घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा ?
******
उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ
फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.
उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी
सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .
उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ
हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.
आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,
भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.
तिनकों को जोड़ जिसने बनाया था अपना घर
लुटेरों ने लूट लिया कल उसका आशियाँ.
घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा
वीरान रसोई में कैसे बनेंगी रोटियाँ .
तबाही का तमाशा हुआ बच्चों के सामने
क्या सोचेंगी कहो कल नई -नई पीढ़ियाँ.
-स्वराज्य करुण
मार्मिक रचना
ReplyDeleteअनिता जी, बहुत -बहुत धन्यवाद..
Deleteबेहतरीन रचना
ReplyDeleteआभार
वंदन
दिग्विजय अग्रवाल जी । हार्दिक आभार।
Deleteविचारणीय प्रश्न करती मर्मस्पर्शी रचना सर।
ReplyDeleteजलते चूल्हे का महत्व उसे ही पता है
जिसने बुझे चूल्हे की राख में रोटी के स्वप्न पकाये हों।
सादर।
-------
जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।