Wednesday, May 27, 2020

शायद अब न दिल मिलेंगे न हाथ !


               -- स्वराज करुण 
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये !
हाथ मिलाते रहने से दिल भी कभी न कभी मिल ही जाते हैं । ऐसा मानकर शायर ने ऐसा लिखा होगा, ,लेकिन  क्या अब ऐसा नहीं लग रहा निदा फ़ाज़ली साहब की ग़ज़ल की यह लोकप्रिय पंक्ति वर्षों बाद सिर्फ़ चार महीने के भीतर  अप्रासंगिक हो गयी है ?  क्या दिल और क्या हाथ ! अब तो शायद  दोनों का ही मिलना मुश्किल है ।
    सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी इंसानों को असामाजिक बना रही है। आँखों से नज़र नहीं आने वाले एक सूक्ष्म वायरस ने मानव सभ्यता के सामाजिक ताने -बाने को तहस -नहस कर दिया है। अब कहा जा रहा है कि इंसानों को इसी वायरस के साथ जीना है ,जो उन्हें न तो हाथ मिलाने देंगे और न ही दिल ! (स्वराज करुण ) दुकानों में ,बाज़ारों में अगल -बगल या आमने -सामने खड़े या बैठे इंसान मन ही मन एक -दूसरे को सन्देह की नज़र से देख रहे हैं। भले ही कोई मास्क लगाया हुआ ही क्यों न हो ! मित्रता में या नाते -रिश्तेदारियों में  एक -दूसरे के घर आना -जाना लगभग बन्द हो गया है। एक ही शहर या गाँव में लोगों का स्वाभाविक और परम्परागत मेल -जोल समाप्ति की ओर है। गरीबों तथा निम्न आय और मध्यम आय वालों की ज़िन्दगी भी गहरी चिन्ता और बेचैनी में गुज़र रही है।
     खौफ़ का ऐसा माहौल बन गया है कि अगर किसी के घर में नल की टोंटी ख़राब हो जाए तो प्लम्बर को और इस भयानक गर्मी   बिजली का  कोई उपकरण जैसे कूलर ख़राब हो जाए तो इलेक्ट्रीशियन को बुलाने के बारे में दस बार सोचना पड़ता है ! दूध और सब्जी बेचने वाले छोटे कारोबारियों को भी सन्देह घेरे में कैद कर दिया गया है । शादी -ब्याह ,तीज -त्यौहार और मेले -ठेलों की रौनक और रंगत भी अब फ़ीकी पड़ने लगी है। विवाह और मृतक संस्कार में शामिल होने के लिए सरकार द्वारा तय संख्या में ही लोगों को आना है और  उसके लिए अगर एक जिले से दूसरे जिले में या एक राज्य से दूसरे राज्य में आना -जाना हो तो कतारबद्ध होकर सरकारी अनुमति लेना जरूरी हो गया है। 
     यानी इंसान अपने ही देश में विदेशी जैसा हो गया है ,जिसे पासपोर्ट और वीजा के लिए आवेदन करना पड़ता है। जन - जीवन की स्वाभाविकता विलुप्त होती जा रही है। आख़िर कब ख़त्म होगा यह उद्विग्न और विचलित कर देने वाला माहौल ?
   सन्दर्भ --चायनीज कोरोना वायरस 

साहित्य गगन के चमकदार सितारे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

