Friday 28 November 2014

बहुत खुश है शिक्षा -माफिया !

  डोनेशनखोर शिक्षा माफिया गिरोह के सदस्य  बहुत खुश होंगे .क्यों न हों ? दिल्ली में उनके पक्ष में फैसला जो आया है ! इस फैसले के अनुसार प्रायवेट नर्सरी स्कूलों में मासूम बच्चों के दाखिले के लिए फार्मूला वह खुद बनाएंगे ,सरकार इसमें कोई दखल नहीं दे पाएगी . जनता की निर्वाचित सरकार का कोई हुक्म उन पर नहीं चलेगा . !यानी अब प्रायवेट स्कूलों में बच्चों के एडमिशन के लिए जमकर होगी रिश्वतखोरी की तर्ज पर डोनेशनखोरी !. दो-तीन साल की नाजुक उम्र के बच्चों को भी देना होगा इंटरव्यू ,जैसे किसी नौकरी के लिए बेरोजगार आवेदकों का लिया जाता है साक्षात्कार ! इतना ही नहीं ,बल्कि इन बच्चों के माता-पिता को भी शिक्षा-माफिया के सामने खड़े होकर बेरोजगारों की तरह इंटरव्यू देना होगा !    यह शिक्षा के निजीकरण के लिए देश में विगत कई वर्षों से चल रही साजिशों का  'साइड इफेक्ट' है . धन्य है फैसला देने वाला इन्साफ का नेत्रहीन देवता ! (स्वराज्य करुण )

Thursday 27 November 2014

काले-धन का मंत्र-जाप !


                         अगर चाहते हो जानें सब धन है कितना काला ,
                         सबसे पहले खोलो   बैंक में हर लॉकर का ताला !
                         समझदार को इशारा काफी ,अगर ध्यान से देखे ,
                         आँखों में वरना पड़ा रहेगा नासमझी का जाला !
                         चोर-लुटेरे - डाकू सबके सब हैं मौज-मजे में ,
                         काले-धन का मंत्र-जाप कर रहे फेर कर माला !
                         कोई किसी का भाई-भतीजा ,कोई किसी का बेटा ,
                         कोई किसी का जीजा है तो कोई किसी का साला !
                         बाहर-बाहर इक-दूजे को जमकर हैं गरियाते ,
                         भीतर -भीतर हँसी -ठहाके ,महफ़िल और मधुशाला !
                         बिन इलाज के मरते हैं जो अस्पताल के आंगन ,
                          कोई नहीं होता है उनको कफन ओढ़ाने वाला !
                         फिर भी खूब तरक्की पर है देश तुम्हारा -मेरा ,
                         समृद्धि के दावों से देखो घर-घर में उजियाला !
                                                                           -- स्वराज्य करुण

Friday 21 November 2014

(ग़ज़ल ) कभी गाँव था अपनों का ...!

                                     समय  की बुरी नज़र से  बेहद डर लगता है ,
                                     भीड़ भरे इस शहर से बेहद डर लगता है !
                                     हर  तरफ  यहाँ  अजनबी चेहरों के मेले   ,
                                     रूपयों का  ही बाज़ार चारों प्रहर लगता है !
                                     बाहर -बाहर  जितना आलीशान दिख रहा,
                                     भीतर जाओ तो भुतहा  खंडहर लगता है !
                                     कभी गाँव था अपनों का  इसी जगह पर ,
                                     जहां आज यह बेगानों का घर लगता है !
                                     हरी घास के नर्म  बिछौने कौन ले गया ,
                                     धरती  का प्यारा आंचल पत्थर लगता है !
                                   .जिसने  छीनी महतारी की ममता हमसे ,
                                     उसके हाथों छुपा हुआ खंज़र लगता है !
                                     इन्साफ और क़ानून सब कहने की बातें ,
                                     बेहिसाब ,बेदर्द यहाँ का मंज़र लगता है !
                                                                        --  स्वराज्य करुण

Thursday 20 November 2014

फैशनेबल पशु-प्रेमियों ने बढ़ाया आदमखोर कुत्तों का हौसला !

