Tuesday 15 April 2014

लोकतंत्र इसी का नाम है !


    बदनामी कोई नहीं चाहता . इंसान अपनी आजीविका के लिये चाहे छोटा-बड़ा कोई भी काम क्यों न करता हो,  समाज में हर इंसान की दिली इच्छा होती है कि दूसरे लोग उसके कार्यों की तारीफ़ करें,लेकिन कई बार ऐसा हो नहीं पाता और जाने-अनजाने अपने बिगड़े कार्यों की वजह से वह अपयश का शिकार हो जाता है. ठीक उसी तरह आज के युग में दुनिया भर की तमाम सरकारें भी जनता के लिये अच्छे से अच्छा काम करके दिखाना चाहती हैं , भला कौन सी सरकार अपने ही देश के लोगों के बीच अपनी बदनामी चाहेगी ? लेकिन सरकारों के विशाल कुनबे में कहीं न कहीं , किसी न किसी से कुछ न कुछ ऐसा गलत-सलत हो जाता है कि कुनबे के मत्थे बदनामी आ ही जाती है और जनता उस कुनबे से यानी सरकार से हाथ जोड़कर कहती है - माई-बाप ,अब आप जाओ, घर बैठो और आराम करो ! हम आपको शोभा-यात्रा के साथ ससम्मान आपके घर तक पहुंचा आएँगे .अब किसी और को आने दो, अगर वह भी अच्छे कार्य करके नहीं दिखाएगा ,तो उसे भी हम गाजे-बाजे के साथ उसके घर तक छोड़ आएँगे ! यह सिलसिला चलता रहता है ! लोकतंत्र इसी का नाम है !
                                                                                                              -स्वराज्य करुण 

Saturday 12 April 2014

मौसमी यारों का मौसम !

                                                                                       -स्वराज्य करुण 

                                        भीड़-भाड़ , शोरगुल , नारों का मौसम,
                                        आ गया फिर चुनावी बहारों का मौसम !
                                        मंचों में थिरक रहे सिंहासन के सपने  ,
                                        आ गया  लो मौसमी यारों का मौसम !
                                        मोहक मुस्कान लिये चेहरों का सैलाब है  ,
                                        वादों की नदियों के किनारों का मौसम !
                                        कातिल भी आज  हमदर्द नज़र आ रहे ,
                                        मुखौटों से सजी -धजी  दीवारों का मौसम !
                                        दिन में हर कोई अपने को सूरज कहता है ,
                                        हर रात यहाँ चुनावी सितारों का मौसम !
                                        कहते हैं अपने आप को हम हैं देश-रक्षक ,
                                       लगता है ये  नकली पहरेदारों का मौसम !
                                       चैनलों के नलों से  बयानों की बौछार है ,
                                       भाषणों की थाल सजे अखबारों का मौसम !
                                                                                   -स्वराज्य करुण

Tuesday 8 April 2014

सार्वजनिक संचार कम्पनी को जिन्दा चबा जाने की साजिश !

                                                                                              -- स्वराज्य करुण
बी.एस.एन.एल दफ्तर के बाहर लंच टाइम में चाय की दुकान पर इस सार्वजनिक कम्पनी के कुछ कर्मचारी चर्चा कर रहे थे . उनमे से एक कह रहा था -
      हमारे देश में सार्वजनिक कम्पनियों को जिन्दा चबाकर खा जाने के लिए निजी कम्पनियां तरह-तरह के घटिया हथकंडे अपना रही हैं .साजिश का ताजा निशाना केन्द्र सरकार की कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड ( बी.एस. एन .एल) को बनाया जा रहा है . देश के बड़े-बड़े धन-पशुओं की निजी संचार कम्पनियों ने इस सार्वजनिक प्रतिष्ठान को आर्थिक प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेलने की ऐसी साजिश रची है कि अब बी.एस.एन .एल के संचार नेटवर्क में हमेशा कई तरह की तकनीकी रुकावटें आने लगी हैं ..अगर आपके मोबाइल फोन में बी.एस .एन .एल का सिम लगा है और आप कमरे के भीतर हैं,तो कई बार उसमे बातचीत के दौरान बीच-बीच में नेट-वर्क का ऐसा व्यवधान होता है कि आप और जिसका फोन आया है वह दोनों परेशान हो जाते हैं , सरकारी संचार कम्पनी (बी.एस.एन.एल ) की छवि धूमिल करने के लिए निजी संचार कम्पनियों के अफसरों ने उच्च स्तर पर उसके कुछ अफसरों को मोटी रकम देकर अघोषित रूप से खरीद लिया है . 