(आज 27 मई को जयंती पर विशेष)
     आलेख : स्वराज करुण 
 साहित्य और पत्रकारिता के नक्शे पर छत्तीसगढ़ को  देश और दुनिया में  पहचान दिलाने वाली दिग्गज विभूतियों में स्वर्गीय डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी का नाम भी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।  वह आधुनिक हिन्दी साहित्य गगन  के चमकदार सितारे थे ,जो अपनी रचनाओं से  लगभग छह दशकों तक  सम्पूर्ण हिन्दी संसार को आलोकित करते रहे। सचमुच ऋषितुल्य था उनका व्यक्तित्व । उन्होंने अपनी 77 वर्षीय जीवन - यात्रा के लगभग 60 वर्ष एक तपस्वी की तरह देवी सरस्वती की उपासना में अर्पित कर दिए।  आज 27 मई को उनकी जयंती है। इस उपलक्ष्य में  उन्हें याद करते हुए आइए आज डालते हैं उनकी जीवन यात्रा के साथ  रचना संसार पर एक नज़र।
    हिन्दी साहित्य के इतिहास में बख्शीजी की गिनती द्विवेदी युग के महान लेखकों और साहित्यिक पत्रकारों में होती है। साहित्यकार और पत्रकार होने के अलावा उन्होंने  स्कूल अध्यापक और कॉलेज  प्राध्यापक के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी भूमिकाओं का बड़ी कुशलता से निर्वहन किया ।
 उनका जन्म छत्तीसगढ़ के वर्तमान राजनांदगांव जिले के अंतर्गत एक   छोटे -से रियासती मुख्यालय  खैरागढ़ में 27 मई सन 1894 में हुआ था। यह वही खैरागढ़ है जहाँ  एशिया का  पहला संगीत एवं कला विश्वविद्यालय है , जो  खैरागढ़ रियासत की राजकुमारी इंदिरा के नाम पर विगत लगभग छह दशकों से संचालित हो रहा है। इसकी स्थापना 14 अक्टूबर 1956 में हुई थी ।  इस अनोखे विश्वविद्यालय ने खैरागढ़ का नाम देश -विदेश में रौशन तो किया ही ,लेकिन इसकी स्थापना से पहले वहाँ की माटी में जन्मे साहित्य मनीषी बख्शीजी की रचनाओं से यह  कस्बाई शहर भी देश और दुनिया की साहित्यिक बिरादरी में प्रसिद्ध हो गया था।। रायपुर के दाऊ कल्याण सिंह अस्पताल (डी.के.अस्पताल )में 28 दिसम्बर 1971 को बख्शीजी का निधन हो गया ।
       उनके पिता का नाम पुन्नालाल बख़्शी और माता का नाम मनोरमा देवी था।  पदुमलाल जी की प्रारंभिक शिक्षा खैरागढ़ में हुई ,जहाँ पण्डित रविशंकर शुक्ल उनके स्कूल के प्रधान अध्यापक थे ,जो आगे चलकर देश के महान  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और वर्ष 1947 में देश की  आज़ादी के 9 साल बाद 1956 में बने मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री  बने । बख्शीजी की साहित्य साधना वर्ष 1911 में  शुरू हो चुकी थी। तब वह  मात्र 17 वर्ष के किशोर थे । उन दिनों उनकी एक रचना जबलपुर से छपने वाली 'तारिणी ' नामक पत्रिका में छपी । यह एक अंग्रेजी कहानी का भावानुवाद था। मिडिल उत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने खैरागढ़ के विक्टोरिया हाई स्कूल में प्रवेश लिया था । वर्ष  1911की मेट्रिक परीक्षा में वह फेल हो गए थे ,लेकिन अगले साल इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने बनारस के सेंट्रल हिन्दू कॉलेज में दाखिला लिया और  वर्ष 1916 में  वहाँ से बी.ए.की उपाधि हासिल की। वर्ष 1913 में उनका विवाह मण्डला  के ग्राम महाराजपुर निवासी हरिप्रसाद श्रीवास्तव की सुपुत्री लक्ष्मीदेवी के साथ सम्पन्न हुआ । बी.ए. उत्तीर्ण होने के बाद  वर्ष 1916 में बख्शीजी को  स्टेट हाई स्कूल राजनांदगांव में संस्कृत शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गयी ।  उन्हीं दिनों उनका एक निबन्ध 'सोना निकालने वाली चींटियां ' शीर्षक से उस जमाने की प्रसिद्ध पत्रिका 'सरस्वती' में प्रकाशित हुआ।  सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 'इण्डियन प्रेस'  की इस पत्रिका के सम्पादक थे। यह पत्रिका इलाहाबाद से छपती थी।  बख्शीजी वर्ष 1920 में  इस पत्रिका के सहायक सम्पादक नियुक्त किए गए  उन्हें महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे दिग्गज साहित्यकार और पत्रकार के मार्गदर्शन में काम करने का अवसर मिला । उनकी विलक्षण प्रतिभा को देखते हुए अगले ही साल जनवरी  1921में उन्हें पदोन्नत कर  'सरस्वती ' का  प्रधान सम्पादक बना दिया गया।
          स्वतंत्रता संग्राम का दौर था और  पूरे भारत में राष्ट्रीय चेतना की लहर चल रही थी।  बख्शीजी ने भी  'सरस्वती ' पत्रिका के माध्यम से आज़ादी के आंदोलन की धार को तेज करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने इस पत्रिका में 'देश की दशा ' और 'संसार की गति ' शीर्षक से दो स्तंभ शुरू किए ,जिनसे पत्रिका की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। वर्ष 1925 में उन्होंने अपने पिता पुन्नालाल बख़्शी के निधन के बाद कुछ पारिवारिक कारणों से इस पद से इस्तीफा दे दिया और अपने घर खैरागढ़ लौट आए।  प्रकाशकों के अनुरोध पर वर्ष 1927 में उन्होंने  पुनः 'सरस्वती' के  सम्पादक पद का कार्यभार संभाल लिया ।लेकिन वर्ष 1929 में कुछ कारणों से  फिर इस्तीफा दे कर खैरागढ़ आ गए और  वर्ष 1930 में एक बार फिर स्टेट हाई स्कूल राजनांदगांव में अध्यापक बन गए । वहाँ वर्ष 1934 तक अध्यापन कार्य के बाद वह  अपने गृह नगर  खैरागढ़ लौट गए  , जहाँ विक्टोरिया हाई स्कूल में वर्ष 1935 से 1949 तक उन्होंने अंग्रेजी के अध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दी। राज्य सरकार ने इस हाई स्कूल का नामकरण उनके नाम पर किया है। आज यह  पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला के नाम से संचालित हो रहा है। उन्होंने कुछ समय तक नरहरदेव हाई स्कूल कांकेर में भी शिक्षकीय कार्य किया। अपने गृह नगर खैरागढ़ में रहकर उन्होंने  वर्ष 1952 से 1956 तक पुनः 'सरस्वती' का सम्पादन किया ।
        दरअसल स्वास्थ्यगत कारणों से उनके लिए इलाहाबाद में नियमित रूप से रह पाना असंभव था ,लेकिन प्रकाशकों का आग्रह था कि वह अपने घर में रहकर ही  इसके सम्पादन का दायित्व पुनः संभालें ।   उन्होंने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया । सहायक सम्पादक देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्त' स्वयं पत्रिका की प्रकाशन सामग्री लेकर  बख्शीजी से सम्पादन करवाने के लिए इलाहाबाद से खैरागढ़ आते-जाते  थे।  यह बख्शीजी की  प्रतिभा और विद्वता  का ही कमाल था कि उन्हें वर्ष 1920 से 1956 तक 36 वर्षों में  चार अलग -अलग कालखण्डों में  'सरस्वती' जैसी राष्ट्रीय स्तर की  प्रतिष्ठित पत्रिका की   सम्पादकीय कमान संभालने का अवसर मिला । ।वर्ष 1920 में सहायक सम्पादक ,वर्ष 1921 में प्रधान सम्पादक और वर्ष 1927 से 1929 तक तथा वर्ष 1952 से 1956 तक पुनः सम्पादकीय दायित्व । एक पत्रकार के लिए यह निश्चित रूप से सम्मान की बात थी । बख्शीजी में  साहित्य और पत्रकारिता की अभिरुचि किशोरवय से ही अंकुरित हो चुकी थी ,जो  युवावस्था से लेकर जीवन पर्यन्त  और भी अधिक पुष्पित और पल्लवित होती रही।।   वह  मित्रों के साथ मिलकर खैरागढ़ से हस्तलिखित वार्षिक पत्रिका 'जन्म भूमि '  लगातार तीन वर्षों तक निकालते रहे। उन्होंने 'सरस्वती ' पत्रिका की नौकरी छोड़कर खैरागढ़ वापस आने पर वहाँ के  रियासती शासन के समाचार पत्र ' प्रजाबंधु ' का भी कुछ समय तक सम्पादन किया। यह वही खैरागढ़ है जहाँ  एशिया का  पहला संगीत एवं कला विश्वविद्यालय है जो  खैरागढ़ रियासत की राजकुमारी इंदिरा के नाम पर विगत लगभग छह दशकों से संचालित हो रहा है।   बख्शीजी ने  रायपुर से प्रकाशित छत्तीसगढ़ के प्रथम दैनिक 'महाकोशल' के साहित्य सम्पादक के रूप में वर्ष 1955 में  रविवारीय अंकों का भी  सम्पादन किया।  वह बी.ए. पास थे ,लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर  उनकी महत्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 1959 में उन्हें दिग्विजय कॉलेज राजनांदगांव में हिन्दी का प्राध्यापक नियुक्त किया गया । उन दिनों छत्तीसगढ़ अंचल के कॉलेज सागर विश्वविद्यालय के अधीन संचालित होते थे। पण्डित द्वारिका प्रसाद मिश्र इस विश्वविद्यालय के उपकुलपति हुआ करते थे। उन दिनों राज्यपाल विश्वविद्यालयों के 'कुलपति ' कहलाते थे । वर्तमान में  उन्हें कुलाधिपति'कहा जाता है।
      बख्शीजी की रचनाएं विश्वविद्यालय के हिन्दी पाठ्यक्रम में भी शामिल थीं। इस आधार पर भी  विशेष प्रकरण मानकर उन्हें  दिग्विजय कॉलेज में हिन्दी  प्राध्यापक के पद पर नियुक्त किए जाने के प्रस्ताव पर  विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने अपनी सहमति प्रदान कर दी। इतना ही नहीं बल्कि उपकुलपति पण्डित द्वारिका प्रसाद मिश्र ने बख्शीजी को डी.लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित करने का भी प्रस्ताव रखा ,जिसे विश्वविद्यालय की कार्य परिषद ने सहर्ष अनुमोदित कर दिया। यही पण्डित द्वारिका प्रसाद मिश्र आगे चलकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इस बीच बख्शीजी ने 20 अगस्त 1959 को दिग्विजय कॉलेज राजनांदगांव में प्राध्यापक का पद संभाला और मृत्यु पर्यन्त यानी 1971 तक वहाँ अपनी सेवाएं देते रहे। 
         पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी का रचना संसार बहुत व्यापक है। वह धीर -गंभीर चिन्तक तो थे ही ,समीक्षक ,निबन्ध लेखक ,नाट्य लेखक, कहानीकार  और उपन्यासकार के रूप में भी उन्हें भरपूर प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मिली। दिसम्बर 1960 में डॉ.हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय (सागर विश्वविद्यालय ) ने अपने दीक्षांत समारोह में बख़्शी जी को  डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (डी.लिट्)की मानद उपाधि से सम्मानित किया। इसके पहले  वर्ष 1949 में उन्हें हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा'साहित्य वाचस्पति ' की उपाधि से नवाजा गया था । वर्ष 1965 में  मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन  के रायपुर अधिवेशन में भी बख़्शीजी को सम्मानित किया गया । उन्हें  अपने समय के अनेक दिग्गज साहित्यकारों का स्नेह और सानिध्य मिला । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अलावा मुंशी प्रेमचंद , मैथिलीशरण गुप्त ,सुमित्रानन्दन पंत, भगवतीचरण वर्मा , सुभद्राकुमारी चौहान , महादेवी वर्मा ,सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला',  कामताप्रसाद गुरु ,लोचनप्रसाद पाण्डेय , रामानुजलाल श्रीवास्तव ,डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र और  गजानन माधव मुक्तिबोध सहित अनेक वरिष्ठ और विशिष्ट साहित्यकारों से उनका निकटतम  साहित्यिक सम्पर्क रहा।
           बख़्शी जी के उपन्यासों में'कथाचक्र', 'भोला' और 'वे दिन ' उल्लेखनीय हैं।  उनके लिखे नाटकों के तीन संकलन  भी पुस्तकों के रूप में काफी चर्चित हुए ,जिनमें वर्ष 1916 में प्रकाशित 'प्रायश्चित' , वर्ष 1959 में प्रकाशित ' भोला ' और वर्ष 1965 में छपी 'त्रिपथगा' शामिल हैं।उंन्होने विभिन्न विषयों पर बड़ी संख्या में निबन्ध भी लिखे,जो उन दिनों पत्र -पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपे लेकिन पुस्तक रूप में उनका पहला निबंध  संग्रह 'साहित्य चर्चा ' शीर्षक से  वर्ष 1937 में प्रकाशित हुआ था । इसके बाद 'कुछ' शीर्षक से वर्ष 1948 में तथा 'और कुछ ' शीर्षक से वर्ष 1950 में दो निबंध संग्रह प्रकाशित हुए। उनके  कुल 14 निबंध संग्रह हैं। इनमें कुल 218 निबंध संकलित हैं। मुझे याद आ रहा है कि 'क्या लिखूँ ' शीर्षक से उनका एक निबंध वर्ष 1973-74 में मध्यप्रदेश हायर सेकेंडरी बोर्ड के पाठ्यक्रम में भी शामिल था। यह उनका बड़ा ही दिलचस्प निबंध है। इसमें लेखक अपनी दो छात्राओं -अमिता और नमिता को दो अलग -अलग विषय देकर उन पर निबंध लिखने के लिए कहते हैं। एक का विषय होता है -'दूर के ढोल सुहावने होते हैं 'जबकि  दूसरे को  'समाज सेवा ' पर निबंध लिखना होता है। अपने विद्यार्थियों और पाठकों को निबंध कला की जानकारी देने के लिए उन्होंने 'क्या लिखूँ ' शीर्षक से निबंध  रचना की थी ,जो निबंध विधा  में रुचि लेने वाले नये लेखकों के लिए भी काफी उपयोगी है। बख्शीजी ने बच्चों के लिए भी बहुत लिखा। बाल -साहित्य के अंतर्गत 'कथा वाटिका , गद्य सुषमा , मातृभूमि जैसी  उनकी अनेक  पुस्तकें तत्कालीन मध्य प्रान्त और बरार (सी.पी.एंड बरार )और मध्यप्रदेश सरकार की प्राथमिक शालाओं से लेकर मिडिल और हाई स्कूलों के पाठ्यक्रमों में भी शामिल थीं।।               हिन्दी साहित्य संसार में कहानीकार के रूप में भी उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इनमें 'झलमला ' , 'गुड़िया ' छत्तीसगढ़ की आत्मा' ,' मेरो तो गिरधर गोपाल' ,  'मोटर स्टैंड' 'चक्करदार चोरी ' 'गोमती ' आदि की गिनती हिन्दी की कालजयी कहानियों में होती है। उनकी कहानियों में मानव जीवन के सुख -दुःख की हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति है।   कहानी 'छत्तीसगढ़ की आत्मा " में  'कारी' नामक ममतामयी  स्त्री पात्र  के सहज -सरल आत्मीय स्वभाव को बख्शीजी ने बड़े ही   मार्मिक अंदाज़ में व्यक्त किया है।  बख्शीजी के समग्र रचना संसार को ' बख़्शी ग्रंथावली 'के नाम से आठ खण्डों में प्रकाशित किया गया है। प्रदेश  सरकार की संस्था-छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी ,रायपुर द्वारा उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर   'साहित्य की बगिया का माली ' शीर्षक से गणेश शंकर शर्मा की पुस्तक वर्ष 2007 में प्रकाशित की गयी थी । आलेख में उल्लेखित कई  तथ्य उनकी इस पुस्तक से साभार लिए गए हैं।
      छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी  राजनांदगांव देश के तीन  महान साहित्यकारों की कर्मभूमि के रूप में भी प्रसिद्ध  है ।  पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी सहित डॉ.बल्देवप्रसाद मिश्र और गजानन माधव मुक्तिबोध ने यहाँ  अपनी साहित्य -साधना से इस शहर के साथ -साथ सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का भी गौरव बढ़ाया है। इन तीनों साहित्य मनीषियों के सम्मान में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा  वहाँ त्रिवेणी परिसर और मुक्तिबोध स्मारक की भी स्थापना की गयी है। यह परिसर एक  संग्रहालय के रूप में है । प्रबुद्धजनों के साथ -साथ वर्तमान पीढ़ी के लेखकों और कवियों के लिए भी यह एक साहित्यिक तीर्थ है , जहाँ तीनों विभूतियों के जीवन और साहित्य सृजन से जुड़े छायाचित्रों  , उनके महत्वपूर्ण पत्रों  ,  दैनिक उपयोग की वस्तुओं  और उनकी साहित्यिक पुस्तकों आदि को सुव्यवस्थित रूप से प्रदर्शित किया गया है।  राष्ट्रीय स्तर के अनेक लेखक और कवि समय -समय पर यहाँ आते रहे हैं।               भौतिक रूप से आज बख्शीजी भले ही हमारे बीच नहीं हैं ,लेकिन अपनी अमिट रचनाओं की मूल्यवान धरोहर के साथ वह हमारी यादों  में हमेशा मौज़ूद रहेंगे ।
           आलेख : स्वराज करुण

