 1920 के बाद हुआ है।भारत श्रुतियों और स्मृतियों का देश है।सुना हुआ मिथक इतिहास बना दिया जाता है। इतिहास लेकिन  मौखिक और दस्तावेजी सबूत मांगता है। तिवारी जी आगे लिखते हैं---  " छत्तीसगढ़ की राजनीति के शलाका पुरुष रविशंकर शुक्ल 1920 में 43 वर्ष के रहे थे। 1956 में प्रकाशित 'शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ'के पृष्ठ 44 पर उनका वाक्य है --सन 1920 की कलकत्ता की विशेष  कांग्रेस से पूर्व महात्मा गांधी रायपुर आए थे । गांधी के दिन प्रतिदिन का ब्यौरा गांधी शांति प्रतिष्ठान और भारतीय विद्या भवन बम्बई ने 1971 में मिलकर प्रकाशित किया । उसके अनुसार गांधी कलकत्ता से 17 दिसम्बर 1920 को चलकर 18 दिसम्बर को नागपुर पहुँचे ।फिर नागपुर से  8 जनवरी को चले गए।इस दरमियान गांधी 3 जनवरी को सिवनी तथा 6 और 7 जनवरी को छिंदवाड़ा प्रवास पर रहे। इस तरह कलकत्ता कांग्रेस के पहले रायपुर आने का शुक्ल का कथन समय सिद्ध नहीं है। तिवारी जी ने आगे यह भी लिखा है कि गांधी शताब्दी वर्ष 1969 में मध्यप्रदेश सरकार की पुस्तक 'मध्यप्रदेश और गांधीजी 'में उनका रायपुर ,धमतरी और कुरूद आना विस्तार से लिखते  व्यक्तियों के नाम और घटनाएं भी दर्ज हैं। लेकिन उन घटनाओं और व्यक्तियों से संबंधित तस्वीरें और समाचार पत्र जन दृष्टि में देखे नहीं जा पाए हैं। शताब्दी वर्ष में ही रविशंकर विश्वविद्यालय की एक पुस्तिका 'छत्तीसगढ़ में गांधीजी' यह तय करती है कि गांधी आए थे। हरि ठाकुर ,केयूर भूषण ,डॉ. शोभाराम देवांगन आदि का ऐसा कहना है।शोभाराम देवांगन ने आँखों देखा बयान दर्ज किया है । लेकिन कोई प्रमाण नहीं दिया।" अपने आलेख में तिवारीजी ने कई और तथ्यों के साथ अपने तर्क दिए हैं । उनके तर्क और तथ्य विचारणीय हैं ,लेकिन उनसे भिन्न राय रखने वालों ने भी गांधीजी के प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास को लेकर अपने संकलित तथ्यों के साथ इस प्रसंग का उल्लेख किया है और दावा भी किया है कि 1920 में गांधी जी पहली बार छत्तीसगढ़ आए थे। इस सिलसिले में  वरिष्ठ  लेखक और ब्लॉगर राहुल कुमार सिंह (Rahul Kumar Singh ) ने भी गांधी की तलाश ' शीर्षक से एक लेख लिखा है ,जिसे उन्होंने 21 सितम्बर 2020 को अपने  ब्लॉग 'अकलतरा डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम '  में कुछ विचारणीय तथ्यों के साथ  प्रकाशित किया है। उन्होंने इस लेख में कुछ विद्वानों द्वारा गांधीजी के प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास की  दी गयी अलग -अलग तारीखों का भी जिक्र किया है । मेरे विचार से इन सभी दावों और प्रतिदावों के परीक्षण के लिए तत्कालीन ब्रिटिश  प्रशासन के स्थानीय कलेक्टोरेट के रिकार्ड भी देखे जाने चाहिए । 

