Monday, September 26, 2011

हिन्दी के लिए स्वागत योग्य पहल

भारत में सितम्बर माह का दूसरा पखवाडा राज भाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर केन्द्रित रहता है . हिन्दी दिवस के दिन १४ सितम्बर से इसकी शुरुआत हो जाती है . केन्द्रीय कार्यालयों सहित बैंकों में भी कहीं राज-भाषा सप्ताह ,तो कहीं राज भाषा पखवाडा मनाया जाता है. देश में व्यापक रूप से प्रचलित  हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा भी है. इस पर हमें गर्व होना चाहिए .यह राष्ट्रीय एकता की भाषा है . हिन्दी पखवाड़े के इस मौके पर कई पत्र-पत्रिकाओं ने विशेष सामग्री का प्रकाशन किया है .इनमें लखनऊ  से प्रकाशित 'राष्ट्रधर्म' मासिक भी शामिल है ,जो  देश की सर्वाधिक पुरानी और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में से एक है. महान चिंतक और एकात्म-मानवतावाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय इसके संस्थापक रहे ,जबकि देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलविहारी वाजपेयी  भी किसी जमाने में इसके सम्पादक रह चुके हैं. अटलजी भारत के प्रथम राज-नेता हैं ,जिन्होनें लगभग तीन दशक पहले तत्कालीन विदेशमंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्राष्ट्रीय मंच को भारत की राष्ट्र भाषा  में संबोधित कर पूरी दुनिया में हिन्दी का गौरव बढाया था . आज हमारे कितने राज-नेता हैं ,जो देश के मान-सम्मान के लिए ऐसी हिम्मत दिखा पाएंगे ? यहाँ तो कई ऐसे लोग भी हैं ,जिन्हें  हिन्दी जानते हुए भी अपने ही देश की संसद में अंग्रेजी में भाषण देकर अपनी अंग्रेज-परस्त गुलाम मानसिकता का परिचय देने में संकोच नहीं होता . कई ऐसे फ़िल्मी कलाकार हैं ,जिनकी पहचान हिन्दी फिल्मों के कारण है, लेकिन आम जिंदगी में उन्हें हिन्दी बोलने में शर्म आती है और वे टेलीविजन के परदे पर किसी साक्षात्कार में हिन्दी सवालों के जवाब भी अंग्रेजी में देते नज़र आते हैं. यानी खाना हिन्दी में और गाना अंग्रेजी में ! भारतीय जन-जीवन में अंग्रेजी को थोपने की कोशिश आज हर कहीं महसूस की जा सकती है .  अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों को बढ़ावा कौन दे रहा है ,यह भी हम लोग देख रहे हैं .हिन्दी अखबारों की भाषा में ज़बरन अंग्रेजी शब्दों के कांटें कौन उगा रहा है ,इसे भी सब देख रहे हैं . ऐसे हालात पर चिंतन के लिए  'राष्ट्रधर्म 'ने अपने मुखपृष्ठ पर हिन्दी भाषा और देवनागरी  लिपि का जयकारा लगाते हुए अपने सितम्बर के अंक में विद्वानों के विशेष आलेख आदि प्रकाशित कर निश्चित रूप से एक स्वागत योग्य और अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है . उम्मीद की जानी चाहिए कि 'राष्ट्रधर्म' की यह पहल हमारे उन अंग्रेजी परस्त राज-नेताओं को उनके 'राजधर्म' की भी याद दिलाएगी ,जो आज़ाद भारत में हिन्दी सहित तमाम  भारतीय भाषाओं को पीछे धकेलने की कोशिशों को ही जाने-अनजाने आगे बढाने में लगे हुए हैं .  भगवान उन्हें सदबुद्धि दे !                                                                                                                                                                    स्वराज्य करुण 

5 comments:

  1. जिस दिन देश के नेता और अफ़सर अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढाना प्रारंभ कर देगें, वह दिन हिन्दी के प्रचार प्रसार में मील का पत्थर साबित होगा।
    दोगलेपन से काम नहीं चलने वाला। एकात्ममानववाद तभी सार्थक होगा जब देश के समस्त विद्यार्थियों को एक जैसी शिक्षा मिलेगी। एक सप्ताह का हिन्दी पखवाड़ा मना कर गाल बजाना व्यर्थ है। अंग्रेजी शासकों की भाषा एवं हिन्दी प्रजा की भाषा का दर्जा पा रही है।
    राष्ट्रधर्म एक अच्छी पत्रिका है। राष्ट्र के उत्थान के लिए इसमें चिंतन होता है। जानकारी देने के लिए आभार एवं धन्यवाद

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  2. बहुत सही और सटीक लिख है ..

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  4. सार्थक लेख बस जरूरत है अमल मे लाने की लेख से प्रेरणा लेने की। "अंग्रेजी मे महारत हासिल कीजिये मगर अपनी ही बोली का निरादर नही" यह भाव सबके हृदय मे उपज जावे तो फिर बात ही क्या……सुंदर!

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