Friday, September 4, 2020

मानस मर्मज्ञ डॉ. बलदेवप्रसाद मिश्र

                     आलेख : स्वराज करुण 

मानस मर्मज्ञ और छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय डॉ. बलदेवप्रसाद मिश्र को आज उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र नमन । उनका जन्म 12 सितम्बर 1898 को राजनांदगांव में हुआ था। अपने जन्म स्थान में ही लगभग 77 वर्ष की अपनी गरिमापूर्ण जीवन यात्रा को उन्होंने 4 सितम्बर 1975 को चिर विश्राम दे दिया ।

उन्हें 'तुलसी दर्शन ' के अपने  इस शोध प्रबंध पर वर्ष 1939 में  नागपुर विश्वविद्यालय ने डी. लिट्  की उपाधि प्रदान की । डॉ. मिश्र ने अपने जीवन काल में लगभग 100 किताबें लिखीं ।  भर्तृहरि के 'श्रृंगार शतक ', और 'वैराग्य शतक ' का  उनके द्वारा किया गया भावानुवाद इन्हीं शीर्षकों से वर्ष 1928 में प्रकाशित हुआ। महाकाव्य 'कौशल किशोर ' का प्रकाशन वर्ष 1934 में ,मुक्तक संग्रह 'जीवन संगीत '1940 में और एक और मुक्तक संग्रह 'साकेत संत' का प्रकाशन वर्ष 1946 में हुआ।डॉ. मिश्र द्वारा रचित ग्रंथ ' मानस के चार प्रसंग ' वर्ष 1955 में छपा ,जबकि  'गाँधी गाथा' का प्रकाशन महात्मा गाँधी के जन्मशती वर्ष 1969 में हुआ। उनके लिखे नाटकों में  'शंकर दिग्विजय ' भी उल्लेखनीय है। उनकी रचनाओं और पुस्तकों की एक लम्बी सूची है ।

                 


         

डॉ. मिश्र की हाई स्कूल तक शिक्षा राजनांदगांव में हुई। उन्होंने नागपुर के हिस्लाप कॉलेज से वर्ष 1918 में बी.ए.और  वर्ष 1920 में मनोविज्ञान में एम.ए. तक शिक्षा हासिल की। नागपुर से ही उन्होंने वकालत की डिग्री ली।कुछ समय तक रायपुर में वकालत करने के बाद वे रायगढ़ रियासत के राजा चक्रधर सिंह के आमंत्रण पर वहाँ चले गए। वर्ष 1923 से 1940 तक उन्होंने रायगढ़ रियासत के न्यायाधीश ,नायब दीवान और दीवान के पद पर अपनी सेवाएं दी। इसी दरम्यान वे रायगढ़ और खरसिया नगरपालिकाओं के अध्यक्ष भी रहे। बाद में राजनांदगांव नगरपालिका के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।उन्होंने कुछ समय तक रायपुर नगरपालिका के उपाध्यक्ष के रूप में भी जन सेवा के दायित्वों का बड़ी कुशलता से निर्वाह किया। 

     स्वर्गीय डॉ. बलदेवप्रसाद मिश्र, नागपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के मानसेवी अध्यक्ष , खैरागढ़ स्थित इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के उपकुलपति , हैदराबाद तथा बड़ोदा विश्व विद्यालयों के आमंत्रित प्राध्यापक और मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके थे। छत्तीसगढ़ के  राजनांदगांव शहर को अनेक महान साहित्यिक विभूतियों की कर्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। डॉ. बलदेवप्रसाद प्रसाद मिश्र ,डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी  और गजानन माधव मुक्तिबोध भी इन्हीं महान साहित्यिक रत्नों में शामिल थे। इन तीनो कालजयी साहित्यकारों की स्मृतियों को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा वहाँ त्रिवेणी संग्रहालय परिसर बनवाया गया है। 

आलेख : स्वराज करुण

Thursday, September 3, 2020

(आलेख ) मेड़ों पर खिलने लगे कांस

                       --स्वराज करुण 

भारत में आम तौर पर बरसात का मौसम चार महीने का होता है। आषाढ़ से क्वांर तक या 15जून से 15 अक्टूबर तक। इस बीच खरीफ़ के धान की हरी -भरी बालियों से भरे खेत  हरित गलीचे की तरह नज़र आते हैं। लेकिन इस बीच उन  खेतों की मेड़ों  पर अगर सफ़ेद बालों  वाले रुपहले  कांस के फूल खिलने लगें तो ऐसा माना जाता है कि वर्षा ऋतु समय से पहले ही हमसे विदा होने वाली है। कांस का खिलना शरद ऋतु के आने का संकेत होता है।  

गोस्वामी तुलसीदास जी के महाकाव्य  रामचरित मानस में भगवान श्रीराम एक स्थान पर शरद ऋतु का वर्णन करते हुए अपने अनुज लक्ष्मण से कहते हैं  -

                    बरषा बिगत सरद रितु आई। 

                     लछमन देखहु परम सुहाई॥

                      फूले कास सकल महि छाई। 

                      जनु बरषा कृत प्रगट बुढ़ाई॥1


   यानी बरसात के बीतने पर परम सुहावनी शरद ऋतु आ गयी  है और कांस के फूल सम्पूर्ण पृथ्वी पर छा गए हैं । श्वेत रंग के इन फूलों को देखकर वो कहते हैं - ऐसा लगता है  मानो वर्षा बूढ़ा गयी है ।

 खैर ,  बरसात का बुढ़ाना तो महाकवि की एक दिलचस्प कल्पना मात्र है। जलवायु परिवर्तन के इस वैश्विक संकट के नाज़ुक समय में वर्षा ऋतु इस बार भले ही समय से पहले विदाई मांग रही हो ,लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अभी कुछ दिन और रुकेगी । फिर अगले साल समय पर आकर पूरे चार महीने हमारे यहाँ मेहमान बनकर रहेगी !

