Wednesday, August 25, 2010

भक्तों की भीड़ में बेचारे भगवान !

      दोस्तों ! सड़कों के किनारे भगवानों की पूजा -अर्चना के लिए भारी  -भरकम पंडाल सजाने और पूजा के बहाने अपनी-अपनी    मनमानी करने वालों का मौसम फिर आ रहा है. धर्म-संस्कृति के नाम पर ढोल-ढमाकों के साथ  धींगा-मस्ती के लिए रास्ता  रोकने वालों की   भीड़ एक बार फिर आपको और मुझे भी दफ्तर देर से पहुँचने और शाम को घर  देर से लौटने के लिए मजबूर करने वाली है .इनके जलसों -जुलूसों में फंस कर कोई बीमार आदमी, या फिर प्रसव वेदना से तड़फती कोई बहु-बेटी अस्पताल पहुँचने  से पहले ही  दम तोड़ दे , इससे भगवान के इन ढोंगी भक्तों को क्या लेना-देना ? भगवानों  से ज्यादा  तो आज हर कहीं  ऐसे ही भक्तों की भीड़ नज़र आती है, जिन्हें देख कर भगवान भी अपना माथा पीट लें कि आखिर कौन -से मुहूर्त में ,किस माटी से उन्होंने हाड़-मांस के ऐसे पुतले तैयार  किए थे ? ऐसे भक्तों की भीड़ में फंस कर  भगवान भी आज-कल खुद को बेचारा और असहाय महसूस कर असमंजस में पाते हैं !  सड़क घेर कर मंडप सजाना जिनका  जन्म-सिध्द अधिकार है, बीच सड़क पर हवन-पूजन के लिए बैठना और भक्तों की भीड़ को बैठाना  जिनका  शौक और शगल है,
                आम-रास्ते पर भगवान का भोग और पूजा का प्रसाद बांटने के नाम पर दोना-पत्तल और पौलीथीन के कूड़े-कचरे की    चादर  बिछा देना जिनका  अपना बनाया हुआ एक नया धर्म है,. लाउड-स्पीकरों के तेजाबी शोर-शराबे से लोगों के कान के परदे फाड़ डालना जिनकी संस्कृति है ,  अवैध कब्जा करने के लिए सडकों के किनारे देवी-देवताओं की सिन्दूर लगी मूर्तियाँ  बैठा कर पूजा-भवन  बनवाना जिनके  नैतिक संस्कार हैं, ऐसे महापुरुषों (?) के देश में हम जैसे कापुरुषों का क्या काम ?  राहगीरों और मुसाफिरों को होने वाली तकलीफ जिनका हौसला बढाती है, जिससे उनके बेरहम दिलों में  भक्ति -भावना का ज्वार उमड़ता है, ऐसे  महानुभावों की  महिमा का बखान करने के लिए इस वक्त मेरे पास और कोई शब्द नहीं हैं. एक-दो अच्छे -भले शब्द ज़रूर थे  ,लेकिन इसके पहले कि वे मेरी ज़ुबान  से निकलें,  दिल की संसद के माननीय  अध्यक्ष महोदय ने उन्हें  असंसदीय मान कर सदन की कार्रवाई से विलोपित कर दिया. क्या इन महान भक्तों की शान में लिखने या कहने के लिए आपके शब्द-सागर में कुछ मोती हैं ? यदि हों ,तो कृपा करके बिखेर दीजिए उनके श्रीचरणों में !                                                                                                                                                                                                                                  स्वराज्य करुण         

6 comments:

  1. हम आजाद हैं,हम आजाद हैं,हम आजाद हैं,हम आजाद हैं।
    एक आजाद मुल्क की आपने सही तश्वीर प्रस्तुत की है।
    आभार

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  2. छोटे छोटे पंडालों और गली कूंचों में चिल्हर की तरह बिखरे आयोजनों के स्थान पर समेकित विराट भव्य आयोजन के विकल्प पर विचार क्यों नहीं करते भक्त जन?

    उत्सव प्रियता की पृष्ठभूमि में निहित आस्था से इतर कारणों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ! बस यही जगह है जहां से भगवान पर विश्वास बढ़ने लगता है कि जिसके कारण से ऐरे गैरे नत्थू खैरे सभी की वर्ष पर्यंत अवदमित मनोकामनायें फलीभूत हो जाती हैं !

    बहरहाल एक सार्थक बात शुरू करने के लिये आपका आभार !

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  3. mujhe lagta hai ki bhagwaan maun prarthna ko bhi sun sakte hain. isliye vaastav me hamari pooja aisi ho jis se kisi ko koi kasht na pahunche ,ye jyada uchit hai. vaise bhi , PARHIT SARAS DHARAM NAHI BHAI, PARPEEDA SAM NAHI ADHAMAI.

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  4. ऐसे भक्तों की भीड़ में फंस कर भगवान भी आज-कल खुद को बेचारा और असहाय महसूस कर असमंजस में पाते हैं ! ये वाकई में भक्त होते हैं यह कह पाना मुश्किल होता है क्योंकि जो खुद आलीशान घर में रहे और भगवान् को सड़क पर धूल खाने छोड़ दे उसकी भक्ति संदेहास्पद हो जाती है| कोई चौराहा , कोई कोना नहीं छोड़ते और एक मूरत बिठा कर या संकेत दे कर कि यह पूजा -स्थल है उस जगह रात में क्या-क्या गोरख धंधे होते हैं इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा पाता

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