Saturday, September 24, 2011

काश ! भस्म हो जाए सोने की लंका !

         अगर आपका या मेरा चार सदस्यों वाला परिवार शहर में रहकर रोज बत्तीस रूपए और गाँव में रहकर रोज छब्बीस रूपए में अपने दो वक्त के भरपेट भोजन का इंतजाम कर सकता है , तो यकीन मानिए कि आप और मै कतई  गरीब नहीं है. यह हम नहीं कह रहे हैं ,बल्कि हमारे देश का  योजना आयोग कह रहा है , जिसने  इक्कीस सितम्बर को देश की सबसे बड़ी अदालत में हलफनामा दायर कर यह दलील दी है. मेरे विचार से अगर यह राशि  किसी परिवार के दो वक्त के भर पेट भोजन के लिए काफी हैं, तो ऐसा कहने वाले सबसे पहले खुद इतने ही रूपए  में अपना परिवार पाल कर दिखाएँ .तभी तो जनता को मालूम होगा कि हमारे मुखिया कहलाने वालों की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है .
       गरीबी रेखा निर्धारण के लिए  जब छब्बीस और बत्तीस रूपए भोजन खर्च की यह  दलील अदालत में पेश की गयी , ठीक उसी दिन एक बड़े शहर में लोक निर्माण विभाग के एक मुख्य अभियंता के घर पर सतर्कता विभाग वालों ने छापा मार कर साढ़े छह करोड़ रूपए की अनुपातहीन चल-अचल सम्पत्ति  का खुलासा किया था क्या मजाक है ? एक तरफ तो हमारे देश के लिए विकास योजनाओं का स्वरुप तय करने वाला सबसे बड़ा आयोग कह रहा है कि एक परिवार महज छब्बीस या बत्तीस रूपए रोज के हिसाब से भोजन कर ले, यानी महीने में हज़ार रूपए से भी कम खर्च में जीवन चला ले ,तो वह गरीबी के अभिशाप से मुक्त माना जाएगा ,वहीं दूसरी तरफ एक सरकारी अफसर साढ़े छह करोड़ की बेहिसाब सम्पत्ति के ढेर पर बैठा हुआ है .कुछ माह पहले मध्यप्रदेश के एक अफसर दम्पत्ति के घर छापे में सैकड़ों करोड़ रूपए की बेहिसाब दौलत का पता चला  था. इधर हसन अली जैसे डाकू  तो आठ सौ करोड़ रूपयों के मालिक बनकर बैठे हैं,जबकि देश की आबादी महज़ एक सौ इक्कीस करोड़ है .मुबई में अम्बानी सेठ अपनी शान-शौकत के प्रदर्शन के लिए सत्ताईस मंजिला बिल्डिंग तान लेता है और कोई उसे कुछ भी नहीं कहता ! इसके जैसे कई सेठों ने देश के नागरिकों के शेयर के रूपयों को अपनी सम्पत्ति मान कर फैक्ट्री और महल, क्या -क्या नहीं खड़े कर लिए हैं ?
           बहरहाल, अमीरों के वैभव-प्रदर्शन के बीच  निर्धनता  की एक अनोखी परिभाषा  देकर शायद योजना आयोग भारत में गरीबी के आंकड़ों को कम दिखाने की कोशिश कर रहा है ,ताकि दुनिया को बताया जा सके कि भारत अब एक अमीर देश है.आयोग का यह हलफनामा  ऐसे समय में आया है , जब देश में डीजल-पेट्रोल से लेकर चावल, गेहूं, शक्कर ,दाल,तेल जैसी हर ज़रूरी चीज की कीमत रोज आसमान छू रही हैं .अभी पिछले हफ्ते १६ सितम्बर के एक सांध्य दैनिक 'छत्तीसगढ़'  में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के हवाले से छपी एक रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र सरकार के अधिकाँश यानी सतहत्तर प्रतिशत मंत्री करोड़पति हैं और उनमें से कई मंत्रियों की संपत्ति सिर्फ दो साल में चार गुना ,आठ गुना और बारह गुना तक बढ़ गयी है . क्या ये लोग गाँव में छब्बीस रूपए और शहर में बत्तीस रूपए में अपने परिवार का पेट पाल सकते है.दैनिक 'लोकमत समाचार ' के पन्द्रह सितम्बर के अंक में छपी एक खबर के अनुसार विदेशों में जमा भारतीयों के काले धन की वापसी के लिए हमारी भारत सरकार प्रोत्साहन के रूप में आम-माफी की एक  आकर्षक योजना ला सकती है. केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है कि विदेशी बैंकों में छुपाए अपने काले धन की स्वयम घोषणा कर दे ,तो उसे माफ कर देना चाहिए !  यानी सफेदपोश डाकुओं को मिल सकती है माफी और गरीबों के  दो टाईम के भोजन के लिए  सिर्फ छब्बीस और बत्तीस रूपए ही काफी ? क्या  महंगे पांच सितारा और सात सितारा होटलों में भी सिर्फ इतने ही रूपयों में भोजन मिल सकता है ? क्या जनता के शेयर के अरबों रूपयों से मुंबई में अपने लिए सत्ताईस मंजिला महल खड़ा करवाने वाले सेठ जी भी सिर्फ छब्बीस रूपए या बत्तीस रूपए रोज के हिसाब से अपने परिवार का पालन-पोषण कर पाएंगे ? देश में ऐसे कई आलीशान महल हैं ,जहां रहने वालों के वैभव-विलासिता का जीवन देख कर लगता है कि रामायण में वर्णित  स्वर्ण-लंका भी कुछ ऐसी ही रही होगी !
           कुछ दिनों पहले सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत में  प्रति लीटर तीन रूपए का इजाफा करके महंगाई की आग में घी डालने का काम किया और अब योजना आयोग निर्धनता की नई परिभाषा बना कर गरीबों  के दिल में लगी आग में पेट्रोल डालने का प्रयास कर रहा है . हे भगवान ! काश ! गरीबों के दिल की ये आग आज के किसी रावण के सोने की लंका को भस्म कर पाती !  रामायण की कहानी से भी  यह साबित हो जाता है कि राम राज तभी आया ,जब लंका भस्म हो गयी   !
                                                                                                                   स्वराज्य करुण


                                                                                                      

4 comments:

  1. @हे भगवान ! काश ! गरीबों के दिल की ये आग आज के किसी रावण के सोने की लंका को भस्म कर पाती !

    सत्य है देव, दिल की आगे से यह लंगा भस्म हो पाती तो दग्ध हृदय को शांति मिलती और गरीबों को रोटी कपड़ा और मकान। मेरा भारत महान।

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. अब बाते हैं बातों का क्या, पर एक बात पर ध्यान आपका आकर्षित करना चाहूंगा कि बत्तीस रूपये पति व्यक्ति आय की बात की गयी है न कि परिवार की। खैर अरबो की बात है गरीब की जात है सो गलती उनसे हो तो हमसे भी हो हॊ सकती है

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  4. आप सबकी टिप्पणियों के लिए आभार.
    @भाई अरुणेश जी !तथ्यात्मक गलती की ओर ध्यान दिलाने का बहुत-बहुत धन्यवाद ,लेकिन यह भी सच है कि प्रति व्यक्ति छब्बीस या बत्तीस रूपए रोज की आमदनी हो, तो भी गरीबों का गुज़ारा नहीं हो सकता. किसी को विश्वास न हो तो देश चलाने वाले पहले इतने ही रूपए में खुद अपना परिवार चलाकर बताएं.

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