(तस्वीर -आँखन देखी ,व्हाया मेरा मोबाइल कैमरा)

Saturday, August 29, 2020

भाषाओं का त्रिवेणी संगम

              (आलेख : स्वराज करुण )

भाषाओं की रंग -बिरंगी विविधताओं वाले हमारे देश में ऐसे  प्रयासों की नितांत आवश्यकता है ,जिनसे हमारी नयी पीढ़ी कम से कम तीन भाषाओं में दक्षता ज़रूर हासिल कर सके। इनमें से एक उसकी अपनी  मातृभाषा या स्थानीय भाषा हो ,दूसरी हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी और तीसरी भाषा अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा के रूप में  अंग्रेजी ।इसके अलावा भारत की सर्वाधिक पुरानी भाषा संस्कृत का ज्ञान भी आवश्यक होना चाहिए। 

     बहरहाल एक सराहनीय प्रयास के रूप में छत्तीसगढ़ राज्य शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के आंग्ल भाषा प्रशिक्षण संस्थान  की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी शब्दकोश ' को लिया जा सकता है ,जिसमें छत्तीसगढ़ी शब्दों के हिन्दी और अंग्रेजी मायने दिए गए हैं। इसे हम भाषाओं का त्रिवेणी संगम भी कह सकते हैं।

    वैसे तो 304 पृष्ठों का यह शब्दकोश हर किसी के लिए उपयोगी है ,लेकिन इसके  परिचय में बताया गया है कि इसका  निर्माण मिडिल स्कूल के बच्चों के स्तर को ध्यान में रखकर किया गया है।  इसमें छत्तीसगढ़ी क्रियात्मक शब्दों के साथ -साथ ,सब्जियों ,फलों ,पशु -पक्षियों , कीड़े -मकोड़ों सहित बैलगाड़ी के हिस्सों ,खेती -किसानी में प्रयुक्त होने वाले शब्दों , मकानों के हिस्सों ,पारिवारिक,सामाजिक रिश्ते -नातों, घरेलू सामानों ,पारम्परिक कहावतों और मुहावरों आदि का अच्छा संकलन है। देवनागरी वर्णमाला  के क्रम से छत्तीसगढ़ी शब्दों के हिन्दी अर्थ बताते हुए  उनके अंग्रेजी में वाक्य प्रयोग भी दिए गए हैं।।             


     इसी तारतम्य में छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित ' वृहत छत्तीसगढ़ी शब्दकोश ' भी उल्लेखनीय है । श्री चन्द्रकुमार चंद्राकर द्वारा संकलित इस विशाल शब्दकोश में छत्तीसगढ़ी के लगभग 40 हज़ार शब्द हैं। देवनागरी वर्णमाला के क्रमानुसार  924 पृष्ठों के इस शब्दकोश में छत्तीसगढ़ी शब्दों के हिन्दी अर्थ दिए गए हैं।  

    इसमें दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ी एक समृद्ध भाषा है और इसका अपना शब्द भण्डार ,अपना व्याकरण और अपना साहित्य है। छत्तीसगढ़ी का पहला व्याकरण वर्ष 1885 में धमतरी में लिखा गया था और इसके लेखक थे व्याकरणाचार्य हीरालाल काव्योपाध्याय । इन सब विशेषताओं को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने जहाँ छत्तीसगढ़ी को 'राजभाषा" का दर्जा दिया है , छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का गठन किया है , वहीं इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने के लिए भी वह लगातार पहल कर रही है। विधानसभा के इस वर्षाकालीन सत्र में इसके लिए मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा एक शासकीय संकल्प भी लाया गया था,जिसे सर्वसम्मति से पारित करते हुए केन्द्र सरकार से छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध किया गया है। 

     राज्य निर्माण के बीस वर्ष अगले दो महीने बाद एक नवम्बर 2020 को पूरे हो जाएंगे। राज्य बनने पर छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में भी  नये उत्साह के साथ काम होने लगा है। बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ी फिल्मों का निर्माण हुआ है।  छत्तीसगढ़ी में कहानियाँ और कविताएँ भी ख़ूब लिखी जा रही हैं। कई समाचारपत्रों द्वारा हर सप्ताह छत्तीसगढ़ी साहित्य के परिशिष्ट भी प्रकाशित किए जा रहे हैं। 

