Sunday 30 September 2012

रूपये तो पेड़ों पर ही लगते हैं सरदार जी !

चिल्हर संकट के कारण पैसा तो बाज़ार से कब का गायब हो चुका है .  अब तो रूपए का जमाना है .इसलिए सरदार जी को कहना ही था तो कहते कि रूपए पेड़ पर नहीं लगते ,लेकिन वो ठहरे बेचारे भोले- भंडारी! पुरानी कहावत कह गए -पैसे पेड़ पर नहीं लगते !दरअसल वह बोलना चाह रहे थे कि रूपए पेड़ पर नहीं लगते .लेकिन मै तो कहूँगा -रूपए पेड़ पर ही उगते (लगते) है .अगर मुझ पर भरोसा न हो तो जंगल महकमे के अफसरों से पूछ लीजिए . गड्ढे खोदने का रूपया .फिर उनमें पेड़ लगाने का रूपया ,फिर पेड़ काटने और कटवाने का रूपया! यानी जंगल में लगे हर पेड़ पर फूलता और फलता है रूपया !जिस पेड़ की डालियों में जितने पत्ते होंगे ,उस पर उतने ही रूपए उगेंगे !.पत्तों के आकार के हिसाब से आप रूपए का मोल भी निकाल सकते हैं .जैसे सागौन और साल वृक्ष के चौड़े पत्तों के हिसाब से आप उन्हें एक-एक हजार का नोट मान सकते हैं .रूपये तो   पेड़ों पर ही उगते (लगते ) हैं .तभी तो छोटा हो या बड़ा , देश के जंगल महकमे का लगभग हर मुलाजिम मालदार होता है .रूपयों के पेड़ देखना चाहते हैं तो जंगल नहीं ,जंगल महकमे को देखिये  !कितनी तेजी से रूपयों  की फसल कट रही है वहाँ !  यह तत्परता ज़रूरी भी है उनके लिए . कारण यह कि उनकी मेहरबानी से रूपयों के सारे पेड़ जितनी जल्दी-जल्दी   कटते जा रहे हैं , उतनी जल्दी लग नहीं रहे हैं .एक दिन ऐसा आएगा ,जब पेड़ों के सारे पत्ते झर  जाएंगे , रूपयों की लालच में लोग पेड़ों को भी उखाड कर ले जाएंगे और यह जंगल ही खत्म हो जाएगा .जब जंगल ही नहीं रहेगा ,तो  जंगल महकमे की भी ज़रूरत नहीं रह जाएगी . यही वजह है कि वो जंगल के पेड़ों पर उगते रूपयों की फसल तेजी से नोच -खसोट कर अपना बैंक बैलेंस बढ़ाते जा रहे हैं .आखिर भविष्य के लिए कुछ तो बचाना होगा .  वैसे अकेले जंगल महकमें में ही क्यों ? रूपयों के पेड़ तो आज देश के हर महकमे में लगे हुए हैं . कोई उन्हें हिलाकर रूपये बटोर रहा है .तो कोई उनकी हर डाली को नोच-खसोट कर ! बाकी तो सब राजी-खुशी हैं जी ! -स्वराज्य करुण                                                                                                                                                     

Saturday 29 September 2012

( कविता ) आठ हजार की थाली !

                                      जनता के पैसों से खाते आठ हजार की थाली !
                                      अखबारों में पढकर यह सब जनता देती गाली !!
                                      बेशरम हँसते हैं लेकिन जाम से जाम टकराकर !
                                      जनता के हर आंसू पर वो खूब बजाएं ताली !!
                                      राजनीति व्यापार है उनका भरते रोज तिजोरी ! 
                                      कुर्सी उनके लिए सुरक्षित ,साला हो या साली !!
                                      आज़ादी और लोकतंत्र भी उनके चरण पखारें !
                                      जिनके आगे माथ नवाए क़ानून वृक्ष की डाली !!
                                      पढ़ लिख कर बेकार घूमती बेकारों की पलटन !
                                      फिर भी कहते नहीं रहेगा कोई हाथ अब खाली !!
                                      सदा-सदा के लिए सलामत उनके छत्र-सिंहासन !
                                      भले चमन को खा जाए उसका ही कोई माली !!
                                       प्लेटफार्म से सड़कों तक दूध को तरसे बचपन !
                                       लेकिन उनके गालों में हर दिन खिलती लाली !!
                                       राज इसका रह जाएगा  राज बन कर हरदम !
                                       राजनीति में आते ही कैसे दूर हुई कंगाली !!
                                       हर चुनाव में साड़ी- कम्बल -दारू का बोलबाला !
                                      असल नोट नेता की जेब में ,जनता को दे जाली !!
                                       हुक्कामों के जश्न  से जगमग पांच सितारा होटल !
                                       ड्रिंक-डिनर -डिप्लोमेसी छलकाएं खूब प्याली !!
                                                                                           -स्वराज्य करु
                             