      .
    हमारे शहर में पिछले एक साल से आवारा कुत्तों का भयानक आतंक है  कुछ फैशनेबल पशु-प्रेमियों के चलते उनके  हौसले बुलंद होते जा रहे हैं .  होटलों और मांस-मछली विक्रेताओं के ठेलों के आस -पास  जूठन की लालच में इनके झुण्ड के झुण्ड घूमते रहते हैं  . शहर के आऊटर में जगह-जगह बेतरतीब और अवैध रूप से संचालित ब्रायलर मुर्गों और अण्डों की दुकानों के इर्द -गिर्द इन आवारा कुत्तों को सुस्ताते देखा जा सकता है .ये वहाँ मुर्गों के पंखों और मांस के लोथड़ों की लालच में ध्यान लगाए बैठे रहते हैं और जैसे ही कोई दुकानदार इस प्रकार के अवशेषों को लापरवाही से फेंकता है ,ये उस दिशा में दौड पड़ते हैं .रात में सडकें सुनसान होने पर भी ये आवारा हिंसक पशु वहीं पर अपना डेरा जमाए रहते हैं .
      विगत एक वर्ष में दर्जनों लोगों पर इन लावारिस कुत्तों ने हमले किए , कई लोगों को बुरी तरह घायल कर दिया और कई मासूम बच्चों को भी अपना शिकार बनाया . ऐसा नहीं है कि शासन-प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है. नगर-निगम के अधिकारियों ने इन कुत्तों को जहर देकर मारना चाहा ,उनकी नसबंदी के प्रयास किये ,लेकिन जब -जब ऐसी कोशिशें हुई , स्वयं  को पशु-प्रेमी कहलाने वालों के कुछ  स्वयं -भू संगठन के लोग अखबार बाजी करने लगे कि निरीह जानवरों पर अत्याचार हो रहा है .  कोई उपाय न देखकर नगर-निगम वालों ने इन आवारा कुत्तों को शहर की सरहद से काफी दूर जंगल में छोड़ना शुरू किया ,तो एक नई समस्या तन कर खड़ी हो गई . ये कुत्ते अब गाँवों में आतंक फैलाने लगे .शहर से लगभग तीस किलोमीटर परस्थित  एक गाँव से खबर आयी है कि वहाँ इन आवारा कुत्तों ने खुले में खेल रहे एक दर्जन नन्हें बच्चों को काटकर बुरी तरह जख्मी कर दिया .शहर के आऊटर पर एक कॉलोनी में ऐसे ही कुछ आवारा कुत्तों ने एक भिखारन को नोच-खसोट  कर मार डाला . इतना होने के बाद भी शहर के स्वनाम धन्य पशु-प्रेमियों का दिल नहीं पसीज रहा है .
        आदमखोर होते जा रहे इन आवारा कुत्तों को  खत्म करने के लिए जब-जब शासन -प्रशासन ने नगर -निगम के साथ मिलाकर कोई कदम उठाना चाहा , इन लोगों ने उसका विरोध शुरू कर दिया . कोई उनसे यह क्यों नहीं पूछता कि मानव -जीवन ज्यादा कीमती है या आदमखोर कुत्ते ? गौर तलब है कि ये लावारिस कुत्ते  राहगीरों,स्कूली बच्चों  और  आम नागरिकों पर हमले कर रहे हैं .  कामकाजी लोग रात में दोपहिया गाड़ियों में घर लौटे हैं तो ये उन पर झपट्टा मारते की कोशिश करते है .ऐसे में कई जानलेवा दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं .पशु-प्रेमी संगठन के स्व-घोषित नेताओं को वह सब नज़र नहीं आता .लगता है अब एक ही उपाय रह गया है-लोग अपने घरों के आस-पास आवारा और हिंसक कुत्तों को देखते ही  चुपचाप उन्हें खाने में जहर मिलाकर खिला दें . इसके बाद भी अगर स्वघोषित पशु-प्रेमी इसका विरोध करें तो इन लावारिस कुत्तों को उनके घरों के भीतर ले जाकर छोड़ देना चाहिए और उनसे कहना चाहिए कि अब आप ही इनकी परवरिश कीजिए !
(स्वराज्य करुण )

Tuesday 18 November 2014

काली कमाई का सबसे सुरक्षित ठिकाना बैंक लॉकर !