    

Saturday, November 23, 2019

(आलेख) महानदी की महिमा अपरम्पार


                            -स्वराज करुण 
 
नदियाँ हमारी धरती को प्रकृति की सबसे बड़ी सौगात हैं ।  जरा सोचिए ! एक नदी के कितने नाम हो सकते हैं? छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की जीवन रेखा 885 किलोमीटर की  महानदी के भी कई नाम हैं । इसकी महिमा अपरम्पार है । इसके किनारों पर इसका उदगम वह नहीं है ,जिसे आम तौर पर माना और बताया जाता है ।
     दक्षिण कोसल यानी प्राचीन छत्तीसगढ़ और उधर उत्कल प्रदेश का  हजारों वर्षों का  भौगोलिक और सांस्कृतिक इतिहास इससे जुड़ा हुआ है ।   छोटी -बड़ी कई सहायक नदियों को अपने आँचल में सहेजकरयह बंगाल की खाड़ी में पहुँचने तक विशाल से विशालतम आकार धारण करती जाती है।
  महानदी के बारे में कहा जाता है कि यह छत्तीसगढ़ के सिहावा पर्वत में श्रृंगी ऋषि के आश्रम के पास से निकली है । लेकिन यह अर्धसत्य है ।  इसका उदगम क्षेत्र धमतरी  जिले में  सिहावा का पर्वतीय अंचल जरूर है ,लेकिन  वहाँ इसका प्रवाह फरसिया कुण्ड से शुरू होता है । वहां पर यह महानन्दा के नाम से जानी जाती है । इस कुण्ड को महानन्दा कुण्ड भी कहते हैं । यह कुण्ड नगरी कस्बे से आठ किलोमीटर पर है। सेवानिवृत्त वरिष्ठ राजस्व अधिकारी जी.आर. राना के अनुसार  तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन के टोपोशीट में भी इसका उल्लेख है ।   
 छत्तीसगढ़ के एक बहुत बड़े भू -भाग में यह  नदी  दक्षिण से उत्तर दिशा में बहती है और राज्य के प्रसिद्ध तीर्थ शिवरीनारायण में आकर शिवनाथ और जोंक नदियों के  साथ त्रिवेणी संगम का निर्माण करने के बाद वहाँ से पूर्वी दिशा में ओड़िशा की ओर बढ़ जाती है । इसके पहले यह राजिम में भी यह  पैरी और सोंढूर नदियों के साथ मिलकर त्रिवेणी संगम का निर्माण करती है।
    फरसिया कुण्ड के अपने उदगम  से निकलकर महानदी  ग्राम मोदे के पुराने पुल से होते हुए कर्णेश्वर धाम (देवपुर ) पहुँचती है ।यहाँ पर देवहृद नामक जलकुण्ड है । (स्वराज करुण)कर्णेश्वर धाम में हर साल प्रसिद्ध मेले का भी आयोजन होता है। यहीं पर महानन्दा यानी महानदी से बालका नदी का भी मिलन होता है। इस वन क्षेत्र में सीता नदी का उदगम है । सीता नदी और वालका नदी एक चट्टान से निकलती हैं ।   दोनों नदियों के नामों से रामायण कालीन इतिहास का भी सम्बन्ध जुड़ता है । वालका से आशय महाकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि से है और सीता नदी माता सीता के नाम से ।     
     सिहावा पर्वत के नीचे एक अक्षयवट है। वहाँ के झरने का पानी महानन्दा और वालका नदियों में मिलता है । दोनों  नदियाँ एकाकार होकर चित्रोत्पला गंगा के नाम से आगे प्रवाहित होती हैं । वहाँ से लगभग दो -ढाई किलोमीटर पर पाँव द्वार नामक एक पवित्र स्थान है ,जहाँ  भगवान श्रीगणेश जी की मूर्ति को जंजीर से बांधकर रखा गया है । पाँव द्वार के पास सीता नदी चित्रोत्पला यानी महानदी से मिलती है।वहाँ से करीब दो या ढाई किलोमीटर आगे जाकर चित्रोत्पला कंक पर्वत की ओर मुड़ जाती है ,जहाँ वह इसके पर्वतीय झरने से मिलकर आगे कंक नन्दिनी के नाम से बहने लगती है । (स्वराज करुण) केशकाल घाटी की दो छोटी  नदियाँ कंक नन्दिनी में मिल जाती हैं । इनके नाम हैं -हटकुल और दूध नदी । ग्राम पुरी  (पटौद)के पास हटकुल और ग्राम कुरना के पास दूध नदी का मिलन कंक नन्दिनी यानी महानदी से होता है । फिर वह मुरूमसिल्ली से होती हुई आगे राजिम की दिशा में मुड़ जाती है ।
     इस बीच गरियाबंद के भाटीगढ़ में एक चट्टान से पैरी नदी और उधर सिहावा पर्वत के दूसरे छोर से सोंढूर नदी राजिम से कुछ आगे बारुका  में आकर   एकाकार होती हैं और आगे पाण्डुका के पास सिरकट्टी में मकरवाहिनी के नाम से प्रवाहित होकर राजिम में महानदी के साथ पवित्र त्रिवेणी संगम का में समाहित हो जाती हैं ।(स्वराज करुण ) उल्लेखनीय है कि सिरकट्टी में प्राचीन बन्दरगाह के भी अवशेष मिले हैं । इससे पता चलता है कि छत्तीसगढ़ में महानदी और उसकी सहायक नदियों के जलमार्गों से  नौकाओं द्वारा भारत के दूर -दराज के इलाकों तक व्यापार होता था । राजिम को अनेक धर्माचार्यों  ने पौराणिक सन्दर्भों के आधार पर 'पद्म क्षेत्र ' या 'कमल क्षेत्र' के नाम से भी चिन्हांकित किया है। यहाँ का राजीवलोचन मन्दिर छत्तीसगढ़ सहित देश -विदेश के लाखों-करोड़ों लोगों की आस्था का प्रमुख केन्द्र है  ।
राजेश्री डॉ. महन्त रामसुन्दर दास ने छत्तीसगढ़ के मन्दिरों पर केन्द्रित अपने ग्रन्थ ' श्रीराम संस्कृति की झलक ' में इतिहासविदों को संदर्भित करते हुए लिखा है कि आठवीं शताब्दी में नलवंशीय राजा विलासतुंग ने भगवान श्री राजीवलोचन की चतुर्भुजी मूर्ति के लिए इस मन्दिर का निर्माण करवाया ,जबकि कल्चुरि शासक पृथ्वीदेव द्वितीय  के सेनापति जगतपाल ने बारहवीं शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार करवाया था। इसका उल्लेख मन्दिर के महामण्डप की पार्षवभित्ति पर अंकित कल्चुरि सम्वत 896 अर्थात सन 1154 ईस्वी के एक शिलालेख में किया गया है ।
             