       आलेख     -स्वराज करुण

Thursday, August 27, 2020

बालक तुलेन्द्र से स्वामी आत्मानन्द बनने की एक महान यात्रा

                 आलेख : स्वराज करुण 

महान विभूतियों की जन्म भूमि और कर्मभूमि छत्तीसगढ़ के एक तेजस्वी अनमोल रत्न थे स्वामी आत्मानन्द । यह एक महान संयोग ही है कि छत्तीसगढ़ (रायपुर ) की जिस धरती पर  बालक नरेन्द्र ने अपने बचपन के दो वर्ष बिताए और आगे चलकर देश और दुनिया में महान दार्शनिक स्वामी  विवेकानंद के नाम से मशहूर हुए ,उसी छत्तीसगढ़ की धरती पर जन्मे  बालक तुलेन्द्र ने उनके जीवन दर्शन को जन -जन तक पहुँचाने के लिए स्वामी आत्मानन्द बनकर  अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।  स्वामी आत्मानन्द जी का जन्म 6 अक्टूबर 1929 को रायपुर जिले के ग्राम बरबन्दा में हुआ था। भोपाल से रायपुर लौटते समय राजनांदगांव के पास 27 अगस्त 1989 को सड़क हादसे में उनका निधन हो गया। 

  सेवाग्राम में गाँधीजी का स्नेह -सानिध्य 

स्वामी आत्मानन्द जी के  बचपन का नाम तुलेन्द्र था। पिता धनीराम जी वर्मा स्कूल शिक्षक और माता श्रीमती भाग्यवती वर्मा गृहणी थीं। धनीराम जी अपने  उच्च  शिक्षकीय प्रशिक्षण के लिए  बुनियादी प्रशिक्षण केंद्र वर्धा गए थे। परिवार को भी साथ ले गए थे। वह बालक तुलेन्द्र को साथ लेकर वर्धा स्थित महात्मा गाँधी के  सेवाग्राम आश्रम भी आते - जाते थे और वहाँ भजन संध्या में भी शामिल होते थे।  बालक तुलेन्द्र को भी  मधुर स्वरों में भजन गाते देखकर गांधीजी काफी प्रभावित हुए। तुलेन्द्र उनके स्नेहपात्र बन गए। बहरहाल , वर्धा में शिक्षकीय प्रशिक्षण पूरा करके उनके पिता धनीराम जी वर्ष 1943 में सपरिवार अपने गृह  ग्राम बरबन्दा लौट आए।  बालक तुलेन्द्र की हाईस्कूल की शिक्षा रायपुर के सेंट पॉल स्कूल में हुई। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय  से गणित में एम.एससी . तक शिक्षा प्राप्त की। उन्हें प्रथम श्रेणी के साथ प्रावीण्य सूची में भी शीर्ष स्थान प्राप्त हुआ। छात्रावास की सुविधा नहीं मिलने के कारण वह नागपुर के रामकृष्ण आश्रम में रहते थे।वहीं उन्हें रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के जीवन दर्शन के भी अध्ययन का अवसर मिला।सेवाग्राम में गाँधीजी का स्नेह और सानिध्य मिलने के  कारण तुलेन्द्र के बाल -मन पर भी उनकी सादगीपूर्ण जीवन शैली और उनके विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा ।

 आईएएस का इंटरव्यू छोड़ा : बन गए कर्मयोगी संन्यासी 

   इस बीच तुलेन्द्र ने संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा दी और उन्हें टॉप टेन की सूची में आने का गौरव मिला  । उनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस )के लिए होने ही वाला था ,लेकिन उन पर स्वामी रामकृष्ण परम हंस और विवेकानंद के विचारों का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वह मौखिक परीक्षा (इंटरव्यू )में शामिल नहीं हुए। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन आध्यत्मिक क्षेत्र के लिए  समर्पित करने और रामकृष्ण परमहंस के जीवन दर्शन को जन -जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। आगे चलकर वह एक कर्मयोगी संन्यासी बन गए।

  तुलेन्द्र से स्वामी तेज चैतन्य

 और फिर स्वामी आत्मानन्द 

   आगे चलकर वर्ष 1957 में उन्होंने रामकृष्ण मिशन के प्रमुख स्वामी शंकरानन्द जी से दीक्षा ली। उन्होंने तुलेन्द्र का नामकरण किया स्वामी तेज चैतन्य जो आगे चलकर स्वामी आत्मानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए। स्वामी तेज चैतन्य (आत्मानन्द ) ने हिमालय जाकर वहाँ के  स्वर्गाश्रम में एक वर्ष की कठिन तपस्या की और रायपुर लौटे।  चूंकि स्वामी विवेकानंद ने अपने बाल्यकाल के दो महत्वपूर्ण वर्ष रायपुर में गुजारे थे ,इसलिए उन्होंने उनसे जुड़ी स्मृतियों को चिरस्थाई बनाने के लिए रायपुर में विवेकानंद आश्रम की स्थापना की। उनके आश्रम को बेलूर मठ स्थित रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय से सम्बद्धता भी मिल गयी ।              


    स्वामी आत्मानन्द जी द्वारा स्थापित यह आश्रम छत्तीसगढ़ में रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद जी के विचारों का प्रमुख केंद्र बन गया । आश्रम में देश के अनेक प्रसिद्ध सन्त महात्माओं के प्रवचन भी होने लगे । आत्मानन्द जी ने यहाँ से 'विवेकज्योति ' नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया।  