         भ्रष्टाचार और काला धन दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं . दोनों एक-दूजे के लिए ही बने हैं और एक-दूजे के फलने-फूलने के लिए ज़मीन तैयार करते रहते हैं . यह कहना भी गलत नहीं होगा कि दोनों एकदम सगे मौसेरे भाई हैं. भ्रष्टाचार से अर्जित करोड़ों-अरबों -खरबों की दौलत को छुपाकर रखने के लिए तरह -तरह की जुगत लगाई जाती है . भ्रष्टाचारियों द्वारा इसके लिए अपने नाते-रिश्तेदारों ,नौकर-चाकरों और यहाँ तक कि कुत्ते-बिल्लियों के नाम से भी बेनामी सम्पत्ति खरीदी जाती है . बेईमानी की कालिख लगी दौलत अगर छलकने लगे तो सफेदपोश चोर-डाकू उसे अपने बिस्तर और यहाँ तक कि टायलेट में भी छुपाकर रख देते हैं . .हालांकि देश के सभी राज्यों में हर साल और हर महीने कालिख लगी कमाई करने वाले सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के घरों पर छापेमारी चलती रहती है ,करोड़ों -अरबों की अनुपातहीन सम्पत्ति होने के खुलासे भी मीडिया में आते रहते हैं .
                      आपको यह जानकर शायद हैरानी होगी कि हमारे देश के राष्ट्रीयकृत और निजी क्षेत्र के बैंक भी भ्रष्टाचारियों  की   बेहिसाब दौलत को छुपाने का सबसे सुरक्षित ठिकाना बन गए हैं .जी हाँ !  ये बैंक  जाने-अनजाने इन भ्रष्ट लोगों की मदद कर रहे हैं और उनकी काली कमाई के अघोषित संरक्षक बने हुए हैं  ! वह कैसे ? तो जरा विचार कीजिये ! प्रत्येक बैंक में  ग्राहकों को लॉकर रखने की भी सुविधा मिलती है .हालांकि सभी खातेदार इसका लाभ नहीं लेते ,लेकिन कई इच्छुक खातेदारों को बैंक शाखाएं  निर्धारित शुल्क पर लॉकर आवंटित करती हैं  .उस लॉकर में आप क्या रखने जा रहे हैं , उसकी कोई सूची बैंक वाले नहीं बनाते . उन्हें केवल अपने लॉकर के किराए से ही मतलब रहता है . लॉकर-धारक से उसमे रखे जाने वाले सामानों की जानकारी के लिए कोई फ़ार्म नहीं भरवाया जाता .  .आप सोने-चांदी ,हीरे-जवाहरात से लेकर  बेहिसाब नोटों के बंडल तक उसमे रख सकते हैं . एक मित्र ने मजाक में कहा - अगर आप चाहें तो अपने बैंक लॉकर में दारू की बोतल और अफीम-गांजा -भांग जैसे नशीले पदार्थ भी जमा करवा सकते हैं .
          कहने का मतलब यह  कि बैंक वाले अपनी शाखा में लॉकर की मांग करने वाले किसी भी ग्राहक  को निर्धारित किराए पर लॉकर उपलब्ध करवा कर अपनी ड्यूटी पूरी मान  लेते हैं  .हाल ही में कुछ अखबारों में यह समाचार पढ़ने को मिला कि   एक भ्रष्ट अधिकारी के बैंक लॉकर होने की जानकारी मिलने पर जांच दल ने जब उस बैंक में उसे साथ ले जाकर लॉकर खुलवाया तो उसमे पांच लाख रूपए नगद मिले ,जबकि उसमे विभिन्न देशों के बासठ नोटों के अलावा कई विदेशी सिक्के भी उसी लॉकर से बरामद किये गए ..उसके ही एक अन्य बैंक के लॉकर में करोड़ों रूपयों की जमीन खरीदी से संबंधित रजिस्ट्री के अनेक दस्तावेज भी पाए गए .जरा सोचिये ! इस व्यक्ति ने  पांच लाख रूपये की नगद राशि को अपने बैंक खाते में जमा क्यों नहीं किया ? उसने इतनी बड़ी रकम को लॉकर में क्यों रखा ? फिर उस लॉकर में विदेशी नोटों और विदेशी सिक्कों को रखने के पीछे  उसका इरादा क्या था ? हमारे जैसे लोगों के लिए तो  पांच लाख रूपये भी बहुत बड़ी रकम होती है .इसलिए मैंने इसे 'इतनी बड़ी रकम' कहा .
          बहरहाल हमारे  देश में बैंकों के लॉकरों में पांच लाख तो क्या , पांच-पांच करोड रूपए रखने वाले भ्रष्टाचारी भी होंगे .आम धारणा है कि भारत के काले धन का जितना बड़ा जखीरा विदेशी बैंकों में है ,उससे कहीं ज्यादा काला धन देश में ही छुपा हुआ है और तरह-तरह के काले कारोबार में उसका धडल्ले से इस्तेमाल हो रहा है . ऐसा लगता है कि बैंक लॉकर भी काले-धन को सुरक्षित रखने का एक सहज-सरल माध्यम   बन गए हैं .ऐसे में अगर देश के भीतर छुपाकर रखे गए काले धन को उजागर करना हो तो सबसे पहले तमाम बैंक-लॉकर धारकों के लिए यह कानूनन अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए कि वे अपने लॉकर में रखे गए सामानों की पूरी जानकारी बैंक-प्रबंधन को दें .ताकि उसका रिकार्ड सरकार को भी मिल सके .अगर लॉकर धारक ऐसा नहीं करते हैं तो उनके लॉकर जब्त कर लिए जाएँ . मुझे लगता है कि ऐसा होने पर  अरबों-खरबों रूपयों का काला धन अपने आप बाहर आने लगेगा और उसका उपयोग देश-हित में किया जा सकेगा .(स्वराज्य करुण )