    हाँ तो राजिम में  कुलेश्वर महादेव के मन्दिर के पास महानदी ,पैरी और सोंढूर नदियों का जो त्रिवेणी संगम है ,उसे भगवान शंकर का ही कुल माना जाता है। यहाँ महानदी का एक नाम 'महानन्दी'  यानी शिव भी है । पैरी को पार्वती और सोंढूर को उनके पुत्र भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है । राजिम का परम्परागत पुन्नी मेला भी काफी प्रसिद्ध है ,जो  माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक चलता है। सैकड़ों वर्ष पहले तीर्थ नगरी राजिम का नामकरण भक्तिन  माता राजिम के नाम पर हुआ था ।  वहाँ से आगे  महानदी महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्म स्थली चम्पारण्य पहुँचती है। महान संत वल्लभाचार्यजी का जन्म संवत 1535 याने कि सन 1479 ईस्वी में हुआ था। उन्होंने विद्या अध्ययन काशी में किया । हिन्दी साहित्य के इतिहास में वह  भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से थे ।  श्रीकृष्ण के परम भक्त  वल्लभाचार्य जी ने  पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन करते हुए स्वयं लगभग दो दर्जन ग्रन्थों की रचना की ,जिनमें तत्वार्थ दीप, पुरुषोत्तम सहस्त्र नाम , मधुराष्टक आदि शामिल हैं । सूरदास ,कुम्भनदास ,परमानन्द दास आदि महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित पुष्टि मार्ग के आठ प्रसिद्ध कवि हुए ,जिन्हें अष्टछाप कवि के नाम से जाना जाता है । आगे जाकर महानदी  फिंगेश्वर के पास  सुखनी नदी को भी अपने आँचल में सहेज लेती है।
      आगे चलकर राजा मोरध्वज की नगरी आरंग , दक्षिण कोसल की राजधानी के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर (श्रीपुर )होते हुए महानदी जांजगीर -चाम्पा जिले में  शिवरीनारायण पहुँचती है ,जहाँ शिवनाथ और जोंक नदियों के साथ त्रिवेणी संगम बनाकर वह पूर्वी दिशा में चंद्रपुर आती है। यहाँ पर वह माण्ड नदी से मिलकर आगे ओड़िशा की दिशा में सम्बलपुर की तरफ बढ़ जाती है ,जहाँ उसकी विशाल जल राशि से बना विश्वप्रसिद्ध हीराकुद बाँध स्थित है । वहाँ से महानदी ओड़िशा के ही बरगढ़ ,सम्बलपुर ,  सोनपुर ,बलांगीर आदि जिलों से होते हुए कटक के पास बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है। महानदी पर छत्तीसगढ़ में निर्मित रुद्री ,  गंगरेल बाँध (रविशंकर जलाशय ),  मुरूमसिल्ली जलाशय और समोदा व्यपवर्तन जैसी परियोजनाओं से लाखों एकड़ खेतों को सिंचाई सुविधा मिल रही है। गंगरेल बांध में छत्तीसगढ़ सरकार की एक जलविद्युत परियोजना भी विगत कई वर्षों से संचालित है । इतना ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ का सबसे लम्बा पुल भी महानदी पर बनाया गया है ,जो रायगढ़ जिले में सूरजगढ़ के पास ग्राम परसरामपुर में है । इसकी लम्बाई 1830 मीटर यानी करीब -करीब दो किलोमीटर है। यह पुल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ , सरिया ,बरमकेला आदि इलाकों को ओड़िशा के बरगढ़ जिले से जोड़ता है ।
   महानदी के दोनों किनारों पर  प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक अमिट स्मृति चिन्ह हमें दक्षिण कोसल और उत्कल प्रदेशों के गौरवशाली अतीत और  सांस्कृतिक वैभव की याद दिलाते हैं।  छत्तीसगढ़ की यह धरती रामायण काल में माता कौसल्या की जन्म स्थली और उनके मायके के रूप में  तो चिन्हांकित है । इसलिए यह प्रदेश  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का ननिहाल भी है।  पौराणिक इतिहासकारों के अनुसार  चौदह वर्षों के वनवास के लिए अयोध्या से निकले श्रीराम का वनगमन पथ भी छत्तीसगढ़ से होकर  गुज़रा है ।
श्रीपुर (सिरपुर) जहाँ तत्कालीन दक्षिण कोसल की राजधानी के रूप में विख्यात है ,वहीं यह शैव ,वैष्णव और बौद्ध संस्कृतियों के त्रिवेणी संगम के रूप में भी इतिहास में प्रसिद्ध है । जाने -माने कवि और इतिहासविद स्वर्गीय हरि ठाकुर  ने अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा' में श्रीपुर को सातवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की मूर्ति कला के एक अत्यंत महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में वर्णित किया है। वह लिखते हैं - "सन 1955-56 में डॉ. म.गो. दीक्षित के निर्देशन में श्रीपुर में उत्खनन करवाया गया, जिसमें डेढ़ हज़ार वर्ष प्राचीन धर्म ,संस्कृति और कला के अनेक रहस्यों का उदघाटन हुआ ।"
  यह भी उल्लेखनीय है कि सन 639 ईस्वी में इतिहास प्रसिद्ध चीनी यात्री हुएन सांग ने अपने यात्रा वर्णन में इसे भारत का एक प्रमुख बौद्ध केन्द्र बताया था । इतना ही नहीं ,बल्कि हुएन सांग ने  यह भी लिखा है कि बौद्ध दार्शनिक और महायान सम्प्रदाय के संस्थापक  बोधिसत्व नागार्जुन भी श्रीपुर (सिरपुर ) में रहते थे । हरि ठाकुर के अनुसार नागार्जुन ही वह प्रमुख व्यक्ति थे ,जिन्होंने बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को संस्कृत भाषा में लिखा। उनके पूर्व बौद्ध धर्म के ग्रन्थ पाली भाषा में लिखे जाते थे । दर्शन के क्षेत्र में शून्यवाद नागार्जुन की सबसे बड़ी देन है ।अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा" में हरिठाकुर  कहते हैं -"हुएन सांग के सिरपुर प्रवास के समय महायानी बौद्धों के 100 संघाराम(बौद्ध मठ या विहार ) थे ,जहाँ दस हज़ार भिक्षु महायान धर्म दर्शन की शिक्षा ग्रहण करते थे ।उस समय श्रीपुर नगर दस किलोमीटर की परिधि में बसा हुआ था ।(स्वराज करुण )यह नगर महाशिवगुप्त बालार्जुन की राजधानी था । बौद्ध धर्म को बालार्जुन का राजाश्रय प्राप्त था । " अब कुछ चर्चा शिवनाथ और जोंक नदियों के साथ महानदी की मिलन भूमि शिवरीनारायण के बारे में भी हो जाए । यह मन्दिरों का शहर है। राजेश्री डॉ. महन्त रामसुन्दर दास कहते हैं -" हमारे देश के उत्तर में श्री बद्रीनाथ धाम ,दक्षिण में श्री रामेश्वरम धाम ,पूर्व में श्री जगन्नाथपुरी धाम और पश्चिम में श्रीद्वारिकापुरी धाम स्थित हैं । छत्तीसगढ़ का श्री शिवरीनारायण धाम इन सबके बीच 'गुप्त धाम ' के रूप में स्थित है ।"  यहाँ के प्रमुख मन्दिरों में श्री शिवरीनारायण मन्दिर ,श्रीमठ मन्दिर श्रीराम मन्दिर , मां अन्नपूर्णा मन्दिर , श्रीचन्द्रचूड़ महादेव मन्दिर ,श्री जगन्नाथ मन्दिर आदि उल्लेखनीय हैं । शिवरीनारायण में पीपल का एक विशाल वृक्ष अपने दोनाकार पत्तों के कारण श्रद्धालुओं के  विशेष  आकर्षण का केन्द्र है ।  (स्वराज करुण )शिवरीनारायण धाम और महानदी  से कुछ ही  किलोमीटर के फासले पर बलौदाबाजार जिले में कसडोल के पास पवित्र गिरौदपुरी धाम स्थित है ,जो छत्तीसगढ़ के महान सन्त  समाज सुधारक और सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु बाबा घासीदास जी की जन्म स्थली और तपोभूमि के रूप में लाखों -करोड़ों लोगों की आस्था का प्रमुख केन्द्र है। महानदी  के ही आँचल में पहाड़ियों के  प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण ग्राम तुरतुरिया संस्कृत भाषा के महाकवि और 'रामायण ' के रचयिता महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि और उनके आश्रम के नाम से प्रसिद्ध है। यह बलौदाबाजार -भाटापारा जिले में स्थित है । लोकमान्यता है कि  माता सीता ने  वनवास के दौरान यहीं पर अपने महान सपूतों -लव और कुश को जन्म दिया था।  महर्षि वाल्मीकि का आश्रम एक गुरुकुल भी था , जहाँ उन्होंने  माता सीता को न सिर्फ़ आश्रय दिया ,बल्कि उनके दोनों पुत्रों को वेद और पुराण सहित विभिन्न धर्म ग्रन्थों की शिक्षा भी दी ।
      शिवरीनारायण धाम के निकटवर्ती प्राचीन खरौद नगर भी महानदी के कछार में ही स्थित है , जहाँ का ऐतिहासिक लक्ष्मणेश्वर मन्दिर भी बहुत प्रसिद्ध है ।  इतिहासकार बताते हैं कि इसका निर्माण सिरपुर (श्रीपुर) के चंद्रवंशी राजाओं द्वारा आठवीं शताब्दी में करवाया गया था। निराकार महालिक की मूल ओड़िया पुस्तक के मेरे द्वारा किए गए हिन्दी रूपांतर 'तीर्थ क्षेत्र नृसिंहनाथ ' पर अपने अभिमत में  ओड़िया भाषा के सुपरिचित लेखक डॉ. शंकरलाल पुरोहित ने  लिखा है
   -"महानदी उपत्यका में धर्म की धारा का वेग देखना हो तो ओड़िशा के नृसिंहनाथ ,हरिशंकर ,सोनपुर और कँटीलो आदि कम प्रचारित तीर्थों की ओर ध्यान लगाना होगा ।वह धारा अनुचय स्वर में भारतीय धर्म जगत के इतिहास को आज भी अपने दोनों ओर निनादित कर रही है ।प्रचार के शंखनाद में वह कहीं सुनाई नहीं पड़ती ,लेकिन इससे क्या इतिहास बदल जाएगा ? हाँ ,रोमांटिक दृष्टि रखने वाले चाहे इतिहास कैसे भी लिखें ,ये खण्डहर चाहे लुप्त हो जाएं ,पर इनकी धड़कन वर्तमान और इतिहास के बीच की सही कड़ी ढूंढते समय सुनना अपरिहार्य होगा ।"
     आख़िर महानदी के पानी में ऐसा क्या जादू है कि  धर्म ,दर्शन ,साहित्य ,कला और संस्कृति से जुड़ी अनेक महान विभूतियों ने इसके आँचल में जन्म लेकर या इसे अपना कर्मक्षेत्र बनाकर  तत्कालीन कोसल और दक्षिण कोसल (वर्तमान छत्तीसगढ़ )का गौरव बढ़ाया है ।  सुदूर अतीत में चाहे महर्षि वाल्मीकि हों  या महाप्रभु वल्लभाचार्य और आधुनिक युग अर्थात  अठारहवीं सदी में    गुरु बाबा घासीदास या उनके पहले पंद्रहवीं शताब्दी में  बांधवगढ़ से छत्तीसगढ़ आकर यहाँ कबीरपंथ की शाखा प्रारंभ करने वाले धनी धर्मदास ,  चाहे सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ से शहीद होने वाले सोनाखान के वीर नारायण सिंह हों या बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में तीर्थ नगरी राजिम में 21 दिसम्बर सन 1881 को जन्मे साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पण्डित सुन्दरलाल शर्मा , चाहे कण्डेल नहर सत्याग्रह के सूत्रधार बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव हों   सबके व्यक्तित्व और कृतित्व में किसी न किसी रूप में महानदी के पवित्र जल का असर हुआ ही है.ऐसी मेरी धारणा है। वर्तमान युग में देखें तो  राजिम सन्त  कवि पवन दीवान ,कृष्णा रंजन और पुरुषोत्तम अनासक्त जैसे बड़े कवियों की कर्मभूमि रह चुकी है।(स्वराज करुण ) छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला व्याकरण महानदी के  ही तटवर्ती धमतरी में सन 1885 में हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा  लिखा गया।   धमतरी में ही नारायण लाल परमार , त्रिभुवन पाण्डेय ,मुकीम भारती ,भगवतीलाल सेन और सुरजीत नवदीप जैसे कवियों और लेखकों ने अपनी रचनाओं से देश -विदेश में छत्तीसगढ़ का नाम रौशन किया ।  महान पुरातत्वविद पण्डित लोचनप्रसाद पाण्डेय और  आधुनिक हिन्दी  कविता में छायावाद के प्रवर्तक पद्मश्री सम्मानित पण्डित मुकुटधर पाण्डेय का जन्म  भी महानदी के किनारे ग्राम -बालपुर में हुआ था । यह गाँव  साहित्य ,  कला और संस्कृति की नगरी रायगढ़ से  लगभग 40 किलोमीटर पर है। रायगढ़ दोनों भाइयों का  कर्मक्षेत्र रहा ।
  राजधानी रायपुर भी महानदी से कोई बहुत दूर नहीं है।  यही कोई चालीस किलोमीटर के आस-पास ! इसलिए रायपुर की अनेक विभूतियों के जीवन दर्शन पर भी महानदी के पानी का असर साफ़ नज़र आता है । यहाँ का दूधाधारी मठ भी छत्तीसगढ़ वासियों की आस्था का प्राचीन और प्रसिद्ध केन्द्र है । इसकी स्थापना सम्वत 1610 में राजेश्री महन्त बलभद्र दास द्वारा की गयी थी ,जिन्हें  सिर्फ़ दूध का आहार ग्रहण करने के कारण दूधाधारी महाराज के नाम से प्रसिद्धि मिली ।
अंग्रेज हुकूमत के ख़िलाफ़ सशस्त्र संघर्ष के महानायक  सोनाखान के अमर शहीद वीर नारायण सिंह  ने इसी रायपुर शहर में 10 दिसम्बर 1857 को फाँसी की सजा को स्वीकार करते हुए देश की आज़ादी के लिए मौत को गले लगा लिया । रायपुर की ही ब्रिटिश फ़ौजी छावनी में सशस्त्र  विद्रोह का परचम लहराने वाले वीर हनुमान सिंह और उनके 17 साथी सैनिक 22 दिसम्बर 1858 को  मौत की सजा मिली और उन्होंने आज़ादी के आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दे दी । महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद ने अपने बाल्यकाल के दो वर्ष रायपुर में गुजारे।  उनके जीवन दर्शन को जन -जन तक पहुँचाने वाले महान दार्शनिक स्वामी आत्मानन्द की जन्मस्थली होने का गौरव भी छत्तीसगढ़ को प्राप्त है।  यह धरती 'अरपा ,पैरी के धार -महानदी हे अपार ' जैसे लोकप्रिय गीत के रचनाकार स्वर्गीय डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की भी यह जन्म भूमि और कर्मभूमि रही है । उनके इस गीत को छत्तीसगढ़ सरकार ने 'राज्य गीत' घोषित किया है ।
     स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार , वामन बलिराम लाखे , डॉ. खूबचन्द बघेल , पण्डित रविशंकर शुक्ल , त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह , हरि ठाकुर ,सुधीर मुखर्जी और केयूर भूषण जैसे अनेक  दिग्गज सेनानियों ने यहाँ आज़ादी के आंदोलन का नेतृत्व किया । अपने गहन अध्ययन से युवा अवस्था में हिन्दी ,बांग्ला , मराठी और अंग्रेजी सहित देश और दुनिया की अठारह भाषाओं के ज्ञाता के रूप में मशहूर हरिनाथ डे मात्र 34 वर्ष की उम्र में संसार से चले गए ,जिनका जन्म 12 अगस्त 1877 को बंगाल में हुआ ,लेकिन उनकी प्राथमिक और मिडिल स्कूल की शिक्षा छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुई थी । छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार पण्डित माधवराव सप्रे का जन्म ज़रुर 19 जून 1871 को  वर्तमान मध्यप्रदेश के ग्राम पथरिया (जिला-दमोह )में हुआ ,लेकिन उनकी प्रारंभिक शिक्षा छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और हाईस्कूल की शिक्षा   रायपुर में हुई । इसी रायपुर शहर के गवर्नमेंट स्कूल यानी वर्तमान में प्रोफेसर जे.एन.पाण्डेय शासकीय बहुउद्देश्यीय हायर सेकेंडरी स्कूल से उन्होंने 1890 में मेट्रिक पास किया और आगे की पढ़ाई के लिए जबलपुर चले गए ,लेकिन वर्ष 1900 में उन्होंने अपने साथी रामराव चिंचोलकर के साथ मिलकर पेण्ड्रा से छत्तीसगढ़ की प्रथम मासिक पत्रिका 'छत्तीसगढ़ मित्र'  का सम्पादन शुरू किया ,जिसके प्रकाशक थे पण्डित वामन बलिराम लाखे । सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और देश के उपराष्ट्रपति रह चुके न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्लाह की प्रारंभिक शिक्षा भी रायपुर के इसी गवर्नमेंट स्कूल में हुई थी । यह महानदी के पानी और उसकी लहरों का स्पर्श कर बहती हवाओं का ही चमत्कार है कि  इसके  स्नेहसिक्त आँचल ने अनेक संस्कृतियों को और असंख्य प्रतिभाओं को पुष्पित और पल्लवित किया ।  सचमुच अपरम्पार है महानदी की महिमा ।
    -स्वराज करुण

