Wednesday 4 January 2012

वस्तु-विनिमय प्रणाली का पुनर्जन्म !

 इतिहासकारों के अनुसार हजारों साल पहले मानव-सभ्यता और संस्कृति के विकास क्रम में जब आर्थिक लेन-देन के लिए मुद्राओं का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था , उन दिनों लोग वस्तु-विनिमय प्रणाली से काम चला  लेते थे.  अनाज के बदले पशु धन और पशु धन के बदले अनाज का लेन-देन हुआ करता था . लोग अपने गाँव के लोहार से  लोहे का औजार,  बढाई से लकड़ी का सामान , बुनकर से कपड़े बनवाते तो उन्हें  इन सामानों की  कीमत का भुगतान अनाज के रूप में करते थे .लगता है कि वस्तु-विनिमय की वही पुरानी  परम्परा दोबारा लौट कर आ रही है , इक्कीसवीं सदी के इस आधुनिक युग में कम से कम हमारे देश के कुछ राज्यों के  बाज़ारों में आप और हम इसे आसानी से महसूस  कर सकते हैं .
   वस्तु-विनिमय प्रणाली का पुनर्जन्म तो हुआ है, लेकिन पहले की तुलना में इसमें एक फर्क यह है कि आज यह एकतरफा है .यानी सामान खरीदकर रूपए भुगतान के बाद अगर आपको बाकी  पैसे वापस चाहिए तो दुकानदार चिल्हर नहीं होने की बात कहकर कोई भी छोटा -मोटा सामान आपको थमा देगा, जिसकी ग्राहक को भले ही ज़रूरत ना हो. कुछ दिनों पहले आकाश के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ . मेडिकल स्टोर से 96 रूपए के टेबलेट खरीदकर भुगतान के लिए एक सौ रूपए का नोट देने पर दुकानदार ने चार रूपए वापस न करते हुए आकाश को चाकलेट की चार टिकिया थमा दी. अगले दिन उसी मेडिकल स्टोर से आकाश ने कुछ और दवाइयां खरीदी .बिल एक सौ चार रूपए का हुआ .उसने सौ के नोट के साथ दुकानदार की तरफ चाकलेट की वही चार टिकिया बढ़ा दी ,तो उसने सौ का नोट तो रख लिया .लेकिन चाकलेट की टिकिया के बदले चार रूपए नगद मां...गने लगा. बात नहीं बनी और आकाश दवाइयां वापस कर सौ का नोट वापस लेकर लौट गया. आज कल चिल्हर सिक्के या एक रूपए और दो रूपए के नोट बाज़ार में मुश्किल से ही नज़र आते हैं .क्या वज़ह है ,कोई बताने वाला नहीं है. 
सिक्के तो शायद सिक्के गलाने वालों के हाथों गायब हो रहे हैं,लेकिन एक और दो रूपए के नोट क्यों और कहाँ विलुप्त हो रहे हैं ? चिल्हर की समस्या के कारण दुकानदार अपने ग्राहक को  चाकलेट या कोई माउथ-फ्रेशनर जैसी चीज थमाकर बीच का रास्ता निकालना चाहता है , लेकिन ग्राहक अगर वस्तु के रूप में किसी चीज की कीमत का भुगतान करना चाहे ,तो दुकानदार उसे लेने से इंकार कर देता है . यानी यह लेन-देन एकतरफा होता है .   बाज़ार में चिल्हर की किल्लत से निजात पाने के लिए वस्तु-विनिमय की हजारों वर्ष पुरानी और विलुप्त हो चुकी परिपाटी का नया जन्म एक नए रूप में हो चुका है. देखते हैं -आगे चलकर यह परिपाटी और कौन से नए आकार में हमारे सामने होगी  और हम बाज़ार से सामान खरीदते हुए कैसे उसका सामना करेंगे ?
                                                                                                                       -  स्वराज्य करुण 

5 comments:

  1. सटीक बात कही. चाकलेट, शैम्पू, माचिस, माउथ फ्रेशनर आजकल चिल्ल्हर के एक तरफा विकल्प हो गये हैं, आठ रुपये पाव की सब्जी को दस रुपये की तौलना या दो रुपये का धनिया , मिर्च या अदरक का टुकड़ा थमा देना भी चलन में आ गया है.

    उपभोक्ता को तो यही गुनगुनाना पड़ता है-

    आप हमारे दिल को चुरा के आँख चुराए जाते हैं
    ये एकतरफा रस्मेवफा हम फिर भी निभाए जाते हैं

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  2. सिक्कों से सेविंग ब्लेड बन रही है। छोटे नए नोट बैंक से सीधे सेठों की तिजोरियों में दाखिल हो जाते हैं जहां से बट्टा देने से ही निकलते हैं, साथ ही एक तरफ़ा वस्तु विनिमय से दुकानदारों को फ़ायदा ही है। आम के आम और गुठली के दाम्।

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  3. सार्थक एयवम सारगर्भित आलेख वजह चाहे हो फसता ग्राहक ही है दुकानदार कभी नहीं ... जबकि बजार में तो कम से कम लेन देन बराबर का होना चाहिए जो की वास्तव में कभी नहीं होता। समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  4. एक और दो के नोट अब भी प्रचलन में/मान्‍य हैं?

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  5. सही बात है बैंक इतने चिल्हर बांटता है..जाने कहा गम हो जाते हैं बाज़ार में..

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