Sunday 9 November 2014

मानवता का दुश्मन हिटलर अभी ज़िंदा है !

अभी हिटलर को मरे सौ साल भी नहीं हुए ,लेकिन लगता है कि मानवता का यह भयानक दुश्मन अपने नये -नये रूप में आज भी दुनिया के हर देश में जिंदा है. दैनिक 'भास्कर ' में  आज छपी दिल दहला देने वाली इस खबर से हिटलर के नये दानवी अवतारों के इस दुनिया में जीवित होने की पुष्टि हो जाती है. इन्सानियत को और  इंसानों को ऐसे आदमखोर हिटलरों से सावधान रहने और एकजुट होकर उन्हें हमारी दुनिया से बाहर भगाने की जरूरत है.(स्वराज्य करुण )

Saturday 8 November 2014

(पुस्तक -चर्चा ) छत्तीसगढी भाषा का पहला उपन्यास


       आंचलिक  साहित्य के शोधकर्ताओं की मानें तो पाण्डेय बंशीधर शर्मा रचित 'हीरू के कहिनी' . छत्तीसगढी भाषा का पहला उपन्यास  है. इसका प्रथम प्रकाशन सन् 1926 में हुआ था .दूसरा संस्करण 74 साल बाद सन् 2000 में  छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालय रायगढ़ में प्रकाशित हुआ . यानी आज (सन 2014 से ) 88 साल पहले  महानदी के आँचल में लिखा गया था छत्तीसगढ़ की जन-भाषा में पहला उपन्यास .यही वह समय था जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन के जरिये राष्ट्रीय चेतना का विकास हो रहा था .
          यही वह समय था जब देश भर में विभिन्न राज्यों की आंचलिक भाषाओं में  राष्ट्रीय जागरण की  रचनाएँ लिखी और छापी जा रही थी और हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं का भी उत्थान हो रहा था . इतिहास के ऐसे निर्णायक दौर में  छत्तीसगढ़ में यहाँ की जन-भाषा में साहित्य सृजन करने वाले माँ सरस्वती के पुजारियों में  पाण्डेय बंशीधर शर्मा भी अग्रणी  थे . उन्होंने 'हीरू के कहिनी ' के माध्यम से  छत्तीसगढ़ के तत्कालीन ग्रामीण जन-जीवन का जीवंत चित्रण किया है., गरीबों के जीवन -संघर्ष  को अभिव्यक्ति दी है और यह भी बताने का प्रयास किया है कि राजा (शासक ) और जनता के बीच कैसे रिश्ते होने चाहिए.
    उपन्यासकार के   पारिवारिक सदस्य और वरिष्ठ साहित्यकार श्री ईश्वर शरण पाण्डेय ने इसका सम्पादन किया है. यह दूसरे संस्करण का मुखपृष्ठ है .पाण्डेय बंशीधर शर्मा छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध इतिहासकार स्वर्गीय श्री लोचन प्रसाद पाण्डेय और प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय श्री मुकुटधर पाण्डेय के मंझले भाई थे.  पाण्डेय परिवार के लोग महानदी के तटवर्ती ग्राम बालपुर के निवासी थे . बंशीधर जी के उपन्यास के प्रकाशक श्री राजू पाण्डेय ने अपने प्रकाशकीय वक्तव्य में लिखा है -उपन्यास के नायक हीरू का चरित्र छत्तीसगढ़ अंचल के निवासियों का प्रतिनिधि चरित्र है .धनी -निर्धन . शिक्षित -अशिक्षित , परम्परावादी और प्रगतिशील , सभी प्रकार के पात्र उपन्यास में मौजूद हैं .उपन्यास का कथानक हीरू की कष्टपूर्ण और दुःखमय बाल्यावस्था से उसके सफल और प्रतिष्ठापूर्ण यौवन तक फैला हुआ है .उपन्यास बहुरंगी ग्रामीण जीवन की समग्रता को समेटे है .अंग्रेजों द्वारा किया जा रहा शोषण , आम जनता में व्याप्त असंतोष . जन जागरण के प्रयास और स्वाधीनता आंदोलन की ऊहापोह वायु की भांति पूरे उपन्यास में फैली है 
          मेरे विचार से 'हीरू के कहिनी '  भारतीय साहित्य की एक अनमोल धरोहर है .छत्तीसगढी भाषा  का पहला उपन्यास होने की वजह से यह हमारे लिए और भी ज्यादा मूल्यवान   सम्पत्ति है,जिसे  सहेजकर और संजोकर सुरक्षित रखना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है. राजू पाण्डेय ने अपने सीमित संसाधनों से स्थानीय स्तर पर इसे प्रकाशित कर जनता के सामने लाने का सराहनीय प्रयास किया. जरूरत इस बात की है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर ऐसी दुर्लभ  साहित्यिक रचनाओं को संरक्षित करे ,ताकि आने वाली पीढ़ियों  को मालूम तो हो कि    देश -दुनिया और समाज को सही दिशा देने के लिए उनके पूर्वज प्रेरक विचारों का  कितना अनमोल खजाना उन्हें  सौंप गए हैं .(स्वराज्य करुण )

Friday 7 November 2014

(पुस्तक चर्चा ) भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर एक ज़रूरी किताब

                                        

         संगीत की अपनी भाषा होती है ,जो दुनिया के हर इंसान के दिल को छू जाती है और चाहे कोई देश-प्रदेश हो या विदेश,  कहीं का भी संगीत , कहीं के भी इंसान को सहज ही अपनी ओर आसानी से खींच लेता है.  भारतीय संगीत और वाद्य यंत्रों की भी अपनी कई विशेषताएं हैं .उनकी उत्पत्ति का अपना इतिहास है .   अवनद्ध वाद्य भी इनमे अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं . संगीत में अवनद्ध वाद्यों की जरूरत भोजन का जायका बढ़ाने वाली  मसालेदार सब्जियों और स्वादिष्ट चटनियों की तरह है . 
      भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर  डॉ.जवाहरलाल नायक का शोध-ग्रन्थ लगभग तीस साल बाद पुस्तक के रूप में सामने आया है .लेखक के अनुसार  चमड़े से ढंके वाद्य-यंत्रों के बारे में शायद अपने किस्म की यह पहली शोध पुस्तक है .. डॉ जवाहर नायक छत्तीसगढ़ में महानदी के किनारे ग्राम लोधिया (जिला -रायगढ़ ) के निवासी हैं. मध्यप्रदेश के जमाने में उस जिले के सरिया क्षेत्र से विधायक भी रह चुके हैं .उनकी पहचान एक कुशल तबला वादक के रूप में भी है .उन्होंने छत्तीसगढ़ के इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से तबले में एम .ए. की उपाधि प्राप्त की है.और इसी विश्वविद्यालय से भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर पी.एच-डी की है. 
      डॉ. नायक के अनुसार चर्म-आच्छादित वाद्यों जैसे तबला , पखावज ,मृदंग खंजरी , डफ ,ढोलक, ,आदि के लिए 'अवनद्ध ' संज्ञा दी गयी है. उन्होंने इस बारे में पुस्तक में अवनद्ध वाद्य  यंत्रों  के बारे में कई विद्वानों की परिभाषाएं भी संकलित की हैं .स्वर्गीय डॉ. लालमणि मिश्र के अनुसार -वे वाद्य जो भीतर से पोले तथा चमड़े से मढ़े हुए होते हैं और हाथ या किसी अन्य वस्तु के ताड़न से ध्वनि या शब्द उत्पन्न करते हैं ,उन्हें 'अवनद्ध ' या ' वितत ' भी कहा गया है. डॉ. जवाहर नायक ने 407 पृष्ठों की अपनी इस पुस्तक मे भारतीय अवनद्ध वाद्यों का वर्गीकरण करते हुए प्राचीन काल के अवनद्ध वाद्यों , मध्यकालीन अवनद्ध वाद्यों और आधुनिक अवनद्ध वाद्यों का दिलचस्प विश्लेषण किया है. सर्वाधिक प्रचलित अवनद्ध वाद्य 'तबला ' पर भी उन्होंने प्रकाश डाला है.प्रत्येक अवनद्ध वाद्यकी उत्पत्ति, बनावट, निर्माण विधि की जानकारी भी इसमें दी गयी है. 
        शोध-ग्रन्थ नौ अध्यायों में है. विषय प्रवेश के साथ पहले अध्याय में अवनद्ध वाद्य : शब्द व्युत्पत्ति , परिभाषा , अवनद्ध वाद्यों की निर्माण सामग्री , अवनद्ध वाद्यों का महत्व और उत्पत्ति का संक्षिप्त विवेचन है . दूसरे अध्याय में अवनद्ध वाद्यों का वर्गीकरण किया गया है. तीसरे अध्याय में भारत के प्राचीन अवनद्ध  वाद्य यंत्रों का उल्लेख है .इसमें भूमि- दुन्दुभि ,  दुन्दुभि , केतुमत और मृदंग जैसे वाद्य यंत्रों पर प्रकाश डाला गया है. चौथे अध्याय में संजा , धोंसा , तम्बकी , ढक्का, हुडुक जैसे  मध्यकालीन अवनद्ध वाद्यों पर, पांचवें अध्याय में खंजरी , दफ़ , दुक्कड , दमामा , ढोल  जैसे आधुनिक अवनद्ध वाद्यों पर और छठवें अध्याय में सर्वाधिक प्रचलित अवनद्ध वाद्य 'तबला' पर शोधकर्ता लेखक ने ज्ञानवर्धक जानकारी दी है. सातवें अध्याय में प्रमुख भारतीय अवनद्ध वाद्यों के अनेक प्रसिद्ध वादकों का परिचय दिया गया है .लेखक ने आठवें अध्याय में पाश्चात्य अवनद्ध वाद्यों का विश्लेषण किया है .इसमें लेखक डॉ.नायक की  ये पंक्तियाँ संगीत कला को लेकर उनके व्यापक और प्रगतिशील नज़रिए को प्रकट करती हैं - पाश्चात्य और हिन्दुस्तानी ,इन दो संगीत पद्धतियों के नाम से सभी संगीत रसिक परिचित हैं .दोनों ही संगीत पद्धतियाँ अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं .आज वैज्ञानिक विकास के युग में जब सम्पूर्ण विश्व की दूरी नगण्य -सी हो गई है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की सांस्कृतिक उपलब्धियों का पूर्ण सहिष्णुता के आधार पर समाकलन प्रस्तुत करें ,जिससे विस्तृत वसुन्धरा के प्रत्येक कला में स्वाभाविक सामंजस्य स्थापित हो सके .समय की आवाज को यदि आज के परिवेश में सही रूप से पहचाना जाए तो प्रत्येक विचारधारा का निष्कर्ष राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर विश्व-बन्धुता की प्रेरणा प्रदान करता हुआ मिलेगा .
           शोधार्थी डॉ. नायक के अनुसार भारतीय अवनद्ध वाद्यों के स्वतंत्र अध्ययन की दृष्टि से संभवतः यह पहला प्रयास है. उन्होंने छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और इंदिरा संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के पूर्व उप-कुलपति स्वर्गीय डॉ. अरुण कुमार सेन के मार्ग दर्शन में यह शोध-कार्य पूर्ण किया था . लगभग तीस साल के लंबे अंतराल के बाद वर्ष .2012 में डॉ. नायक की मेहनत पुस्तक के रूप में सामने आयी .उन्हें बहुत-बहुत बधाई. (स्वराज्य करुण )