Thursday, October 3, 2019

(कविता ) जड़ें तलाश रहीं अपनी ज़मीन !

         
                       

    -स्वराज करुण 
सुबह और शाम ,
रात और दिन ,
बेहद बेचैन होकर
जड़ें तलाश रही अपनी ज़मीन   !
धीरे -धीरे कटकर
जड़ों से दूर होती
जा रही अपनी माटी !
आखिर कौन चीर रहा
हरे -भरे पहाड़ों  की छाती ?
खबर आयी है कि
जल्द आने वाला है
तरक्की का कोई
तेज रफ़्तार तूफ़ान ,
जिसके खौफ़नाक  झोंके से
उजड़ कर एक दिन
उड़ जाएंगे परिन्दे
मिट जाएंगे पर्वत ,
सूख जाएगी
संवेदनाओं की नदी ,
सूख जाएंगे सुनहरे ख्वाब
सूख जाएंगे भावनाओं के तालाब ,
रह जाएंगे सिर्फ
जड़ों से  कटे हुए पेड़ ,
जड़ों से कटे हुए इन्सान !
जड़ विहीन धरती से क्या
कहीं नज़र भी आएगा
कोई नीला आसमान ?
        -- स्वराज करुण

Wednesday, October 2, 2019

गाँधीजी से एक मुलाकात : अपने हत्यारे को मैं धन्यवाद देना चाहता हूँ !