     स्वर्गीय हरि ठाकुर का दावा 

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    बहरहाल ,  वर्ष 2020 छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कण्डेल नहर सत्याग्रह का भी शताब्दी वर्ष था। विद्वानों के अनुसार इस सत्याग्रह में किसानों को समर्थन देने और उनका हौसला बढ़ाने के लिए यहाँ आए थे। हरि ठाकुर ने अपने विशाल ग्रंथ  'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' में पंडित सुन्दरलाल शर्मा पर केन्द्रित अपने  आलेख में लिखा है -- " महात्मा गांधी को प्रथम बार छत्तीसगढ़ में लाने का श्रेय पं सुन्दरलाल शर्मा को ही है।धमतरी नगर में गांधी जी के आगमन से त्यौहार जैसा वातावरण बन गया था । मकईबंद तालाब से सभा स्थल तक डेढ़ मील के रास्ते के दोनों ओर स्त्री ,पुरुष और बच्चों की भीड़ उनके स्वागत में खड़ी थी।सभा मंच पर गांधीजी का पहुंचना दूभर हो गया था।गांधी जी के साथ शौकत अली तथा मोहम्मद अली भी थे। इसी सभा में गांधी जी ने कण्डेल नहर सत्याग्रह के संदर्भ में पंडित सुन्दरलाल शर्मा ,नारायण राव मेघावाले , नत्थूजी जगताप तथा छोटेलाल बाबू के प्रयासों की सराहना की।"

      तेरह साल में दो बार आए थे !

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 बहरहाल , यह तो मानी हुई बात है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम  इतिहास में गांधीजी से जुड़े कई प्रसंग अमिट अक्षरों में दर्ज हैं।  उनकी छत्तीसगढ़ यात्रा के प्रसंग भी इनमें शामिल हैं। अगर उनकी पहली छत्तीसगढ़ यात्रा की पुष्टि करने वाले कुछ विद्वानों की मानें तो गांधी जी ने  वर्ष 1920 से 1933 के बीच  लगभग तेरह वर्षो के अंतराल में दो बार छत्तीसगढ़ का दौरा किया था।वह कुल 9 दिनों तक यहाँ के अलग -अलग इलाकों में गए।  किसानों ,मज़दूरों और आम नागरिकों से मिले । गांधी जी  जी पहली बार वर्ष 1920 में यहाँ आए थे । वह 20 और 21 दिसम्बर तक यहाँ रहे। उनकी इस   पहली यात्रा  का  मुख्य उद्देश्य था -कण्डेल (धमतरी )  में हुए नहर सत्याग्रह में शामिल किसानों का हौसला बढाना और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करना । 

क्यों हुआ था कण्डेल नहर सत्याग्रह ?

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 स्वर्गीय हरि ठाकुर के लेख के अनुसार अगस्त  1920 में भरपूर वर्षा और खेतों में पर्याप्त पानी होने के बावज़ूद अंग्रेज सरकार ने कण्डेल  के किसानों पर पानी चोरी का झूठा इल्ज़ाम लगाकर  सिचाई  टैक्स की जबरन वसूली का भी आदेश जारी कर दिया था । प्रशासन ने किसानों पर 4050 रुपए का सामूहिक जुर्माना लगा दिया ।इसकी वसूली नहीं हुई तो किसानों को उनके पशुधन की कुर्की करने की नोटिस जारी कर दी गयी । किसानों के मवेशियों को ज़ब्त भी किया गया और साप्ताहिक हाट -बाजारों में उनकी नीलामी के भी प्रयास किए  गए  ,लेकिन ग्रामीणों की एकता के आगे प्रशासन की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं।  सिंचाई टैक्स और जुर्माने के   आदेश के ख़िलाफ़ किसानों ने बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में' नहर  सत्याग्रह " शुरू कर दिया । अंचल के नेताओं ने इस आंदोलन में जोश भरने के लिए  महात्मा गांधी  को बुलाने का निर्णय लिया । छोटेलाल जी के आग्रह पर उन्हें  20 दिसम्बर 1920 को पण्डित सुन्दरलाल शर्मा अपने साथ कोलकाता से  रायपुर लेकर आए ।

