Sunday 11 September 2011

उफ़ ! ये भयंकर भक्ति भावना !

                                                                                            -  स्वराज्य करुण

          
      दफ्तर पहुँचने में देर हो रही थी . फोर-लेन पर एक अधूरे  ओव्हर ब्रिज के आजू -बाजू बिखरे मलबे की वजह से मुख्य सड़क पर लगभग दो किलोमीटर लम्बा ट्रैफिक जाम लगा हुआ था . मैंने इस रुकावट  से बच निकलने के लिए बगल के शॉर्ट -कट रास्ते से निकलना चाहा और वाहन उधर घुमाया ,लेकिन यह क्या ? कुछ दूर जाने पर वहाँ एक बड़ा पंडाल तना हुआ था और उस रास्ते के दोनों तरफ से चार चक्के तो क्या , दो चक्के वाली गाड़ियों का  भी आना-जाना बंद हो गया था .वहाँ किसी तथा कथित सार्वजनिक गणेश उत्सव समिति ने गणेश जी की प्रतिमा रखकर अपनी भक्ति-भावना के प्रदर्शन के लिए राहगीरों का और वाहनों का चलना-फिरना अघोषित रूप से बंद करवा दिया था . मुझे मजबूरी में उसी फोर लेन पर आना पड़ा ,जिस पर ट्रैफिक जाम जस का तस बना हुआ था और ट्रक,बस , जीप, कार आदि हर तरह की गाडियां टस से मस नहीं हो रहीं  थी .
                   बड़ी मुश्किल से जाम हटा और मै उस दिन बहुत विलम्ब से दफ्तर पहुंचा. खैर, इस देरी की भरपाई के लिए जब मै देर रात तक  दफ्तरिया कामों को निबटा कर घर के लिए निकला  तो दो किलोमीटर जाने पर बीच सड़क में आम-सभा जैसा नजारा देख  किसी शॉर्ट-कट वैकल्पिक रास्ते की खोज में गाड़ी वापस मोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. मेरे जैसे कुछ अभागे राहगीरों से पूछने पर मालूम हुआ कि कुछ तथा कथित  गणेश भक्तों की स्वघोषित समिति ने बीच सड़क पर गीत-संगीत का आयोजन किया है. सड़क के दोनों ओर से यातायात अवरुद्ध है .मुसाफिर और राहगीर हलाकान हैं ,लेकिन आयोजकों को उनसे भला क्या लेना-देना ?       उन्हें तो देर रात तक लाऊड स्पीकरों  पर गगन-भेदी गीत-संगीत के ज़रिये बरसने वाले भक्ति-रस की बहती गंगा में हाथ धोते रहना है . पास-पड़ोस के लोग भले ही  कर्ण-भेदी शोर से परेशान होते रहें !  शहर की एक सड़क से गाड़ी में गुजरते हुए उस दिन फिर कुछ ऐसा ही हुआ .उस एक ही सड़क पर सिर्फ एक किलोमीटर के छोटे से हिस्से में गणेश जी के कम से कम  बीस पंडाल सजे हुए थे .अनन्त-त्रयोदशी पर भक्तों की भारी भीड़ थी और भगवान की एक शोभा-यात्रा भी चल रही थी . इस मार्ग पर आने से पहले मुझे इसका अंदाजा नहीं था . लिहाजा , कम से कम डेढ़ घंटे उस ट्रैफिक जाम को मजबूरन झेलना पड़ा.
     बहरहाल , मै और मेरे जैसे कितनों ने  तो ट्रैफिक-व्यवधान की  इन तीनों घटनाओं में अपने कीमती वक्त की बर्बादी को किसी तरह बर्दाश्त कर लिया ,लेकिन ज़रा  सोचिये ,अगर  अपने परिवार के किसी गम्भीर बीमार सदस्य को लेकर कोई अस्पताल जा रहा हो ,और सड़क पर ऐसी कई रुकावटें खड़ी हों, तब क्या होगा ?  अगर कहीं आग लगी हो और फायर-ब्रिगेड को उसी रास्ते से आना-जाना हो , लेकिन   बीच सड़क पर किसी के द्वारा अपनी निजी भगवान भक्ति के प्रदर्शन के लिए पंडाल तान दिया गया हो, किसी  ने बीच रास्ते पर नाच-गाने की महफ़िल सजा रखी हो, भगवानों की शोभा यात्रा सड़कों को घेर कर चल रही हो, तब आग बुझाने के लिए निकले फायर -ब्रिगेड का और जहां आग लगी हो उस जगह का  क्या होगा ? परिणामों के बारे में सोच कर ही सिहरन होने लगती है. जिन लोगों को सरकार ने सार्वजनिक यातायात बनाए रखने की जिम्मेदारी दी है, वे पता नहीं ऐसे समय में कहाँ रह जाते हैं ? भगवान गणेश तो विघ्न-विनाशक हैं ,वो भला आम जनता के सामान्य यातायात में विघ्न क्यों डालेंगे ?  विघ्न तो विघ्न-संतोषियों द्वारा ही डाला जाता है  !