   आदिवासी इलाके में सेवा प्रकल्पों की शुरुआत

  उन्होंने छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर संभाग के अत्यंत पिछड़े अबूझमाड़ इलाके में आदिवासियों को शिक्षा और विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का भी निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने  वर्ष 1985 में नारायणपुर में रामकृष्ण मिशन की ओर से शिक्षा ,स्वास्थ्य सुविधाओं सहित कई सेवा प्रकल्पों की बुनियाद रखी। 

 वनवासी सेवा केन्द्र के रूप में नारायणपुर का यह आश्रम आज  देश -विदेश में अपनी पहचान बना चुका है , जो हमें स्वामी आत्मानन्द जी के सेवाभावी व्यक्तित्व की याद दिलाता है। इस आश्रम  परिसर में प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी तक स्कूल संचालित हो रहे हैं। वहाँ के आवासीय हायर सेकेंडरी स्कूल में एक हजार से ज्यादा सीटें हैं। 

    अधिकांश आदिवासी बच्चे वहाँ पढ़ाई करते हैं ।पिछले 35 वर्षों में शिक्षा के इन प्रकल्पों ने अबूझमाड़ और आस-पास के सैकड़ों बच्चों के जीवन को संवारा है। मिशन की ओर से नारायण पुर में आदिवासी  युवाओं को विभिन्न व्यवसायों का तकनीकी प्रशिक्षण देने के लिए वहाँ 305 सीटों वाले आईटीआई का भी संचालन किया जा रहा है। इसके अलावा 30 बिस्तरों का अस्पताल (विवेकानंद आरोग्य धाम ) भी वहाँ स्थापित किया गया है। आश्रम का एक चलित अस्पताल (मोबाइल चिकित्सा यूनिट )  भी अबूझमाड़ इलाके में ग्रामीणों को अपनी सेवाएं दे रहा है। इस दुर्गम क्षेत्र के ग्राम कुतुल ,इरक भट्टी और कच्छ पाल में तीन प्राथमिक विद्यालय भी चलाए जा  रहे हैं। रामकृष्ण मिशन के सेवा प्रकल्पों के महान उद्देश्यों को देखते हुए शासन -प्रशासन की ओर से भी संस्था को हर प्रकार का सहयोग मिल रहा है। इलाके में आधा दर्जन राशन दुकानें भी मिशन द्वारा चलाई जा रही हैं। 

                  कई  पुस्तकें भी लिखीं 

स्वामी आत्मानन्द जी के सम्मान में नारायणपुर के शासकीय कॉलेज का नामकरण उनके नाम पर किया गया है। वह  एक महान दार्शनिक ,चिन्तक और लेखक भी थे। उनकी लिखी पुस्तकों में 'धर्म और जीवन ' तथा 'आत्मोन्नति के सोपान ' भी शामिल हैं। विवेकानंद आश्रम रायपुर की पत्रिका 'विवेक ज्योति " में स्वामी आत्मानन्द जी के सम्पादकीय और विभिन्न आध्यात्मिक विषयों पर उनके आलेख नियमित रूप से छपते थे।  

  महान विभूतियां इस धरती पर आकर अपने जीवन और कार्यो से मानव समाज पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। स्वामी आत्मानन्द जी भी उन्हीं विलक्षण विभूतियों में से एक थे। उनकी  प्रेरणादायी जीवन यात्रा के बारे में विस्तार से लिखने को बहुत कुछ है ,लेकिन फ़िलहाल तो सिर्फ़ इतना ही । उनकी  पुण्यात्मा को  विनम्र नमन।

  आलेख     -- स्वराज करुण

Wednesday, August 26, 2020

(कहानी ) क्या था उस आवाज़ का रहस्य ?


               ( स्वराज करुण )

छपाक  ...छपाक ..छपाक !   रात एक  बजे हॉस्टल के थर्ड फ्लोर में  दक्षिणी कॉरिडोर के अंतिम छोर पर बने बाथरूम के भीतर से यह कैसी आवाज़ आ रही है ? पूरा कॉरिडोर गूँज रहा है ! मैं परीक्षाओं के उस  मौसम में बीए फाइनल के  तीसरे पर्चे की तैयारी के लिए अपने रूम पार्टनर महेन्द्र के साथ रतजगा कर रहा था । थर्ड फ्लोर  में  तीन कॉरिडोर  और  तीस कमरे थे ,लेकिन  अधिकांश  खाली थे । जिनकी परीक्षाएं हो चुकी थी, वो सब विद्यार्थी अपने -अपने घर चले गए थे ।  छात्रों की इतनी कम संख्या को देखते हुए मेस की व्यवस्था भी अस्थायी रूप से बन्द कर दी गयी थी ।  भोजन बाहर किसी होटल से करके आना पड़ता था।     हमारी लाइन के  दस कमरों में से तो  सिर्फ हमारा ही कमरा हम दोनों मित्रों से आबाद था। बाकी पूरे कॉरिडोर में सन्नाटा पसरा हुआ था । 