   गांधी जी के आगमन से पहले ही

   अंग्रेज प्रशासन बैकफुट पर 

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गांधी जी  रेलगाड़ी में यहाँ पहुँचे । यह महात्मा गांधी  के प्रभावी व्यक्तित्व का ही जादू था कि उनके  आगमन की ख़बर मिलते ही  अंग्रेज प्रशासन बैकफुट पर आ गया और उसे सिंचाई टैक्स की जबरिया  वसूली का हुक्म  वापस लेना पड़ा ।  

             रायपुर में विशाल आम सभा 

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गांधी जी  ने 20 दिसम्बर की शाम रायपुर में एक विशाल आम सभा को भी सम्बोधित किया । जहाँ पर उनकी  आम सभा हुई ,वह स्थान आज गांधी  मैदान के नाम से जाना जाता है। वह रायपुर से  21 दिसम्बर को रायपुर से मोटरगाड़ी में धमतरी गए थे ,जहाँ आम जनता और किसानों की ओर से पंडित  सुन्दरलाल शर्मा और छोटेलाल श्रीवास्तव सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने उनका स्वागत किया । गांधी जी  ने धमतरी में आम सभा को भी सम्बोधित किया और रायपुर आकर नागपुर के लिए रवाना हो गए ।

             गांधी जी की  दूसरी छत्तीसगढ़ यात्रा 

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        दूसरी बार वह वर्ष 1933 में छत्तीसगढ़ आए थे ।इस बार उंन्होने  22 नवम्बर से 28 नवम्बर तक याने कुल 7  दिनों तक इस अंचल का सघन दौरा किया ।  इस बीच वह दुर्ग ,रायपुर , धमतरी और बिलासपुर सहित मार्ग में कई गाँवों और शहरों के लोगों से मिलते रहे । उनकी यह  दूसरी छत्तीसगढ़ यात्रा इस मायने में भी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है कि इसी दरम्यान उंन्होने भारतीय समाज में व्याप्त ऊँच -नीच के भेदभाव के ख़िलाफ़ जन -जागरण के विशेष अभियान की शुरुआत भी यहाँ की धरती से की।  

      छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह भी दर्ज है कि इस अंचल में अस्पृश्यता निवारण का कार्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  पण्डित सुन्दरलाल शर्मा पहले ही शुरू कर चुके थे ।  उन्होंने वर्ष 1918 में दलितों को जनेऊ पहना कर सवर्णों की बराबरी में लाने का ऐतिहासिक कार्य करते हुए सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में सामाजिक जागरण का शंखनाद कर दिया था। वर्ष 1918 में ही उन्होंने राजिम स्थित भगवान राजीवलोचन के प्राचीन मन्दिर में अछूत समझे जाने वाले कहार (भोई )समुदाय को प्रवेश दिलाने का अभियान चलाया था। साहित्यकार स्वर्गीय हरि ठाकुर के  अनुसार  वर्ष 1924 में पण्डित सुन्दरलाल शर्मा ने  ठाकुर प्यारेलाल सिंह और घनश्याम सिंह गुप्त  के साथ रायपुर में 'सतनामी आश्रम' की स्थापना की थी। 

        पंडित सुन्दरलाल शर्मा की तारीफ़

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     नवम्बर 1933 में छत्तीसगढ़ के  दूसरे प्रवास में भी गांधी जी ने  रायपुर में  आम सभा को सम्बोधित किया ,जहाँ उंन्होने  छुआछूत मिटाने के लिए पण्डित सुन्दरलाल शर्मा द्वारा किए गए कार्यों की तारीफ़ करते हुए उन्हें अपना गुरु कहकर सम्मानित किया।  इस दौरान धमतरी की आम सभा में गाँधीजी ने कण्डेल के किसानों के नहर सत्याग्रह आंदोलन  को भी याद किया और कहा कि यह दूसरा 'बारादोली' है। उंन्होने इसके लिए बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव , पण्डित सुन्दरलाल शर्मा , नारायणराव मेघावाले और नत्थूजी जगताप जैसे किसान नेताओं की भी जमकर तारीफ़ की।  महात्मा गांधी  स्वतंत्रता संग्राम की सफलता के लिए देश में सामाजिक समरसता और समानता की भावना पर बहुत बल देते थे।     

   राजाओं के कॉलेज में राजकुमारों से 

   क्या कहा गांधी जी ने ?

