Thursday, July 2, 2026

(ग़ज़ल ) घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा? - स्वराज्य करुण

 घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा ?

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उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ 

फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.

उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी 

सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .

उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ 

हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.

आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,

भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.

तिनकों को जोड़ जिसने बनाया था अपना घर 

लुटेरों ने लूट लिया कल उसका आशियाँ.

घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा 

वीरान रसोई में कैसे बनेंगी रोटियाँ .

तबाही का तमाशा हुआ बच्चों के सामने 

क्या सोचेंगी कहो कल नई -नई पीढ़ियाँ.

  -स्वराज्य करुण 


5 comments:

  1. मार्मिक रचना

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    1. अनिता जी, बहुत -बहुत धन्यवाद..

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  2. बेहतरीन रचना
    आभार
    वंदन

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    1. दिग्विजय अग्रवाल जी । हार्दिक आभार।

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  3. विचारणीय प्रश्न करती मर्मस्पर्शी रचना सर।
    जलते चूल्हे का महत्व उसे ही पता है
    जिसने बुझे चूल्हे की राख में रोटी के स्वप्न पकाये हों।
    सादर।
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    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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