             उस गहराती हुई रात में सिर्फ़ छपाक -छपाक की आवाज़ बीच -बीच में  इस ख़ामोशी को तोड़ रही थी ।  (स्वराज करुण)  मैंने महेन्द्र से कहा -   लगता है कि हमारा कोई साथी बाथरूम में अपने कपड़े काछ रहा है ।वह रहस्यमयी आवाज़ हर बीस सेंकेंड के अंतराल पर आ रही थी । बीच में बीस सेकेंड का गैप हमारे मन में रह -रह कर एक सवाल खड़ा करता जा रहा  था । महेन्द्र ने हैरानी जताई और कहा -इतनी रात भला कौन बाथरूम में कपड़े धोएगा ?  हमारी लाइन के तो बाकी सभी कमरे खाली हैं ।फिर भी चलो देखकर आते हैं ,लेकिन दबे पाँव चलना है । चप्पल से चटाक -चटाक की ध्वनि निकलती है । कोई बाहरी व्यक्ति बेजा तरीके से हॉस्टल में घुसकर कपड़े काछ रहा होगा ,तो वह सतर्क हो कर भागने की कोशिश करेगा । हो सकता है कि वह  पिस्तौल न सही ,चाकू रखा हो और भागने की  कोशिश में हमसे उलझ कर  हम पर हमला कर दे । मैंने महेन्द्र से  कहा -तुम्हारा सोचना ठीक है । चलो ,खाली पैर चलते हैं ।  हालांकि कॉरिडोर में बिजली की पर्याप्त रौशनी थी । एक मटमैला  बल्ब बाथरूम में भी था ,फिर भी हमने ऐहतियात के तौर पर बैटरी वाला टॉर्च रख लिया  था ।

           


    हमारे कमरे से  दक्षिणी कॉरिडोर के आख़िरी छोर पर बाथरूम की  दूरी करीब 100 फुट  रही होगी । हम दोनों  हल्के -हल्के कदमों से उस दिशा में बढ़ने लगे ।  बाथरूम के नज़दीक पहुंचकर हमने देखा कि भीतर अंधेरा था । महेन्द्र ने मेरे कानों में धीमे स्वर में कहा -शायद बल्ब  फ्यूज हो गया है । मैंने कहा -हो सकता है । हम दोनों बाथरूम के सामने खड़े हो गए ।कपड़े काछने की आवाज़ हर बीस सेकेंड के अन्तराल पर  आ ही रही थी और पहले के।मुकाबले और भी तेज़ होती जा रही थी । ऐसा लगा  नल भी खुला हुआ था । 

मैंने दबी आवाज़ से महेन्द्र के कानों में कहा -दरवाज़े पर दस्तक दें  क्या ?  उसने कहा -ठीक है।  मैंने  दरवाजे को  ढकेला तो लगा कि भीतर से  कुंडी लगी हुई है । महेन्द्र ने चिल्लाकर कहा -कौन है ? दरवाज़ा खोलो !  मैंने खटखटाया तो    छपाक ..छपाक की आवाज़ बन्द हो गयी । कुछ ही पलों में दरवाज़ा भी खुल गया और मोंगरे की ख़ुशबू वाले इत्र की  भीनी महक  के साथ हवा का एक झोंका हमें छूकर निकल गया । पूरे बदन में सिहरन दौड़ गयी । हम यह देखकर हैरत में पड़ गए कि भीतर कोई नहीं था और एक बाल्टी में निचुड़े हुए कपड़े रखे हुए थे । टॉर्च जलाकर देखा तो  उनमें  था एक सफ़ेद  पैजामा ,एक सफ़ेद कुर्ता , सफ़ेद  बनियान और एक टर्किश टॉवेल । हम उल्टे पाँव अपने कमरे में लौट आए ।

     रात के दो बजे गए थे । हमें नींद नहीं आयी । सुबह होने तक कौतूहल मिश्रित चर्चा में मशगूल रहे कि आख़िर वह कौन था ?  दूसरे दिन  चौकीदार से पूछने पर मालूम हुआ कि हर बुधवार  आधी रात के बाद उस बाथरूम में किसी  निराकार शख्स के हाथों कपड़े धोने की और मेस में बर्तनों के  टकराने की आवाज़ आती है । जिस ज़मीन पर  इस प्रायवेट हॉस्टल की यह बहुत बड़ी  बिल्डिंग खड़ी है ,वह पहले इस शहर के बाहरी इलाके में  एक गाँव के किसी ग़रीब किसान की थी ,जो अब बढ़ती आबादी और शहरी बसाहटों के फैलाव की वजह से नगरीय क्षेत्र में आ गयी है ।उस ज़मीन पर  वह  धान की खेती करता था । दूसरे किसानों की तरह उसकी खेती भी सिर्फ़ बारिश के  भरोसे  थी ।