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         उन्होंने दूसरी बार के अपने  छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान 24 नवम्बर 1933 को रायपुर स्थित राजाओं के कॉलेज याने राजकुमार कॉलेज में विद्यार्थियों को सम्बोधित किया । ये सभी विद्यार्थी छत्तीसगढ़ और देश की विभिन्न रियासतों के राजवंशों से ताल्लुक रखते थे। गांधीजी ने उनसे कहा था - "आप विश्वास कीजिए कि आप में और साधारण लोगों में कोई अंतर नहीं है। अंतर केवल इतना है कि आपको जो मौका मिला है,वह उन्हें नहीं दिया जाता।"  उंन्होने राजकुमारों से आगे कहा था --"अगर आप भारत के ग़रीबों की पीड़ा समझना नहीं सीखेंगे तो आपकी शिक्षा व्यर्थ है।  हिन्दू धर्म में जब प्राणी मात्र को एक मानने की शिक्षा दी गयी है ,तब मनुष्यों को जन्म से ऊँचा या नीचा मानना उसके अनुकूल हो ही नहीं सकता ।" 

         महात्मा गांधी का प्रेरणादायक प्रभाव 

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      छत्तीसगढ़ में   वर्ष 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में  सोनाखान के अमर शहीद वीर नारायण सिंह के सशस्त्र संघर्ष की अपनी गौरव गाथा है  ,वहीं बाद के वर्षों में महात्मा गांधी  के अहिंसक आंदोलनों के प्रेरणादायक प्रभाव से भी यह इलाका अछूता न रहा । जनवरी 1922 में आदिवासी बहुल सिहावा क्षेत्र में श्यामलाल सोम के नेतृत्व में हुआ 'जंगल सत्याग्रह' इसका एक बड़ा उदाहरण है ,जिसमें सोम सहित 33 लोग गिरफ़्तार हुए थे और जिन्हें तीन महीने से छह महीने तक की सजा हुई थी। वनों पर वनवासियों के परम्परागत अधिकार ख़त्म किए जाने और वनोपजों पर अंग्रेजी हुकूमत के एकाधिकार के ख़िलाफ़ यह सत्याग्रह हुआ था।  इस आंदोलन में भी पण्डित सुन्दरलाल शर्मा , नारायणराव मेघा वाले और बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जैसे नेताओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई ।

    मई 1922 में सिहावा में सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए गिरफ़्तार होने पर  पण्डित शर्मा को एक वर्ष और मेघावाले को आठ महीने  का कारावास हुआ । वर्ष 1930 में गाँधीजी के आव्हान पर  स्वतंत्रता सेनानियों ने  धमतरी तहसील में जंगल सत्याग्रह फिर शुरू करने का निर्णय लिया  । इसके लिए धमतरी में नत्थूजी जगताप के बाड़े में सत्याग्रह आश्रम स्थापित किया गया। गिरफ्तारियां भी हुईं। रुद्री में हुए जंगल सत्याग्रह के दौरान पुलिस की गोली से एक सत्याग्रही मिंटू कुम्हार शहीद हो गए। 

    पण्डित रविशंकर शुक्ल ,पण्डित वामन बलिराम लाखे,पण्डित भगवती प्रसाद मिश्र ,बैरिस्टर छेदीलाल , अनन्त राम बर्छिहा , क्रान्तिकुमार भारतीय , यति यतन लाल ,डॉ.खूबचन्द बघेल , डॉ.ई.राघवेन्द्र राव ,मौलाना रऊफ़ खान ,महंत लक्ष्मीनारायण दास जैसे कई दिग्गज स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत से अंग्रेजी हुकूमत को समाप्त करने के लिए गांधी जी  के  बताए मार्ग पर चलकर इस अंचल में राष्ट्रीय चेतना की अलख जगायी।

       आलेख    -स्वराज्य करुण 


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