                                   - स्वराज करुण 
 बीती रात  महात्मा गाँधी  मेरे घर आए । मैंने उनका स्वागत करते हुए कहा - हे राष्ट्रपिता !मेरा सौभाग्य है कि आपकी चरण धूलि से मेरा घर पवित्र हुआ । आप इसी तरह बीच -बीच में कुछ समय निकाल कर भारत भ्रमण पर आ जाया करें ।  मुझे आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा - " कृपा करके मुझे राष्ट्रपिता कहकर शर्मिंदा मत करो ।  राष्ट्र के बेटे -बेटियों को अब मेरी परवाह कहाँ ? आज़ादी मिलते ही इस धरती की संतानों ने  एक -दूजे के ख़ून के प्यासे बनकर और अपने ही राष्ट्र को बेरहमी से दो टुकड़ों में काटकर अखण्ड भारत के सपने को धूल में मिला दिया ! "
   गाँधीजी बोले -"  बेटा स्वराज करुण ! अब इस देश में आकर मैं करूंगा भी क्या ? अच्छा हुआ जो मेरी हत्या कर दी गयी  ,वरना हर तरफ गुण्डे -मवालियों , हत्यारों ,लुटेरों, लफंगों , बलात्कारियों और  शराबियों   की बढ़ती खौफनाक भीड़  और  बेतहाशा बढ़ती बेरहम अमीरी के इस भयानक मंजर में  आज  मेरे लिए तनावग्रस्त होकर आत्महत्या   का  रास्ता ही  मेरे लिए बाकी रह जाता ! इसलिए मैं अपने उस हत्यारे को धन्यवाद देना चाहता हूँ ,जिसने धरती पर मेरी आँखें हमेशा के लिए बन्द करवा दी ,वरना इस देश में आज का यह भयानक माहौल मुझे खुदकुशी के लिए मज़बूर कर देता । "
     अपने चश्मे पर जमी धूल की हल्की-सी परत को खादी की धोती के कोने से पोछते हुए उन्होंने कहा-" सुनो ,स्वराज करुण  ! जिस देश में सड़कों के किनारे भोजनालयों के बजाय मदिरालय खुले हुए हों , पाठशालाओं की जगह मधुशालाओं की संख्या बढ़ रही हो,  मेरी  तस्वीरों वाले सरकारी  नोटों से रसूखदार बने लोग उन नोटों के जरिए धड़ल्ले से के किसम -किसम के अनैतिक कारोबार में लगे हों , जहाँ सुमधुर स्वदेशी भाषाओं के अलंकार की  जगह विदेशी भाषा अंग्रेजी और अंग्रेजियत के अहंकार का बोलबाला हो ,  जिस देश में दूध के अमृतरस की जगह दारू की नदियाँ बह रही हों , खेतों में अनाज की जगह लोहे -लक्कड़ के कारखाने खुल रहे हों  ,वहाँ भला किसी को मेरी क्या ज़रूरत ?
     वो कह रहे थे - " यार स्वराज करुण ! जिस देश में लोग मन्दिर - मस्ज़िद के नाम पर मुकदमेबाजी से लेकर व्यर्थ की हिंसक बहसबाजी करते हुए  मरने - मारने पर उतारू हों ,  जहाँ गौमाताओं को और गोवंश के निरीह दुधारू  पशुओं को  पौष्टिक चारे के बजाय प्लास्टिक जैसा ज़हर खाने को विवश किया जा रहा हो , जहाँ बीमारियों का इलाज करवाने के लिए गरीबों को अपना घर -आँगन तक बेचने के लिए बाध्य होना पड़ रहा हो ,उस देश को अब मेरी जरुरत ही कहाँ रह गयी है ?  इसलिए  अपने जन्मदिन पर   2 अक्टूबर को मैं  अपने उस हत्यारे को धन्यवाद देना चाहूंगा ,जिसने मेरी आँखें हमेशा के लिए बन्द करवा दी और  मुझे ऐसे डरावने मंजरों को देखने से बचा लिया । अच्छा ,स्वराज करुण ! अब मैं चलता हूँ !"
    नींद खुली तो मैंने देखा - गाँधीजी तो मेरे घर से जा चुके थे ,लेकिन आस-पास ही नहीं , दूर -दूर तक भी  वैसा ही माहौल था  जिसका जिक्र उन्होंने स्वप्निल बातचीत के दौरान मुझसे किया था । मैं सोच रहा था - वह आज अगर हमारे बीच होते तो 150 साल के हो गए होते ,लेकिन उवास्तव में उन्हें अपनी मौत के लिए किसी सिरफ़िरे हत्यारे की जरूरत नहीं होती ।आज  के दौर में अपने और  हमारे  आस -पास का माहौल देखकर वह  खुद फाँसी लगाकर आत्महत्या कर चुके होते । निहत्थे गाँधी की किस्मत में किसी हथियारधारक  हत्यारे के हाथों मरना लिखा हुआ था ।
        -स्वराज करुण

Tuesday, October 1, 2019

(आलेख ) देश को मदिरालय चाहिए या भोजनालय ,मधुशाला चाहिए या पाठशाला ?

                              - स्वराज करुण 
   हर साल जब हम दो अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी  की जयंती मनाते हैं तो मद्य - निषेध या शराबबन्दी को लेकर उनके  प्रेरक विचारों और अथक प्रयासों की याद स्वाभाविक रूप से आ ही जाती है । उन्होंने एक आज़ाद भारत के साथ एक नशामुक्त भारत का भी ख़्वाब देखा था । उनका यह सपना कैसे पूरा हो ,इस पर हम सबको गंभीरता से विचार करना चाहिए । जब  उनके आदर्श विचारों के अनुरूप स्वच्छ भारत अभियान चलाकर देश को गन्दगी से मुक्त करने की कोशिश हो सकती है , जब  सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्ति का  राष्ट्रीय अभियान शुरू किया जा सकता है ,  तो उनकी 150 वीं जयन्ती पर पूर्ण शराबबन्दी का राष्ट्रीय अभियान भी क्यों नहीं चल सकता ? 
   दुर्भाग्य से हमारे देश में  आजकल दूध -दही की दुकानों से ज्यादा ग्राहकों की भीड़ शराब की दुकानों में उमड़ती नज़र आती है । आम तौर पर जिसे हम विदेशी शराब कहते हैं ,वो भी देशी शराब की तरह हमारे ही देश में बनती है । खैर , वैसे भी शराब चाहे विदेशी हो या स्वदेशी ,वैध हो या अवैध , किसी भी दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए लाभदायक तो हो नहीं सकती ।  इसके बावज़ूद दोनों तरह की शराब के प्रति  स्वदेशी ग्राहकों में दीवानगी की हद से भी ज़्यादा आकर्षण बढ़ रहा है ,  जो वास्तव में देश के  भविष्य के लिए घातक है ।    किसी भी तरह के अधिकृत या अनाधिकृत  आंकड़ों पर न भी जाएं तो भी मदिरालयों में बढ़ता शराबियों का सैलाब हमें  साफ नज़र आता है। ऐसे में हमें इस सवाल का जवाब ढूंढना ही पड़ेगा कि आख़िर हम अपनी वर्तमान और भावी पीढ़ी को और देश के भविष्य को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ? हमें इस बात पर भी विचार करना होगा कि देश और देशवासियों के लिए   मदिरालय ज़रूरी हैं  या  भोजनालय ?   लोग मदिरालयों में पैसे देकर बीमारियों की बोतल  ख़रीदते हैं ,जबकि भोजनालय चाहे जैसे भी हों , वहाँ मिलने वाले  कम से कम दो वक्त के भोजन की थाली मनुष्य के पेट की आग बुझाकर उसे स्वस्थ और ऊर्जावान बनाती है । हमें यह भी तय करना होगा कि देश को आज नशेबाज पीढ़ी बनाने के लिए मधुशालाओं की ज़रूरत है या संस्कारवान और सुशिक्षित पीढ़ियों के निर्माण के लिए  पाठशालाओं की ?

    गाँधीजी ने  शराब के गंभीर हानिकारक परिणामों  से  चिन्तित होते हुए अपनी पुस्तक 'मेरे सपनों का भारत ' में  लिखा है - 

     " यदि मुझे एक घंटे के लिए भारत का डिक्टेटर (तानाशाह ) बना दिया जाए ,तो मेरा पहला काम यह होगा कि शराब की दुकानों को हमेशा के लिए बंद करवा दिया जाए और कारखानों के मालिकों को अपने मजदूरों के लिए ऐसी मनुष्योचित परिस्थितियों का  निर्माण करने और उनके हित में ऐसे उपाहार -गृह और मनोरंजन-गृह खोलने के लिए मजबूर किया जाए ,जहाँ मजदूरों को ताजगी देने वाले निर्दोष शीतल-पेय और उतना ही निर्दोष मनोरंजन मिल सके । " गाँधीजी का ये भी कहना था कि हमें  ऊपर से ठीक दिखायी देने वाली इस दलील के भुलावे में नहीं आना चाहिए कि शराब-बंदी जोर-जबरदस्ती के आधार पर नहीं होनी चाहिए और जो लोग शराब पीना चाहते हैं ,उन्हें उसकी सुविधाएं मिलनी ही चाहिए । यह राज्य का कोई कर्त्तव्य नहीं है कि वह अपनी प्रजा को कुटेवों के लिए अपनी ओर से सुविधाएं दे.हम वेश्यालयों को अपना व्यापार  चलाने के लिए अनुमति-पत्र नहीं देते .इसी तरह हम चोरों को अपनी चोरी की प्रवृत्ति पूरा करने की सुविधाएं नहीं देते ।"  

   उन्होंने  'मेरे सपनों का भारत ' में आगे यह भी लिखा है -- " शराब की आदत मनुष्य की आत्मा का नाश कर देती है और उसे धीरे-धीरे पशु बना डालती है.वह पत्नी , माँ और बहन में भेद करना भूल जाता है.शराब और अन्य मादक द्रव्यों से होने वाली हानि कई अंशों में मलेरिया आदि बीमारियों से होने वाली हानि की अपेक्षा असंख्य गुनी  ज्यादा है .कारण,बीमारियों से तो  केवल शरीर को हानि पहुँचती है ,जबकि शराब आदि से शरीर और आत्मा ,दोनों का नाश हो जाता है । "   
       
