Sunday 2 December 2012

कितनी होनी चाहिए भौतिक विकास की गति ?

     भोपाल की भयानक गैस त्रासदी के अट्ठाईस साल   तीन दिसम्बर को पूरे हो रहे हैं  . सन 1984 की यही वह दिल दहला देने वाली तारीख थी  जब अमेरिकी कम्पनी यूनियन  कार्बाइड  द्वारा स्थापित कीटनाशक फैक्ट्री से रात के अँधेरे में मिथाइल आइसो साइनाइड (MIC) गैस के जानलेवा रिसाव ने वहाँ  हजारों मासूम बच्चों और आम  नागरिकों को मौत की नींद सोने के लिए  मजबूर कर दिया  और   लाखों लोग हमेशा के लिए बीमार हो गए  .  इस भयंकर औद्योगिक हादसे के सभी पहलुओं पर दिल की गहराइयों से विचार करें तो क्या ऐसा नहीं लगता कि अब यह तय करने का समय  आ गया है कि   मानव समाज  में आखिर कैसी और कितनी होनी चाहिए  भौतिक विकास की गति  ? किसी नदी की  धीमी -धीमी लहरों  जैसी या महासागर में उठने वाली सुनामी की विनाशकारी लहरों की तरह  ? मेरे ख्याल से भौतिक विकास की धीमी गति में ही समाज को ज्यादा सुख और सुकून मिल सकता है .तेज भौतिक विकास ने आज हमारे देश ,हमारी दुनिया और हमारे समाज की क्या हालत कर दी है , हम और आप देख ही रहे हैं . विगत सौ-डेढ़ सौ वर्षों  से तीव्र गतिमान विकास परमाणु बम तक जा पहुंचा और हिरोशिमा और नागासाकी में लाखों निर्दोष इंसान एक झटके में कुछ सनकी और पागल तानाशाहों के कारण मौत के शिकार हो गए .
   आज किसी एक देश के भौतिक विकास की खूनी अभिलाषा  का खमियाजा दूसरे मुल्कों को भुगतना पड़ता है . बीते  एक दशक में इराक और अफगानिस्तान में क्या हुआ ?  विकास के लिए पेट्रोलियम तेल की प्यास इतनी असहनीय हो गयी कि अमेरिका ने  इराक जैसे छोटे लेकिन एक आज़ाद मुल्क को तबाह कर उस पर कब्जा भी कर लिया .   अंग्रेजों में व्यापारिक विकास की तीव्र उत्कंठा जागी  तो उन्होंने साम-दाम-दंड - भेद  का कुचक्र चलाकर भारत को तकरीबन डेढ़ सौ साल तक गुलाम बनाकर रखा .उनके भौतिक विकास की लालसा हमे गुलामी के अभिशाप के रूप में भोगनी पड़ी औद्योगिक क्रान्ति ने  देश-विदेश में भौतिक विकास का ऐसा मायाजाल फैलाया कि संसाधनों के दोहन के लिए  उनके शासकों -प्रशासकों की नज़रों में युद्ध,हिंसा और प्रतिहिंसा सब जायज लगने लगे .   संस्कार , संस्कृति और सभ्यता  चाहे नष्ट हो जाएँ, नैतिकता तबाह हो जाए , गाँव और किसान गायब  हो जाएँ , लेकिन भौतिकता की चकाचौंध चाहने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ! उन्हें राष्ट्रों को विकास के नाम पर आर्थिक गुलामी में जकड़ने को आतुर  प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ.डी.आई. का राग ज्यादा लुभावना लगता है .
       नदी के धीमे बहाव और समुद्र की सुनामी लहरों में जितना  फर्क है, उतना ही अंतर धीमे और तेज विकास में है . भौतिक संसाधनों का जिस तेजी से और विस्फोटक तरीके से विकास हो रहा है , उससे इंटरनेट ,मोबाइल फोन , सुपर सोनिक विमान और अंतरिक्ष यान तक सब कुछ हासिल करने के बाद भी आज के इंसान का मानसिक सुख -चैन लगभग खत्म हो गया है . नेट और मोबाईल जैसी संचार क्रान्ति अब चिट्ठी-पत्री और डाकिये के अस्तित्व को खत्म करने पर आमादा है . लगता है -इंसान बहुत जल्दबाजी में है . उसे आशंका है कि पहाड़ ,नदी -तालाब ,हरे-भरे वन जैसे कीमती प्राकृतिक संसाधन जल्द खत्म हो जाएंगे ,इसलिए जल-जंगल और जमीन को ज्यादा से ज्यादा और जल्द से जल्द नोच-खसोट कर खत्म कर दिया जाए . धान,गेंहूँ ,चने के खेतों में लोहे के कारखाने खड़े होने लगे और कॉलोनियों के नाम पर सीमेंट-कंक्रीट के जंगल ! क्या इंसान लोहा खाकर जिन्दा रह सकता है ?            
         सायकिल के आविष्कार से इंसान को चैन नहीं मिला .उसने मोटरसायकिल और मोटर कारें बना डालीं ,ऑटो-मोबाइल उद्योग ने सड़कों पर इतनी बड़ी तादाद में डीजल-पेट्रोल वाली गाड़ियों की फ़ौज खड़ी कर दी है कि पैदल चलना दूभर होता जा रहा है . उसी तेज रफ़्तार से सड़क हादसे भी बढने लगे हैं . डीजल-पेट्रोल से निकलने वाला धुआँ भयानक प्रदूषण फैला रहा है वाहनों की बढ़ती जनसंख्या से सड़के सिमटने लगी तो उनकी चौड़ाई बढाना ज़रूरी हो गया ,फिर हर जगह फोर-लेन और सिक्स लेन सड़क बनाने के लिए बस्तियां उजड़ने लगी ,गाँव मिटने लगे .क्या इसके बाद भी हमे भौतिक विकास की गति और ज्यादा बढाने की ज़रूरत है ? हमे याद रखना चाहिए कि जब दुनिया में न तो मोटर-कारें थीं और न कोई विमान था , न कहीं टेलीफोन , न इंटरनेट और न ही मोबाइल फोन , ये दुनिया उस समय भी तो आखिर चल ही रही थी और ज्यादा सुकून से जी रही थी .आज सुविधाएं तो बढी हैं ,लेकिन सुकून कहाँ है ?  -स्वराज्य करुण