        लगभग 30 साल पहले एक बार  कमजोर मानसून की वज़ह से भयानक सूखा पड़ गया । उसके एक साल पहले  किसान ने अपनी  बेटी की शादी के लिए एक महाजन से  ब्याज़ में 20 हजार रुपए का कर्ज़ लिया था ।  ब्याज़ की रकम बढ़ते -बढ़ते मूलधन से  कई गुना ज्यादा हो गयी । । वह  महाजन के  लगातार तगादे से तंग आ गया था । एक दिन महाजन ने उससे कहा -अगर कर्ज़ पटा नहीं सकते तो दो  एकड़ का अपना यह खेत   मेरे नाम कर दो । तुम्हारा पूरा कर्जा माफ़ हो जाएगा । तगादे की वज़ह से मानसिक संताप झेल रहे किसान को  कुछ नहीं सूझा ,तो उसने महाजन की बातों में आकर अपनी ज़मीन उसके नाम कर दी । वह खेत जो उसकी और उसके  परिवार की रोजी -रोटी का एक मात्र सहारा था ,वह भी किसान के हाथों से चला गया । शहर में कॉलेजों की संख्या बढ़ती जा रही थी ।महाजन ने अपनी व्यावसायिक बुद्धि से  सुदूर भविष्य की सोचकर इस ज़मीन पर  हॉस्टल बनवा लिया । किसान अपने  परिवार के भरण -पोषण के लिए अपनी ही  ज़मीन पर मज़दूरी करने के लिए मज़बूर हो गया । महाजन उससे अपने बंगले की साफ-सफ़ाई से लेकर कपड़े धुलवाने का भी काम करवाने लगा । रसोई का काम भी करवाता था । 

        एक दिन वह किसान गले के कैन्सर से पीड़ित हो गया । उसने महाजन के आगे हाथ फैलाया ,लेकिन सिर्फ़ निराशा हाथ लगी । किसान की आँखों मे अंधेरा छा गया । उसने एक बुधवार इसी जगह पर  ज़हर ख़ाकर अपनी ज़िन्दगी खत्म कर ली । एक वो दिन था और ये आज का दिन । तब से लेकर अब तक उसकी आत्मा एक निराकार शख्स के रूप में इस हॉस्टल की बिल्डिंग में मंडरा रही है । वह प्रत्येक बुधवार  कभी  रसोईघर में पहुँचकर बर्तनों को खंगालती रहती है तो कभी  बाथरूम में कपड़े धोने के लिए आ जाती है ।  किसी को नुकसान नहीं पहुँचाती ।  पिछले बीस साल से  ये सिलसिला बदस्तूर जारी है ।  पता नहीं आगे कब तक चलता रहेगा ?  

             चौकीदार की बातें सुनकर हम तनाव में आ गए । उसने हम दोनों के माथे पर चिन्ता की लकीरों को पढ़ लिया था । बुजुर्ग चौकीदार ने  हमसे कहा -डरने की कोई बात नहीं । वह निराकार शख़्स  हॉस्टल के  विद्यार्थियों के  कमरों में कभी  नहीं जाता ।  उसकी अदृश्य गतिविधियाँ सिर्फ किचन और  बाथरूम तक सीमित रहती हैं । बीती रात की उस रहस्यमयी घटना के बाद हम दोनों ने  हॉस्टल छोड़ने और शहर में  ही किसी बैचलर्स  होम में कमरा लेने का मन बना लिया था ,लेकिन चौकीदार ने हौसला बढ़ाया   तो हमारी भी हिम्मत बढ़ी  और हम दोनों दोगुने उत्साह के साथ परीक्षा की तैयारी में जुट गए ।  कुछ हफ़्तों बाद जब रिजल्ट आया तो  बीए अंतिम की मेरिट लिस्ट के टॉप टेन में  हम  दोनों का भी नाम शामिल था ,जो अखबारों में भी छपा हुआ था । बीए की पढ़ाई कम्प्लीट होने के बाद हमने हॉस्टल छोड़ दिया और नौकरी की तलाश में इधर -उधर हो गए । 

            --स्वराज करुण 

(प्रतीकात्मक फोटो : इंटरनेट से साभार )

Tuesday, August 25, 2020

(कविता ) इस युग के हर अभिमन्यु से

चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश में 
उस युग की तरह 
इस युग का हर अभिमन्यु भी 
आखिर टूट जाता है !
सच्चाई ,न्याय और नैतिकता का 
हर हथियार उसके हाथों से 
आख़िर छूट जाता है !
लम्पटों और दलालों के इस 
बेरहम और बेशर्म दौर में 
उनके बनाए चक्रव्यूह से
 निकलना आसान नहीं ,
ओ ! नादान अभिमन्यु 
ये आधुनिक कौरवों की बस्ती है, 
यहाँ कोई इंसान नहीं  .
निकलना हो अगर इस घेरेबंदी से ,
तो बन जाओ तुम भी 
कौरव दल के दलाल सैनिक ,
करो जयजयकार 
द्रौपदियों का चीरहरण कर रहे 
दुश्शासनों की ,
उनके दरबारों के 
दुर्योधनों और शकुनियों की ,  ,
एकलव्य का अंगूठा छीन लेने वाले  द्रोणाचार्यों की,  
सीखो उनकी चतुराई भरी चालबाजियां 
और कपट-नीति की कलाबाजियां !
अगर सीख लिया इतना कुछ 
तो यह तय मानो 
,गाँवों से  महानगरों तक 
इस कलियुगी महाभारत में 
तुम कभी नहीं हारोगे ,
लम्पटता क दांव-पेंच में 
होकर पारंगत 
अंत में तुम अपने पाण्डवों को ही मारोगे ! 
                    -- स्वराज करुण