   इस वर्ष जब हम गाँधीजी की 150 वीं जयन्ती मना रहे हैं ,तो  ऐसे में शराब की सामाजिक बुराई  के ख़िलाफ़ जन जागरण की दृष्टि से उनके ये अनमोल विचार आज और भी ज़्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं।  इसमें  दो राय नहीं कि शारीरिक हानि के साथ -साथ सामाजिक प्रदूषण फैलाने में भी शराब और शराबियों का बहुत बड़ा आपराधिक योगदान होता है । आम तौर पर शराबखोरी को जायज ठहराने के लिए  लोग 'वैध ' और 'अवैध ' मदिरा में फ़र्क करते हैं ,जबकि  जो चीज मनुष्य के लिए प्राणघातक है ,पारिवारिक - सामाजिक -सांस्कृतिक पर्यावरण के लिए नुकसान दायक है , उसे वैध -अवैध के रूप में अलग -अलग परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए । ज़हर तो ज़हर होता है  । उसे चाहे 'वैध 'तरीके से पिया जाए या ' अवैध ' तरीके से ,  दोनों ही स्थितियों में वह प्राणघातक होता है ।उसमें  'कानूनी ज़हर' और 'गैरकानूनी ज़हर '  कहकर  भेद नहीं किया जा सकता। यह  गोवंश के रक्षक कृष्ण -कन्हैय्या  का देश है ,जहाँ उनके ज़माने में दूध की नदियाँ बहा करती थीं । यानी दूध -दही का भरपूर उत्पादन होता था ।  लोग उसे पीकर स्वस्थ और बलवान हुआ करते थे ।

   वैसे  आज भी देखा जाए तो हमारे यहाँ दूध -दही की कहीं  कोई कमी नहीं है ,लेकिन भोगवादी और बाज़ारवादी आधुनिक जीवन शैली के आकर्षण में बंधकर भारतीय मनुष्य तेजी से शराबखोरी की घिनौनी आदत का शिकार बन रहा है । भारतीय समाज में कुछ एक अपवादों को छोड़कर देखें तो आज  शराबखोरी को प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जा रहा है ।  इसके फलस्वरूप सामाजिक मर्यादाएं भी टूटती जा रही हैं । आलीशान सितारा होटलों में तो लायसेंसी बीयर-बार चलते ही हैं । इनके अलावा  हराम की कमाई से  बने अमीरों और नवधनाढ्य लोगों के महलनुमा घरों में भी उनके प्राइवेट  ' मिनी बार ' बने हुए हैं,जहाँ परिवार के सदस्य  आधुनिकता के नाम पर  खुलकर मदिरा पान करते हैं । कुछ रसूखदार लोग अपने विशाल बाग -बंगलों में अपना रुतबा दिखाने के लिए शराब -पार्टियों का भी आयोजन करते हैं ।  दूसरी तरफ  चाहे नौकरीपेशा मध्यवर्गीय वेतनभोगी कर्मचारी हो या दिहाड़ी मज़दूर , समाज के हर वर्ग के अधिकांश लोग शराब की दुकानों में जाकर अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा मदिराखोरी में नष्ट कर रहे हैं ,जबकि जितना रुपया वह शराब खरीदने में ख़र्च करते हैं ,उससे कहीं कम कीमत में वह स्वयं के लिए और अपने परिवार के लिए पर्याप्त मात्रा में दूध -दही ,घी जैसे स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ ख़रीद सकते हैं , स्वादिष्ट और पौष्टिक सस्ते फल ख़रीद सकते हैं । लेकिन शराबियों को अपने घर -परिवार या बाल -बच्चों की चिन्ता कहाँ होती है ? 
      हिन्दी और उर्दू के प्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचंद की एक मशहूर कहानी 'कफ़न' अगर आपने पढ़ी हो तो उसमें बाप -बेटे घीसू और माधव के चरित्र को याद कीजिए ,जो घर में प्रसव वेदना से कराहती बहू के इलाज के नाम पर गाँव वालों से चंदा इकठ्ठा करते हैं और उन पैसों को अपनी शराबखोरी में उड़ा देते हैं । तब तक उनकी झोपड़ी में बहू तड़फ -तड़फ कर दम तोड़ देती है । कालजयी कथाकार द्वारा यह कहानी लगभग नौ दशक पहले लिखी गयी थी । इससे पता चलता है कि यह समस्या बहुत पुरानी है । शराब का नशा जहाँ गरीबों को और भी गरीब बना देता है और उनमें अच्छे -बुरे की समझ को नष्ट कर देता है ,वहीं यह पैसे वालों को भी धीरे -धीरे बर्बाद करके ख़ाक में मिला देता है । मुझे अपने बचपन की स्कूली किताब  'बालभारती ' में पढ़ी आनन्दराव जमींदार की कहानी की धुँधली -सी याद आ रही है । यह शराब की लत के कारण आनन्दराव की आर्थिक तबाही की एक मार्मिक कहानी है । लेखक का नाम तो  याद नहीं आ रहा ,लेकिन उन्होंने कहानी के माध्यम से समाज को इस नशे से दूर रहने की नसीहत दी है ।  वर्ष 1970 में आयी हिन्दी फीचर फिल्म ' गोपी " में राजेन्द्र कृष्ण का लिखा ,कल्याणजीआनन्द जी द्वारा संगीतबद्ध एक गाना "हे रामचन्द्र कह गए सिया से ,  ऐसा कलजुग आएगा "  महेन्द्र कपूर की आवाज़ में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था । इस गाने की दो पंक्तियाँ इस प्रकार हैं  - 

"मन्दिर सूना -सूना होगा 
भरी रहेगी मधुशाला ,
पिता के संग -संग भरी सभा में 
नाचेगी घर की बाला ।" 
  गाने की ये पंक्तियाँ  शराब के कारण समाज में पनप रही   विकृतियों के साथ हमारे नैतिक और  सांस्कृतिक मूल्यों में तेजी से आ रही गिरावट की ओर भी विचारवान और विवेकवान लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं ।  इन दो लाइनों में गीतकार ने यह भी संकेत दिया है कि वर्तमान भारतीय समाज में  मन्दिरों पर मदिरालय ज्यादा भारी पड़ रहे हैं । यह सचमुच एक दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है । लगता है कि पहले की तुलना में यह समस्या आज  और भी ज़्यादा बढ़ गयी है । भारत में शराबखोरी एक गंभीर सामाजिक बीमारी का रूप धारण करती जा रही
    यह भी एक बड़ी विडम्बना है कि   पहले की तुलना में आज देश में शराबखोरी की  समस्या  और भी ज़्यादा बढ़ गयी है । यह एक गंभीर सामाजिक बीमारी का विकराल रूप धारण करती जा रही है । क्या शहर और क्या गाँव , देश का कोई भी इलाका इस बीमारी से अछूता नहीं रह गया है ।इसकी वज़ह से समाज में हिंसा ,हत्या , आत्महत्या , बलात्कार जैसे घिनौनी घटनाओं में वृद्धि हो रही है । राह चलती माताओं -बहनों ,बहु -बेटियों से छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ रही हैं ।शराब पीकर वाहन चलाने वाले जहाँ स्वयं गंभीर सड़क हादसों का शिकार होकर प्राण गंवा रहे हैं ,वहीं उनके लड़खड़ाते वाहनों की चपेट में आकर दूसरे भी आकस्मिक रूप से मौत का शिकार बन रहे हैं । सड़कों के किनारे संचालित शराब दुकानों में कई बार नशेड़ियों के बेतरतीब जमावड़े की वज़ह से सार्वजनिक यातायात भी बुरी तरह से अस्त -व्यस्त हो जाता है । समस्या के स्थायी समाधान के लिए उसकी जड़ों को नष्ट करना जरूरी है । भारत को अगर शराबमुक्त राष्ट्र बनाना है तो यहाँ देशी -विदेशी हर तरह की मदिरा के उत्पादन पर शत -प्रतिशत प्रतिबंध लगा देना चाहिए । वैसे पूर्ण शराबबन्दी की अवधारणा से  असहमति रखने वालों में एक भ्रामक धारणा यह भी बनी हुई है कि यह असंभव है ,क्योंकि शराब के कारोबार से सरकारी ख़ज़ाने में राजस्व बढ़ता है ,जबकि सच तो यह है कि शराब के कारण हृदयरोग ,  लीवर  , किडनी और कैन्सर की घातक बीमारियों के शिकार लोगों और दुर्घटनाग्रस्त नशेड़ियों का इलाज करवाने और शराबजनित अपराधों की रोकथाम में सरकार को उससे कहीं ज्यादा धन अपने ख़ज़ाने से खर्च करना पड़ता है।   शराब के नशे की आदत के शिकार नागरिक निठल्लेपन की वज़ह से परिवार और समाज पर बोझ बन जाते हैं और अपने देश के विकास में भी कोई योगदान नहीं दे पाते
    सिर्फ़ मदिरा की बोतलों पर  'शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ' छापकर वैधानिक चेतावनी की खानापूर्ति कर देना पर्याप्त नहीं है ।इससे यह समस्या हल नहीं होने वाली । इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर ईमानदारी से  व्यापक जन जागरण अभियान चलाने की ज़रूरत है । यह अकेले किसी एक सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं ,बल्कि समाज के उन जागरूक नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है जो स्वयं इस नशे से दूर रहते हैं । भले ही उनकी संख्या कुछ कम होगी ,लेकिन अगर वो चाहें तो संगठित होकर इस अभियान में लेखकों ,कलाकारों डॉक्टरों आदि को जोड़ सकते हैं । नशे के दुष्परिणामों के बारे में डॉक्टरों के व्याख्यान आयोजित कर सकते हैं । मीडिया में उनके लेख और इंटरव्यू प्रकाशित और प्रसारित करवा सकते हैं ।नुक्कड़ नाटक ,गीत -संगीत के माध्यम से भी लोगों में जागरूकता  बढ़ाने की कोशिश की जा सकती है । अगर शराब की दुकानें खुली हैं तो खुली रहने दें। कोई किसी को जोर- जबरदस्ती तो उन दुकानों की ओर नहीं ढकेलता और ज़बरन शराब पीने के लिए मजबूर नहीं करता  । मद्यपान की बुरी आदत लोगों को उधर खींच लेती है । आदर्श स्थिति तो यह होगी कि लोग मदिरालयों की तरफ जाएं  ही मत और शराब पियें  ही मत ! फिर देखिए , कैसे बन्द नहीं होगा मदिरा का कारोबार ! लेकिन इसके लिए सामाजिक -चेतना का विस्तार आवश्यक है । 

     -स्वराज करुण 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और ब्लॉगर हैं )

Sunday, September 29, 2019

(आलेख ) विदेशी मदिरा के स्वदेशी ग्राहक !

