Wednesday, October 11, 2023

(आलेख) बंद क्यों नहीं होती ऐसी ख़ूनी लड़ाइयाँ ? लेखक -स्वराज्य करुण

आख़िर संयुक्त राष्ट्रसंघ की क्या ड्यूटी है? (आलेख -स्वराज्य करुण) यूक्रेन पर लगभग डेढ़ साल पहले शुरू हुए रूसी आक्रमण की आग अभी बुझी भी नहीं है और उधर इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध शुरू हो गया है। युद्ध चाहे यूक्रेन और रूस का हो या इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच , इन्हें तत्काल रोका जाना चाहिए। बेरहमी और पागलपन से भरी इन लड़ाइयों में अब तक इन देशों के सैकड़ों निरीह नागरिकों की मौत हो चुकी है , हजारों लोग घायल हुए हैं। युद्ध के बदहवास माहौल में मृतकों और घायलों के सही-सही आंकड़े तत्काल नहीं मिल पाते है। शायद ये आंकड़े अब तक मिली संख्याओं से अधिक होंगे।संयुक्त राष्ट्र संघ को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। आख़िर संयुक्त राष्ट्र संघ की क्या ड्यूटी है? उसके बड़े-बड़े दिग्गज पदाधिकारियों को आख़िर लाखों डॉलर की तनख्वाहें और सुख-सुविधाएँ आख़िर किस काम के लिए मिलती हैं ? दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर यह संगठन बनाया किसलिए है?
किन्हीं दो देशों की खूनी लड़ाई का खामियाज़ा उन देशों के उन हजारों-लाखों लोगों को भुगतना पड़ता है ,जिनकी कोई गलती नहीं होती ,जिनका उन लड़ाइयों से कोई लेना -देना नहीं रहता। वो अपनी और अपने परिवारों की ज़िन्दगी की गाड़ी खींचने के लिए रोजी-रोटी की ज़द्दोज़हद में लगे रहते हैं। लेकिन युद्ध की आग उनकी घर-गृहस्थी को उजाड़कर रख देती है , उन्हें और उनके मासूम बच्चों , माताओं ,बहनों और बुजुर्गों सहित घर के दूसरे सदस्यों को भी जलाकर राख कर देती है।लेकिन उन राष्ट्रों के प्रमुख शासक अपने-अपने सिंहासनों की सुरक्षा के लिए , अपने -अपने अहंकार की तुष्टि के लिए अपने -अपने नागरिकों में युद्धोन्माद की लहर पैदा करके, उन्हें मानवता का दुश्मन बना देते हैं और खुद अपने-अपने महलों में हमेशा महफूज़ बने रहते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वर्ष 1945 में दो जापानी शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिकी परमाणु बमों के हमलों में लाखों नागरिक मारे गए।उसकी एक अलग दर्दनाक कहानी है। यह कड़वी सच्चाई है कि दुनिया का इतिहास राष्ट्रों के बीच हुई और हो रही लड़ाइयों से बहते बेगुनाहों के ख़ून से भी लिखा गया है और लिखा जा रहा है। अगर दुनिया पढ़े-लिखे ,सुशिक्षित लोगों की है , अगर दुनिया में शिक्षा और साक्षरता बढ़ चुकी है , तो ऐसी लड़ाइयाँ बंद होनी चाहिए। वैसे ये बात तो है कि अनपढ़ लोग इस प्रकार के पागलपन से अक्सर दूर रहते हैं ,लेकिन पागल किस्म के लोग उन्हें भी पागलपन का शिकार बनाकर युद्ध की आग में झोंक देते हैं। युद्ध से और किसी को कोई फायदा हो या न हो ,लेकिन अस्त्र-शस्त्रों के निर्माता और व्यापारी हमेशा फ़ायदे में रहते हैं। ये लड़ाइयाँ हथियारों के सौदागरों को लाखों ,करोड़ो और अरबो रुपयों के मुनाफ़े का बाज़ार मुहैय्या करवाती हैं। दुनिया भर के हथियार-उद्योग इन्हीं निर्मम लड़ाइयों के दम पर फलते-फूलते रहते हैं। विगत तीन दशकों में हमारी दुनिया में कई युद्ध हुए हैं। वर्ष 1990 में खाड़ी युद्ध , वर्ष 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर , फिर 2003 में इराक पर अमेरिकी हमलों का खौफ़नाक मंज़र दुनिया देख चुकी है। सीरिया से भी युद्ध की ख़बरें गाहेबगाहे आती रहती हैं। कुछ साल पहले अज़रबैजान-आर्मेनिया की खूनी ज़ंग में भी मानव जीवन की भारी तबाही हो चुकी है । दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से युद्ध के विनाशकारी पागलपन की ख़बरें मिलती ही रहती हैं। ऐसी लड़ाइयाँ बंद होनी चाहिए। दुनिया के तमाम देशों को अपनी जनता के लिए बेहतर शिक्षा के साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं पर , आवागमन के बेहतर संसाधनों के विकास पर ध्यान देना चाहिए। अपनी ऊर्जा साहित्य ,कला और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन पर लगानी चाहिए। अगर ये दुनिया सचमुच पढ़े-लिखों की है तो उसे सभी देशों के बीच परस्पर शांति और मैत्री के लिए काम करना चाहिए। संयुक्त राष्ट्रसंघ का गठन भी इसी उद्देश्य से किया गया था। लेकिन लगता है कि वह इस बात को भूल चुका है। उसे याद दिलाना ज़रूरी है। आलेख -स्वराज्य करुण फोटो -इंटरनेट से साभार

2 comments: