घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा ?
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उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ
फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.
उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी
सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .
उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ
हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.
आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,
भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.
तिनकों को जोड़ जिसने बनाया था अपना घर
लुटेरों ने लूट लिया कल उसका आशियाँ.
घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा
वीरान रसोई में कैसे बनेंगी रोटियाँ .
तबाही का तमाशा हुआ बच्चों के सामने
क्या सोचेंगी कहो कल नई -नई पीढ़ियाँ.
-स्वराज्य करुण
मार्मिक रचना
ReplyDeleteअनिता जी, बहुत -बहुत धन्यवाद..
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