      चाय की चुस्कियां लेते हुए एक कर्मचारी ने कहा --बी.एस.एन .एल के माइक्रोवेब मोबाइल टावर पहले अधिकाँश शहरों में लगे हुए थे,आज भी हैं, गाँवों में भी इस सरकारी संचार कम्पनी के टावर हुआ करते थे ,आज भी हैं,लेकिन अब निजी संचार कंपनियों के अफसर इस सरकारी संचार कम्पनी के टावरों में तकनीकी खराबी लाने की जुगत में रहते हैं और इसके लिए बी.एस एन.एल के कुछ छोटे-बड़े अफसरों को अप्रत्यक्ष रूप से खरीद लिया जाता है साजिश के तहत बी.एस.एन.एल के नेटवर्क में सर्वर डाउन करवा दिया जाता है .या सर्वर में कुछ खराबी पैदा कर दी जाती है इस वजह से बी.एस.एन.एल के सिम धारक मोबाईल फोन उपभोक्ता को नेटवर्क नहीं मिलता और किसी से बात करते वक्त कट-कट कर बातें होती हैं .झुंझलाहट में वह बी.एस.एन एल को गालियाँ देता है और किसी निजी कम्पनी के सिम लेने की सोचने लगता है और ले भी लेता है .सरकारी संचार कम्पनी के फोन-केबल्स को सडक खोदकर निजी कम्पनियों के लोग खुले आम काट देते है और उस वजह से सरकारी फोन और इंटरनेट सेवाएं ठप्प हो जाती हैं शिकायत दर्ज करवाने पर केबल्स जोड़ने के लिए बी.एस.एन.एल के   कई लापरवाह अधिकारी और कर्मचारी धीमी गति से काम करते हैं या कई दिनों तक ध्यान भी नहीं देते .मजबूर होकर सामान्य ग्राहक अथवा सरकारी ग्राहक भी निजी कम्पनियों की तरफ जाने लगता है . इस प्रकार निजी संचार कम्पनियों का मुनाफे का कारोबार तेजी से चलने ही नहीं ,बल्कि दौड़ने लगता है और बी.एस.एन.एल जैसी सार्वजनिक कम्पनी को साल-दर -साल घाटा उठाना पड़ता है .
      बगल में बैठे एक अन्य कर्मचारी का कहना था -   यह साजिश इस सार्वजनिक कम्पनी के निजीकरण की राह को आसान बनाने के लिए रची गयी है,ताकि करोड़ों -अरबों रूपयों का घाटा दिखाकर सरकारी कम्पनी को किसी निजी कम्पनी के हाथों बेच दिया जाए . सरकारी कम्पनियाँ जनता की धरोहर होती हैं.उन्हें निजी हाथों में सौंपने का अधिकार किसी को भी नहीं होना चाहिए . भारत संचार निगम के कर्मचारी संगठन इस साजिश को और भी ठीक ढंग से बेनकाब करने की तैयारी में हैं .चाय की दुकान पर सुनी गयी इस चर्चा में कितनी सच्चाई है इसका अंदाजा तो बी.एस.एन.एल. की टेलीफोन और मोबाईल फोन सेवाओं की क्वालिटी देखकर आसानी से लगाया जा सकता है. हाथ कंगन को आरसी क्या ? लंच टाइम खत्म हुआ और सभी कर्मचारी अपपने दफ्तर की ओर जाने लगे .