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Sunday, August 23, 2020

कोरोना के साये में नुआखाई


             (आलेख : स्वराज करुण )

कोरोना संकट ने हमारे लोक पर्वों की रंगत और रौनक को  भी फीका कर दिया है। इस वर्ष भाद्र शुक्ल पंचमी के दिन यानी   23 अगस्त को पश्चिम ओड़िशा की लोक संस्कृति का प्रमुख पर्व 'नुआखाई ' भी कोरोना के  साये  में मनाया गया ।  ज़्यादातर लोग 'नुआखाई जुहार' और 'भेंटघाट'  के लिए शायद एक -दूसरे के घर नहीं जा पाए  और  मोबाइल फोन पर ही एसएमएस और वाट्सएप संदेशों के जरिए शुभकामनाओं का आदान -प्रदान करते रहे। सामाजिक मेल -मिलाप के लिए साल भर से जिस त्यौहार का इंतज़ार रहता है ,उसे इस बार अधिकांश परिवारों ने अपने घर पर ही मनाया । सार्वजनिक रूप से कोई बड़ा समारोह भी नहीं हुआ और अगर कहीं हुआ भी तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ )के मानकों के अनुरूप शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करते हुए  हुआ ।

    नुआखाई का सरल शाब्दिक अर्थ है नया खाना। नुआ यानी नया । खेतों में खड़ी नई  फ़सल के स्वागत में यह मुख्य रूप से किसानों और खेतिहर श्रमिकों द्वारा मनाया जाने वाला पारम्परिक त्यौहार है ,लेकिन समाज के सभी वर्ग इसे उत्साह के साथ मनाते हैं।पश्चिम ओड़िशा से लगे हुए छत्तीसगढ़ के सरहदी इलाकों में भी हर साल भाद्र शुक्ल पंचमी के दिन नुआखाई का उत्साह देखते ही बनता है ।  यह ऋषि पंचमी का भी महत्वपूर्ण  दिन होता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी पश्चिम ओड़िशा के हजारों लोग विगत कई दशकों से निवास कर रहे हैं। वे हर साल यहाँ नुआखाई का त्यौहार परम्परगत तरीके से उत्साह के साथ मनाते आ रहे हैं ।नुआखाई के एक दिन पहले यहाँ नये धान की बालियों के साथ चुड़ा (चिवड़ा ), मूंग और परसा पत्तों और पूजा के फूलों की बिक्री के लिए उत्कल महिलाएं पसरा लगाकर बैठी थीं।  कोरोना संक्रमण की  आशंका को देखते हुए उनमें से कुछ ने  चेहरों पर मास्क भी लगा रखा था। उनके घरों के कुछ पुरुष सदस्य भी उनके साथ थे। कुछ ग्राहक भी मास्क लगाए हुए थे। लेकिन पिछले साल जैसी चहल -पहल नहीं होने के कारण इन  पसरा वालों के हावभाव में  मायूसी साफ़ झलक रही थी। अपराह्न उनसे हुई संक्षिप्त बातचीत में उनमें से कुछ ने बिक्री कम होने की जानकारी दी । शायद कोरोना के आतंक के कारण ग्राहकी कम रही। 

                                 

        पश्चिम ओड़िशा के सुंदरगढ़ , झारसुगुड़ा , सम्बलपुर ,बरगढ़ ,नुआपाड़ा , कालाहांडी,  बलांगीर , बौध और  सुवर्णपुर (सोनपुर ) जिलों का यह लोकप्रिय त्यौहार  अब ओड़िशा के कुछ अन्य जिलों में भी उत्साह के साथ मनाया जाने लगा है । upइनमें से कुछ जिले जैसे -झारसुगुड़ा , सम्बलपुर ,बरगढ़ ,नुआपाड़ा  छत्तीसगढ़ से लगे हुए हैं। झारखंड का सिमडेगा जिले का कुछ हिस्सा भी ओड़िशा और छत्तीसगढ़  की सरहद से लगा हुआ है । 

 एक -दूसरे के राज्यों की  सीमावर्ती लोक संस्कृति का गहरा असर उनके सरहदी लोक जीवन पर होता ही है। लोगों में एक -दूसरे के साथ पारिवारिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक  रिश्ते भी होते हैं। एक -दूसरे की भाषा ,बोली , एक -दूसरे के रीति -रिवाज और एक -दूसरे के गीत -संगीत से लोग गहराई से जुड़ जाते हैं। लिहाजा पश्चिम ओड़िशा के नुआखाई का सांस्कृतिक प्रभाव भी छत्तीसगढ़ से लगे इसके सीमंचलों  में साफ देखा जा सकता है। गरियाबंद , महासमुन्द , रायगढ़ , जशपुर ,धमतरी सहित बस्तर संभाग के कुछ जिले भी इनमें शामिल हैं ।वैसे तो कृषि प्रधान भारत में खरीफ़ और रबी की नई फ़सलों की अगवानी में  किसानों के द्वारा उत्सव मनाने की परम्परा हजारों वर्षों से काल से चली आ रही है।  पंजाब में बैसाखी , केरल में ओणम ,  असम में बिहू और छत्तीसगढ़ में नवाखाई इसका उदाहरण हैं ।  उल्लेखनीय है कि  छत्तीसगढ़ में 'नवाखाई 'और समुद्र तटवर्ती  पूर्वी ओड़िशा में 'नुआखाई ' दशहरे के दिन या उसके आस -पास  मनाया जाता है। 