Wednesday 19 September 2012

प्रभु ! कैसे करें आपका स्वागत ?

      
 विद्या और बुद्धि के देवता हे गणेश जी महाराज ! आपका आगमन ऐसे नाजुक समय में हो रहा है जब यह देश मानव शरीरधारी अपने भाग्य विधाताओं की बेजा हरकतों से  मुसीबतों के चक्रव्यूह में घिर गया है ! कृपया उन्हें थोड़ी सदबुद्धि तो दीजिए ,जो डीजल के दाम बढ़ाकर और रसोई गैस सिलेंडरों की कटौती करके आम जनता को परेशान कर रहे हैं , देशी बाज़ारों को जो विदेशी व्यापारियों के हाथों गिरवी रखने जा रहे है !
      हे विघ्न विनाशक ! हम तो आज धर्म संकट में पड़ गए हैं .इस घोर संकट से हमें जल्द उबारिये प्रभु ! आप ही बताइये ! हम कैसे करें आपका स्वागत ,जब कदम -कदम पर  एक से बढ़कर एक विघ्न हमारे सामने पहाड़ की तरह खड़े हो रहे हैं , देश में हर तरफ महंगाई का सैलाब नज़र आ रहा है और दाल-आटे का भाव आसमान छूने लगा है . दूध और फलों के दाम सातवें आसमान पर हैं ! होटलों में नकली दूध और नकली खोवे की मिठाईयाँ  खुले आम बिक रही हैं . हम जानते है - आपको मोदक प्रिय हैं ,लेकिन हम आपको नकली मोदकों का भोग लगाने का दुस्साहस भला कैसे कर पाएंगे ? जहां तक फलों की बात करें ,वह भी तो कार्बाइड जैसे घातक रसायनों में पका कर और नुकसानदायक  रंगों में रंग कर बेचे जा रहे है . मिलावटखोरों  का धंधा तेजी से चल रहा है और वह जनता की जिंदगी से खुल कर खिलवाड़ कर रहे है .कोई देखने ,रोकने और टोकने वाला नहीं है . डाक्टर आज भी अपने मरीजों को दूध पीने और फल खाने की सलाह देते हैं ,लेकिन इतनी महंगाई और मिलावट के इस दौर में यह कैसे संभव है ?
           हे गणपति बप्पा ! आज़ादी के बाद हमारे भारत में लाखों स्कूल और हजारों कॉलेज खुल गए ,लेकिन उनमे पढ़-लिख कर निकलते युवा हमेशा की तरह बेरोजगारों की अनंत कतार में खड़े रहने को मजबूर हैं . भ्रष्टाचार की काली कमाई से कुछ लोगों के साधारण मकान अब महल सरीखे सीना तान कर खड़े नज़र आ रहे हैं . कल तक पुरानी सायकल पर घूमने वाले कुछ लोग रातों-रात महंगी गाड़ियों के मालिक बन गए हैं. क्या यह सब उन्हें ईमानदारी की कमाई से प्राप्त हुआ है ? हे गणपति बप्पा ! देश की इस दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार लोगों को सदबुद्धि के साथ चेतावनी भी दीजिए ! फिर भी अगर वह नहीं मानते तो क्या आप अपनी अदालत में मुकदमा चलाकर उन्हें दण्डित करेंगे ? तभी तो हम आपका स्वागत कर पाएंगे !         -- स्वराज्य करुण