Tuesday 4 November 2014

क्या सपना ही रह जाएगा अपने मकान का सपना ?

          आधुनिक भारतीय समाज में यह आम धारणा है कि इंसान को अपनी कमाई बैंकों में जमा करने के बजाय ज़मीन में निवेश  करना चाहिए . कई लोग ज़मीन खरीदने में पूँजी लगाने को बैंकों में  'फिक्स्ड  डिपौजिट' करने जैसा मानते हैं . यह भी आम धारणा है कि सोना खरीदने से ज्यादा फायदा ज़मीन खरीदी में है . समाज में प्रचलित इन धारणाओं में काफी सच्चाई है, जो साफ़ नज़र आती है .
       अपने शहर में किसी ने आज से पचीस साल पहले अगर दो हजार वर्ग फीट जमीन कहीं बीस रूपए प्रति वर्ग फीट के भाव से चालीस हजार रूपए में खरीदी थी तो आज उसकी कीमत चालीस लाख रूपए हो गयी है . पीछे  मुड़कर बहुत दूर तक देखने की जरूरत नहीं है .याद कीजिये तो पाएंगे कि  छोटे और मंझोले शहरों में आज से सिर्फ दस  साल पहले एक हजार  वर्ग फीट वाले जिस मकान की कीमत छह -सात लाख रूपए थी आज वह बढकर पैंतीस-चालीस लाख रूपए की हो गयी है . कई कॉलोनियां ऐसी बन रही हैं ,जहां एक करोड ,दो करोड और पांच-पांच करोड के भी मकान बिक रहे हैं .उन्हें खरीदने वाले कौन लोग हैं और उनकी आमदनी का क्या जरिया है , इसका अगर ईमानदारी से पता लगाया जाए तो काले धन के धंधे वालों के कई चौंकाने वाले रहस्य उजागर होंगे .प्रापर्टी का रेट शायद ऐसे ही लोगों के कारण तेजी से आसमान छूने लगा है . प्रापर्टी डीलिंग का काम करने वाले कुछ बिचौलियों की भी इसमें काफी संदेहास्पद भूमिका हो सकती है .  कॉलोनियां बनाने वालों के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वे उनमे दस-पन्दरह प्रतिशत मकान आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी बनवाएं ,लेकिन अधिकाँश निजी बिल्डर इस क़ानून का पालन नहीं करते और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता .
           ज़मीन और मकानों की  कीमतें  इस तरह बेतहाशा बढने के पीछे क्या गणित है ,यह कम से कम मुझ जैसे सामान्य इंसान की समझ से बाहर है ,लेकिन इस रहस्यमय मूल्य वृद्धि की वजह से  गरीबों और सामान्य आर्थिक स्थिति वालों पर जो संकट मंडराने लगा है , वह देश और समाज दोनों के भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है. जब किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति या उसके परिवार को रहने के लिए एक अदद मकान नहीं मिलेगा तो उसके दिल में सामाजिक व्यवस्था के प्रति स्वाभाविक रूप से आक्रोश पैदा होगा .अगर यह आक्रोश सामूहिक रूप से प्रकट होने लगे तो फिर क्या होगा ? सोच कर ही डर लगता है .