                

ओड़िशा में भी  नुआखाई का इतिहास बहुत पुराना है जो वैदिक काल से जुड़ा हुआ है । लेकिन कुछ इतिहासकार जनश्रुतियों का उल्लेख करते हुए  बताते हैं कि  पश्चिम ओड़िशा में नुआखाई की परम्परा शुरू करने का श्रेय  बारहवीं शताब्दी में हुए चौहान वंश के प्रथम राजा रामईदेव को दिया जाता है। वह तत्कालीन पटना (वर्तमान पाटना गढ़ )के राजा थे। पाटनागढ़ वर्तमान में बलांगीर जिले में है। कुछ  जानकारों का कहना है कि पहले बलांगीर को ही पाटनागढ़ कहा जाता था।रामईदेव ने देखा कि उनकी प्रजा केवल शिकार और कुछ वनोपजों के संग्रहण से ही अपनी आजीविका चलाती है और  यह जीवन यापन की एक  अस्थायी व्यवस्था है। इससे कोई अतिरिक्त आमदनी भी नहीं होती  और  प्रजा के साथ -साथ राज्य की अर्थ व्यवस्था भी बेहतर नहीं हो सकती। उन्होंने लोगों के जीवन में स्थायित्व लाने के लिए उन्हें स्थायी खेती के लिए प्रोत्साहित करने की सोची और  इसके लिए धार्मिक  विधि -विधान के साथ नुआखाई पर्व मनाने की शुरुआत की। कालांतर में यह पश्चिम ओड़िशा के लोक जीवन का एक प्रमुख पर्व बन गया।    

वर्षा ऋतु के दौरान भाद्र महीने के शुक्ल पक्ष में खेतों में धान की नई फसल , विशेष रूप से जल्दी पकने वाले धान में बालियां आने लगती हैं। तब  नई फ़सल के  स्वागत में नुआखाई का आयोजन होता है।  यह हमारी कृषि संस्कृति और ऋषि संस्कृति पर आधारित त्यौहार है। इस दिन  फ़सलों की देवी अन्नपूर्णा सहित सभी देवी -देवताओं की पूजा अर्चना की जाती है। सम्बलपुर में समलेश्वरी देवी , बलांगीर -पाटनागढ़ अंचल में पाटेश्वरी देवी , सुवर्णपुर (सोनपुर ) में देवी सुरेश्वरी और कालाहांडी में देवी मानिकेश्वरी की विशेष पूजा की जाती है। नुआखाई के दिन सुंदरगढ़ में राजपरिवार द्वारा देवी शिखर वासिनी की पूजा की जाती है। राजपरिवार का यह मंदिर केवल नुआखाई के दिन खुलता है। 


 पहले यह त्यौहार भाद्र शुक्ल पक्ष में अलग -अलग गाँवों में अलग -अलग तिथियों में सुविधानुसार मनाया जाता था ।गाँव के मुख्य पुजारी इसके लिए तारीख़ और मुहूर्त तय करते थे ,लेकिन अब  नुआखाई का दिन और समय सम्बलपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर के पुजारी तय करते हैं। इस दिन गाँवों में लोग अपने ग्राम देवता या ग्राम देवी की भी पूजा करते हैं । नये धान के चावल को पकाकर तरह -तरह के पारम्परिक व्यंजनों के साथ घरों में और सामूहिक रूप से भी  नवान्ह भक्षण यानी नये अन्न का भक्षण बड़े चाव से किया जाता है। सबसे पहले आराध्य देवी -देवताओं को भोग लगाया जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद 'नुआखाई ' का सह -  भोज होता है।

इस दिन के लिए 'अरसा पीठा ' व्यंजन विशेष रूप से तैयार किया जाता है। नुआखाई त्यौहार  के आगमन के पहले लोग अपने -अपने घरों की साफ -सफाई और लिपाई -पुताई करके नई फसल के रूप में देवी अन्नपूर्णा के स्वागत की तैयारी करते हैं। परिवार के सदस्यों के लिए नये कपड़े खरीदे जाते हैं। लोग एक -दूसरे के परिवारों को नवान्ह भक्षण के आयोजन में स्नेहपूर्वक  आमंत्रित करते हैं। इस विशेष अवसर के लिए लोग नये वस्त्रों में सज -धजकर एक -दूसरे को नुआखाई जुहार करने आते -जाते हैं। 


गाँवों से लेकर शहरों तक खूब चहल -पहल और खूब रौनक रहती है। सार्वजनिक आयोजनों में  पश्चिम ओड़िशा की लोक संस्कृति पर आधारित  पारम्परिक लोक नृत्यों की धूम रहती है।।अभी तक तो ऐसा ही होता चला आ रहा था  ,लेकिन इस बार कोरोनाजनित भय के माहौल में  'नुआखाई' का सार्वजनिक उल्लास पहले जैसा नहीं था । इसके बावज़ूद अधिकांश लोगों ने घरों  में रहकर ही अपनी इस धार्मिक और सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह किया। 

         --स्वराज करुण