Tuesday 18 July 2017

क्या शब्द खो रहे अपनी धार ?

क्या शब्द अपनी धार खो रहे हैं और चलन से बाहर हो रहे हैं ? हिन्दी भाषा में ही देखें तो किंकर्त्तव्यविमूढ़ , दैदीप्यमान , जाज्वल्यमान ,, चेष्टा , विद्यार्जन , धनोपार्जन , अर्थोपार्जन , लोलुपता , मीमांसा ,प्रतिध्वनि , ,प्रतिश्रुति,प्रतिबिम्ब , प्रत्युत्पन्नमति , प्रवृत्ति ,प्रियतम , प्रेयसी , दुर्भिक्ष ,विभीषिका , जीजिविषा , कंठस्थ ,मुखाग्र अध्यवसाय , अधोगति , अवनि , चारुचंद्र , उत्तरोत्तर , उपस्थापना , मनोविनोद , गंतव्य ,मंतव्य , लोमहर्षक , निष्ठुर , निर्द्वन्द , निराहार , इत्यादि , अनादि जैसे शब्द जाने कब ,कहाँ , क्यों और कैसे हमारा साथ छोड़ गए , पता ही नहीं चला !   
        कुछ दशक पहले लेखन और बोलचाल में जिन लोगों के द्वारा इन शब्दों का उपयोग किया जाता था , क्या वे सबके सब मूर्ख थे ? यह तो हुई शब्दों की बात ! ज़रा हिन्दी के अंकों के बारे में सोचिये ! अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने वाले कई बच्चों को  हिन्दी अंकों और हिन्दी महीनों के नाम पूछकर देखिये . उन्हें लगेगा कि आप उनसे किसी विदेशी भाषा में कोई सवाल पूछ रहे हैं . उन्हें पैंतीस या छत्तीस कहने पर समझ में नहीं आएगा ,लेकिन अगर थर्टी फाइव और थर्टी सिक्स बोलेंतो झटपट समझ लेंगे .  जैसा माहौल देखा जा रहा है ,उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अन्य भारतीय भाषाओं में भी ऐसा हो रहा होगा . हमें उनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है ,लेकिन हिन्दी के विलुप्त हो रहे  संस्कृतनिष्ठ शब्दों के बारे में सोचकर ऐसा लगता है जैसे खोटे सिक्कों ने असली सिक्कों को चलन से बाहर कर दिया है !
                                                                                          -- स्वराज करुण

Sunday 9 July 2017

देवार बोले तो देवों के यार !