                            आधुनिक युग में  हमारे देश में सार्वजनिक गणेश उत्सवों का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास से जुड़ा हुआ है . आज़ादी के महान योद्धा, महान चिंतक और  लेखक लोकमान्य पंडित बाल गंगाधर तिलक ने उन दिनों आम जनता में राष्ट्रीयता और देश की स्वतंत्रता  के लिए चेतना जगाने और इस अभियान में समाज को साथ जोड़ने के लिए सार्वजनिक गणेश-पूजन की शुरुआत की थी ,लेकिन यह भी सच है   कि तिलक जी ने कहीं भी यह नहीं कहा कि इस अनुष्ठान के लिए यातायात को ही रोक दिया जाए !
              हम इक्कीसवीं सदी में आ गए हैं . समाज में शिक्षा और साक्षरता की दर पहले की तुलना में काफी बढ़ गयी है,लेकिन इसका क्या फायदा , जब  हम एक-दूसरे की तकलीफों को समझने की कोशिश नहीं करते ! गाजे-बाजे के साथ धार्मिक जुलूस निकालना , अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर  धरना-प्रदर्शन करना , सड़क पर नाचते-गाते बारात निकालना ,अपनी शान दिखाने के लिए ध्वनि-प्रदूषण  के साथ धमाकेदार कान-फोड़ू संगीत बजाना और बीच-बीच में धमाकेदार पटाखे फोड़ना भी  कहीं न कहीं ,किसी न किसी विचार या किसी न किसी व्यक्ति अथवा संस्था के प्रति हमारी व्यक्तिगत आस्था और भक्ति-भावना को ही प्रकट करता है  जो  हमें  निजी तौर पर तो सुख देता है ,लेकिन यह सब देख कर आस-पास के घरों, राह चलते और वाहनों में आते-जाते लोगों के दिलों में  क्या प्रतिक्रिया होती होगी , क्या उन लोगों ने कभी सोचा है ,जो अपने किसी खास प्रयोजन से ऐसा आयोजन  करते हैं ? क्या ऐसा कोई भी सामूहिक या सार्वजनिक आयोजन दूसरों को तकलीफ दिए बिना नहीं हो सकता ?
                बीच सड़क पर देवी-देवताओं की मूरत रख कर , बिजली की जगमग रौशनी से उनके मंडप सजा कर सार्वजनिक रास्ते को रोकने का अधिकार हमें किसने दिया ? क्या ऐसा करके हम यातायात नियमों की धज्जियां नहीं उड़ाते ? क्या भगवान गणेश या किन्ही और देवी -देवताओं ने हमसे कहा है कि हम उनकी पूजा के लिए आम जनता के आने-जाने के रास्तों  को ही ठप्प कर दें ? अगर नहीं तो फिर भगवान के नाम पर ऐसी भयानक भक्ति क्यों, जिसे देख कर  सीधे सादे लोग  भयभीत हो जाएँ  और ऐसे भक्तों , जुलूसियों और बारातियों को दिल ही दिल में कोसते हुए  दबी ज़ुबान में झल्लाएं -उफ़ ! ये भयंकर भक्ति-भावना !                   
                                                                                                                  -   स्वराज्य करुण
                                                                                        
                                
(फोटो : गूगल से साभार )

7 comments:

  1. एक मोहल्ले में २५ गणेश पंडाल लग जाते है, जिससे यातायात की समस्या बढ़ जाती है एवं ध्वनि प्रदुषण भी बढ़ता है.शहरों के हिसाब से वार्ड में एक ही गणेश प्रतिमा राखी जाये तो अच्छा रहेगा.

    ReplyDelete
  2. आपके विचार महत्वपूर्ण हैं...भक्तों , जुलूसियों और बारातियों को भी इस विषय के हर पक्ष पर सोचना चाहिए...और काश वे सोचें....

    ReplyDelete
  3. विचारणीय विन्दु पर ध्यान आकृष्ट करता हुआ अच्छा आलेख!

    ReplyDelete
  4. महत्वपूर्ण विचार हैं आपके| धन्यवाद|

    ReplyDelete
  5. सही है ....किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए

    ReplyDelete
  6. सारे शहरों की यही समस्या है. विचारणीय पोस्ट.

    ReplyDelete
  7. विचारणीय विन्दु पर ध्यान आकृष्ट करता हुआ अच्छा आलेख!

    ReplyDelete