Thursday, July 2, 2026

(ग़ज़ल ) घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा? - स्वराज्य करुण

 घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा ?

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उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ 

फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.

उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी 

सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .

उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ 

हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.

आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,

भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.

तिनकों को जोड़ जिसने बनाया था अपना घर 

लुटेरों ने लूट लिया कल उसका आशियाँ.

घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा 

वीरान रसोई में कैसे बनेंगी रोटियाँ .

तबाही का तमाशा हुआ बच्चों के सामने 

क्या सोचेंगी कहो कल नई -नई पीढ़ियाँ.

  -स्वराज्य करुण 


Wednesday, July 1, 2026

(कविता ) हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..! कवि - स्वराज्य करुण

 हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..!

     (कवि -स्वराज्य करुण )

चेहरा उसका ख़ूनी खंजर हो गया है, 

दिल भी बेरहम बुलडोजर हो गया है.

दर्द किसी का क्या जाने वो कुर्सीवाला , 

जिसके हाथों गाँवों का मर्डर हो गया है.

जज्बातों के फूलों को कुचला है जिसने,

 इरादा उसका निर्मम पत्थर हो गया है.

खामोशी से देख रहा सब जुल्म यहाँ,

आदमी जो मंदिर का ईश्वर हो गया है.

कोई रोये या चीखे अब सामने उसके,

प्रार्थना का हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है.

सीधे सादे इंसानों  का घर - आंगन,  

पल भर में ही कितना जर्जर हो गया है.

उनके सपनों का बगीचा जा कर देखो, 

आज वहाँ ये कैसा मंजर हो गया है.

फूलों जैसे नाजुक -नाजुक बच्चों में भी,

जाने कौन इतनी दहशत बो गया है.

राजमहल तुम अपने लिए वहाँ बनाओगे,

जहाँ पे उसका खेत बंजर हो गया है.

मज़दूर ने  अपनी मेहनत से जो घर बनाया, 

तुम्हारे हाथों आज वो खंडहर हो गया है.

जिसके ख़्वाबों को  तुमने दफ़न कर दिया,

वह इंसान बागी अब उठकर हो  गया है.

पी रहे हो  तुम जिसे समझकर अमृत,

लिये तुम्हारे पछतावे का जहर हो गया है.

बर्बाद किया है तुमने जिस गाँव को सुनो, 

ग़रीबों के अभिशाप का वो शहर हो गया है.

उनकी आहें तूफानों में इक दिन बदलेंगी

देखोगे तब झोंका हवा का बवंडर  हो गया है.

-स्वराज्य करुण