                         - स्वराज करुण 
भारत में आजकल दूध -दही की दुकानों से ज्यादा भीड़ शराब की दुकानों में उमड़ती नज़र आती है ।वह भी विदेशी शराब की दुकानों में !  अब 'स्वदेशी शराब ' को कोई नहीं पूछता !  खैर , वैसे भी शराब चाहे विदेशी हो या स्वदेशी ,वैध हो या अवैध , किसी भी दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए लाभदायक तो है नहीं ।
   शारीरिक हानि के साथ -साथ सामाजिक प्रदूषण फैलाने में भी शराब और शराबियों का बहुत बड़ा आपराधिक योगदान होता है । आम तौर पर शराबखोरी को जायज ठहराने के लिए  लोग 'वैध ' और 'अवैध ' मदिरा में फ़र्क करते हैं ,जबकि  जो चीज मनुष्य के लिए प्राणघातक है ,पारिवारिक - सामाजिक -सांस्कृतिक पर्यावरण के लिए नुकसान दायक है , उसे वैध -अवैध के रूप में अलग -अलग परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए । ज़हर तो ज़हर होता है  । उसे चाहे 'वैध 'तरीके से पिया जाए या ' अवैध ' तरीके से ,  दोनों ही स्थितियों में वह प्राणघातक होता है ।उसमें  'कानूनी ज़हर' और 'गैरकानूनी ज़हर '  कहकर  भेद नहीं किया जा सकता।  (स्वराज करुण )यह गोवंश के रक्षक कृष्ण -कन्हैय्या  का देश है ,जहाँ उनके ज़माने में दूध की नदियाँ बहा करती थीं । यानी दूध -दही का भरपूर उत्पादन होता था ।  लोग उसे पीकर स्वस्थ और बलवान हुआ करते थे ।
   वैसे  आज भी देखा जाए तो हमारे यहाँ दूध -दही की कोई कमी नहीं है ,लेकिन भोगवादी और बाज़ारवादी आधुनिक जीवन शैली के आकर्षण में बंधकर भारतीय मनुष्य तेजी से शराबखोरी की घिनौनी आदत का शिकार बन रहा है । (स्वराज करुण )हमारे भारतीय समाज में कुछ एक अपवादों को छोड़कर देखें तो आज  शराबखोरी को प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जा रहा है ।  हराम की कमाई से  बने अमीरों और नवधनाढ्य लोगों के घरों में उनके प्राइवेट  ' मिनी बार ' बने हुए हैं,जहाँ परिवार के सदस्य भी आधुनिकता के नाम पर  खुलकर मदिरा पान करते हैं । (स्वराज करुण) दूसरी तरफ  चाहे नौकरीपेशा वेतनभोगी कर्मचारी हो या दिहाड़ी मज़दूर , समाज के हर वर्ग के अधिकांश लोग अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा मदिराखोरी में नष्ट कर रहे हैं ,जबकि जितना रुपया वह शराब खरीदने में ख़र्च करते हैं ,उससे कहीं कम कीमत में वह स्वयं के लिए और परिवार के लिए पर्याप्त मात्रा में दूध -दही ,घी जैसे स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ ख़रीद सकते हैं । लेकिन शराबियों को अपने घर -परिवार या बालबच्चों की चिन्ता कहाँ होती है ।
    हिन्दी -उर्दू के प्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचंद की एक मशहूर कहानी 'कफ़न' अगर आपने पढ़ी हो तो उसमें बाप -बेटे घीसू और माधव के चरित्र को याद कीजिए ,जो घर में प्रसव वेदना से कराहती बहू के इलाज के नाम पर गाँव वालों से चंदा इकठ्ठा करते हैं और उन पैसों को अपनी शराबखोरी में उड़ा देते हैं । तब तक उनकी झोपड़ी में बहू तड़फ -तड़फ कर दम तोड़ देती है । कालजयी कथाकार द्वारा यह कहानी लगभग नौ दशक पहले लिखी गयी थी । इससे पता चलता है कि यह समस्या बहुत पुरानी है । शराब का नशा जहाँ गरीबों को और भी गरीब बना देता है और उनमें अच्छे -बुरे की समझ को नष्ट कर देता है ,वहीं यह पैसे वालों को भी धीरे -धीरे बर्बाद करके ख़ाक में मिला देता है । मुझे अपने बचपन की स्कूली किताब  'बालभारती ' में पढ़ी आनन्दराव जमींदार की कहानी की धुँधली -सी याद आ रही है । यह शराब की लत के कारण आनन्दराव की आर्थिक तबाही की एक मार्मिक कहानी है । लेखक का नाम याद नहीं ,लेकिन उन्होंने कहानी के माध्यम से समाज को इस नशे से दूर रहने की नसीहत दी है ।
          लगता है कि पहले की तुलना में यह समस्या आज  और भी ज़्यादा बढ़ गयी है । भारत में शराबखोरी एक गंभीर सामाजिक बीमारी का रूप धारण करती जा रही है । क्या शहर और क्या गाँव , देश का कोई भी इलाका इस बीमारी से अछूता नहीं रह गया है ।इसकी वज़ह से समाज में हिंसा ,हत्या , आत्महत्या , बलात्कार जैसे घिनौनी घटनाओं में वृद्धि हो रही है । राह चलती माताओं -बहनों ,बहु -बेटियों से छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ रही हैं ।शराब पीकर वाहन चलाने वाले जहाँ स्वयं गंभीर सड़क हादसों का शिकार होकर प्राण गंवा रहे हैं ,वहीं उनके लड़खड़ाते वाहनों की चपेट में आकर दूसरे भी आकस्मिक रूप से मौत का शिकार बन रहे हैं ।(स्वराज करुण) शराबखोरी  एक राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है । इसके निराकरण के लिए पूरे देश में हर प्रकार की शराब के उत्पादन और विक्रय पर ठोस प्रतिबंध लगाना समय की मांग है ।शराब और शराबखोरी को महिमामण्डित करने वाले विज्ञापनों और 'झूम बराबर झूम शराबी' या ' नशा शराब में होता तो नाचती बोतल' जैसे  फिल्मी गानों पर  भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ,जो किसी न किसी रूप में लोगों को शराब पीने के लिए उकसाते हुए प्रतीत होते हैं ।
     सिर्फ़ मदिरा की बोतलों पर  'शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ' छापकर वैधानिक चेतावनी की खानापूर्ति कर देना पर्याप्त नहीं है ।इससे यह समस्या हल नहीं होने वाली । इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर ईमानदारी से  व्यापक जन जागरण अभियान चलाने की ज़रूरत है । यह अकेले किसी एक सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं ,बल्कि समाज के उन जागरूक नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है जो स्वयं इस नशे से दूर रहते हैं । भले ही उनकी संख्या कुछ कम होगी ,लेकिन अगर वो चाहें तो इस अभियान में लेखकों ,कलाकारों डॉक्टरों आदि को जोड़ सकते हैं ।   नशे के दुष्परिणामों के बारे में डॉक्टरों के व्याख्यान आयोजित कर सकते हैं । मीडिया में उनके लेख और इंटरव्यू प्रकाशित और प्रसारित करवा सकते हैं ।नुक्कड़ नाटक ,गीत -संगीत के माध्यम से भी लोगों में जागरूकता  बढ़ाने की कोशिश की जा सकती है । अगर शराब की दुकानें खुली हैं तो खुली रहने दें। कोई किसी को जोर-जबरदस्ती तो उन दुकानों की ओर नहीं ढकेलता और ज़बरन शराब ख़रीदने और पीने के लिए मजबूर नहीं करता  । लोग  उन मदिरालयों की तरफ जाएं  ही मत और शराब खरीदें  ही मत और पियें ही मत । फिर देखिए , कैसे बन्द नहीं होगा मदिरा का कारोबार । लेकिन इसके लिए सामाजिक -चेतना का विस्तार आवश्यक है ।
  आज से मात्र डेढ़ -दो दशक पहले जब योग गुरु बाबा रामदेव ने अपने योग शिविरों में पेप्सी और कोकाकोला जैसे कोल्ड -ड्रिंक्स  ' के विषैले परिणामों को  टॉयलेट क्लिनर  ' के नाम से प्रचारित किया और 'ठण्डा मतलब टॉयलेट क्लिनर का  'नारा बुलन्द किया तो देखते ही देखते करोड़ों भारतीयों ने ज़हरीले मीठे पानी  की इन बोतलों को खरीदना बन्द कर दिया और कुछ ही महीनों में इनकी  बिक्री बुरी तरह से घट गयी । उन दिनों कोई इक्का -दुक्का इन्हें खरीदता भी था तो लोग उनको आश्चर्य से देखते थे । आज भी दुकानों में इन  शीतल पेयों  की ग्राहकी बढ़ नहीं पायी है। शराब का असर तो किसी भी ब्रांडेड विदेशी शीतल पेय के मुकाबले अत्यधिक तेज़ाबी होता है ।  हमें बाबा रामदेव जैसी कोई शख्सियत चाहिए जो जनता को दिलचस्प तरीके से यह समझा सके कि शराब चाहे देशी हो या विदेशी , आख़िर वह भी एक प्रकार का "टॉयलेट क्लिनर ' ही तो है !
        -स्वराज करुण