गाँव की गलियों में चिकारा की मधुर ध्वनि अब नहीं गूंजती । उसकी गुंजन लगभग विलुप्त हो चुकी है । यह परम्परागत वाद्य यन्त्र छत्तीसगढ़ के घुमन्तू देवार समुदाय के लोकगीतों का संगवारी हुआ करता था , लेकिन देवारों की नई पीढ़ी करीब -करीब उसे छोड़ चुकी है । महासमुंद जिले में पिथौरा कस्बे से लगे हुए देवार डेरा झुग्गी बस्ती के निवासी कोंदा देवार बताते हैं कि पहले उनके पिता और दादा चिकारा बजाते थे और उसकी धुन पर लोकगीत गाया करते थे ,लेकिन आज कोंदा की झुग्गी में न तो चिकारा है और न ही उन्हें देवार समुदाय का कोई लोकगीत याद है । वे तो बस दिन भर इधर -उधर घूमकर टिन -टप्पर , सड़कों के किनारे बिखरे कचरे में से प्लास्टिक ,पॉलीथिन , लोगों के घरों से टूटे फूटे अनुपयोगी सामान इकट्ठा करके अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी खींच रहे हैं । कुछ देवार लोग सुअर पालन का भी काम करते हैं । सुअर भी उनकी झुग्गियों के आस - पास रहते हैं । देवार डेरा में कोंदा जी से एक अच्छी खबर मिली कि अब इस समुदाय के लोग भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे हैं । उनकी नई पीढ़ी के पहनावे में भी बदलाव नज़र आ रहा है । वैसे दीवारों के बारे में बताया जाता है कि प्राचीन छत्तीसगढ़ जब दक्षिण कोसल कहलाता था और उसकी राजधानी रतनपुर हुआ करती थी , तब वहां के कलचुरी राजवंश के राजा अपना  आदेश-निर्देश इन्हीं देवारों के माध्यम से अपनी प्रजा तक पहुंचाना चाहते थे . . राजा के फरमान को ये लोग गीतों में ढाल कर जन-जन तक पहुंचाने का काम करते थे ! वह रेडियो ,टेलीविजन , अखबार ,इंटरनेट जैसे आधुनिक संचार साधनों का जमाना तो था नहीं ,इसलिए देवारों के लोकगीत ही जन संचार का एक प्रमुख जरिया हुआ करते थे ! साहित्यकार स्वर्गीय पुरुषोत्तम अनासक्त   कहा करते थे- देवार दरअसल देवों के यार हैं  आधुनिक युग में इनकी प्रतिभा को  छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कला-पारखी और लोक संगीत के संरक्षक स्वर्गीय दाऊ रामचन्द्र देशमुख ने पहचाना . उन्होंने अपनी सांस्कृतिक संस्था 'चंदैनी गोंदा' में लोक गायिका के तौर पर देवार समुदाय की पद्मा और बसंती  देवार अपने रंगमंच पर  एक नई पहचान दिलाई . आकाशवाणी के रायपुर केंद्र तक उन्हें पहुंचाया .उनकी आवाज में लक्ष्मण मस्तूरिया के छत्तीसगढ़ी गीत रेडियो से खूब प्रसारित हुए .यह शायद चालीस वर्ष पुरानी बात है लेकिन आज के दौर में अधिकाँश देवार लोग किसी भी बड़े गाँव या कस्बे की सरहद पर  अस्थायी झोपड़ियों में ही  कठिन जीवन संघर्षों के बीच बरसों-बरस किसी तरह दिन  गुजार रहे हैं . सरकारों की एक से बढ़कर एक बेहतरीन योजनाओं के बावजूद देवारों की  यह बसाहट  किसी शरणार्थी शिविर जैसी नज़र आती है ..राज्य और केंद्र सरकार इन दिनों लोगों को हुनरमंद बनाने के लिए कौशल प्रशिक्षण पर काफी जोर दे रही हैं . छोटे-छोटे व्यवसायों में कौशल विकास के लिए लोगों को मुफ्त ट्रेनिंग  देने का प्रावधान है . देवारों को भी   कौशल विकास योजनाओं से जोड़ा जा सकता है . सिर्फ पहल करने की जरूरत है .!
.( आलेख और फोटो - स्वराज करुण )

Saturday 8 July 2017

सीनियर कौन ...परमेश्वर या ईश्वर ?

देवी -देवताओं के दर्शन के लिए उसने पत्नी के आग्रह पर मन्दिर जाने का कार्यक्रम बनाया ,लेकिन कुछ देर बाद प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा ! कारण यह कि दोनों मन्दिरों के रास्तों पर ट्रकों की लम्बी -लम्बी कतारें लगी हुई थी और ट्रैफिक क्लियर होने में कम से कम एक घंटे का समय लगना तय था ! घर वापसी की भी जल्दी थी ! ऐसे में मन्दिर दर्शन का प्रोग्राम अधूरा रह जाने पर वापसी में रास्ते भर पत्नी अपने पति पर नाराजगी का कहर बरपाती रही ! उसने कहा - ये तुमने अच्छा नहीं किया ! भगवान को भी गच्चा दे दिया ! वे अब तुमको देख लेंगे ! वह रास्ते भर भयभीत होकर सोचता रहा - पत्नी तो नाराज हुई ,लेकिन क्या दोनों मन्दिरों के देवी-देवता भी नाराज हो रहे होंगे और क्या वे भी पत्नी के पति परमेश्वर पर गुस्से का कहर बरपाएंगे ? वैसे पति तो परमेश्वर होता है ,भला कोई ईश्वर उस पर क्यों और कैसे कहर बरपाएगा ? परमेश्वर तो ईश्वर से ज्यादा सीनियर होता है न ?
                                                                                                                                        -स्वराज करुण