        यह एक ऐसी समस्या है जिस पर सरकार और समाज दोनों को मिलकर विचार करना और कोई रास्ता निकालना चाहिए . रोटी और कपडे का जुगाड तो इंसान किसी तरह कर लेता है ,लेकिन अपने परिवार के लिए मकान खरीदने या बनवाने में उसे पसीना आ जाता है.  खुद का मकान होना सौभाग्य की बात होती है ,लेकिन यह सौभाग्य हर किसी का नहीं होता . खास तौर पर शहरों में यह एक गंभीर समस्या बनती जा रही है . जैसे-जैसे रोजी-रोटी के लिए , सरकारी और प्राइवेट नौकरियों के लिए ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन हो रहा है , यह समस्या और भी विकराल रूप धारण कर रही है .जहां आज से कुछ साल पहले शहरों में आवासीय भूमि की कीमत पच्चीस-तीस या पचास  रूपए प्रति वर्ग फीट के आस-पास हुआ करती थी ,आज वहाँ  उसका  मूल्य सैकड़ों और हजारों रूपए वर्ग फीट हो गया है . ऐसे में कोई निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार स्वयं के घर का सपना कैसे साकार कर पाएगा ?
        सरकारी हाऊसिंग  एजेंसियां शहरों में लोगों को सस्ते मकान देने का दावा करती हैं ,लेकिन उनकी कीमतें भी इतनी ज्यादा होती हैं कि  उनका मकान  खरीद पाना हर किसी के लिए संभव नहीं हो पाता .इधर निजी क्षेत्र के बिल्डरों की भी  मौज ही मौज है . अगर किसी मकान की प्रति वर्ग फीट निर्माण लागत अधिकतम एक हजार  रूपए प्रति वर्ग फीट हो तो सीधी-सी बात है कि  पांच सौ वर्ग फीट का मकान पांच  लाख रूपए में बन सकता है .लेकिन बिल्डर लोग इसे पन्द्रह -बीस लाख रूपए में बेचते हैं ,यानी निर्माण लागत का तिगुना -चौगुना दाम वसूल करते हैं . ज़ाहिर है कि गरीब या कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार के लिए खुद के मकान का सपना आसानी से साकार नहीं हो सकता . ऐसे में सरकार को अलग-अलग आकार के मकानों की  प्रति वर्ग फीट  एक निश्चित निर्माण लागत तय कर देनी  चाहिए ,जो  सरकारी तथा निजी दोनों तरह के बिल्डरों के लिए अनिवार्य हो . शहरों में आवासीय ज़मीन की बेलगाम बढती कीमतों पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है . अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश के शहरों में अधिकाँश लोगों के लिए अपने मकान  का सपना सिर्फ सपना बनकर रह जाएगा .(स्वराज्य करुण )