Wednesday, November 30, 2011

बंद करो दस साल के लिए वाहन उद्योग

 आए  दिनों  सड़क हादसों की ऐसी खौफनाक और दर्दनाक खबरें पढकर दिल घबराने लगता है. ईश्वर न करे ,ऐसा कोई हादसा किसी के साथ हो .सभी सुरक्षित रहें ,सुखी रहें ,लेकिन ऐसा तभी संभव होगा ,जब इस देश में मोटर चलित    वाहनों की बेतहाशा वृद्धि पर कोई लगाम लगाया जाए . भारी वाहनों की रफ्तार तो और भी ज्यादा जानलेवा साबित हो रही है. महानगरों और तेजी से फैलते बड़े शहरों के आस-पास ऐसे हादसे लगभग रोज हो रहे हैं . हर इंसान की जिंदगी अनमोल होती है . उसकी रक्षा करना हर इंसान का फ़र्ज़ है.वाहन चलाने वाले भी इंसान होते हैं ,लेकिन क्या गाड़ी ड्राइव करते वक्त उन्हें अपना यह फ़र्ज़ याद रहता है ?
 खास तौर पर भारी वाहन चालकों को तो हरगिज़ याद नहीं रहता . तभी तो वे राष्ट्रीय राजमार्गों पर खूनी रफ्तार से गाड़ी ड्राइव करते हैं .रातों में तो उनकी रफ्तार और भी ज्यादा बढ़ जाती है.आँखों को चौंधियाने वाली हेडलाईट से सामने वाली गाड़ी के चालक की आँखों में कुछ देर के लिए अन्धेरा छा जाता है और वह वाहन पर अपना नियंत्रण  खो बैठता है और इस तरह हो जाती है एक सड़क-दुर्घटना .इसके अलावा अप्रशिक्षित ड्राईवर  भी दुर्घटना का कारण बनते हैं .
       विदेशी सड़कों , खास तौर पर विकसित देशों की अच्छी  और सुरक्षित सड़कों के हिसाब से  निर्मित चौपहिया वाहनों के साथ-साथ तेज दौड़ने वाली मोटरसायकलों की संख्या भी हमारे देश में तेजी से बढ़ रही है .कई मोटरचालित चौपहिया और दो पहिया गाड़ियों की  स्टार्टिंग में ही पचास - साठ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हो जाती है.कई गाडियां तो इससे कम रफ़्तार में पिक-अप ही नहीं ले पातीं . शहरों  की सड़कें ऐसे वाहनों से भर गयी हैं . सड़कें आखिर  इन गाड़ियों का  कितना वजन सह पाएंगी ? लिहाजा रास्ते भी खराब हो रहे  हैं और दुर्घटनाओं में   भारी  इजाफा हो रहा है . मेरे ख़याल से भारत में सड़क दुर्घटनाएं  आज देश की दूसरी   किसी भी समस्या की तुलना में सबसे गम्भीर राष्ट्रीय समस्या  बन चुकी हैं .
 

  लेकिन लगातार बढते सड़क हादसों के बावजूद भारत में वाहनों की बेरहम रफ्तार में कोई कमी नज़र नहीं आ रही है. कई घरों के चिराग बुझ रहे हैं और कई माताओं-बहनों के सुहाग उजड़ रहे हैं ,पिछले छत्तीस घंटों में तीन  दर्दनाक हादसों के समाचारों ने मेरे जैसे कई लोगों को गहरा सदमा पहुंचाया है. इन सभी शोकाकुल परिवारों के दुःख हम भी  सहभागी हैं , लेकिन यह देख कर आश्चर्य होता है कि लगातार हो रहे सड़क हादसों के बावजूद न  तो चौपहिया -दो पहिया ऑटो मोबाईल वाहनों की बिक्री में कमी आयी है और न ही उन्हें खरीदने वालों की संख्या में . इतना ही नहीं ,बल्कि तेज रफ्तार वाली गाड़ियों के नए-नए मॉडल भी रोज शो रूमों में आ रहे हैं और बिक रहे हैं. बैंक फायनेंस भी आसानी से हो रहा है. नतीज़ा यह कि गाँवों-कस्बों में भी ऐसे वाहनों की भरमार है, जिन्हें इनके निर्माता अपने विज्ञापनों में देश की तरक्की का प्रतीक बता कर  लोगों को आकर्षित  करने की कोशिश करते रहते हैं.  मोटरचालित वाहनों से हादसों का खतरा गाँवों में भी बढ़ रहा है .मेरे विचार से तो बढ़ते सड़क हादसों को ध्यान में रख कर  वाहन उद्योग यानी ऑटो-मोबाईल उद्योग को अगले कम से कम दस साल के लिए बंद कर देना चाहिए .इनकी बैंक फायनेंसिंग पर भी प्रतिबंध लगा देना चाहिए . जान है तो ज़हान है.                                               
                                                                                                             -- स्वराज्य करुण

4 comments:

  1. बन्द हो जाये तो ठीक नहीं होते तो भी ठीक कम से कम भारत की बेल की तरह बढ रही जनसँख्या को कुछ तो घटाते है।

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  2. यह इलाज नहीं इस मर्ज़ का

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  3. आपके विचारों से सहमत नहीं हो सका, आपकी भावनाओं से अवश्‍य सहमत.

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  4. मेर नए पोस्ट 'राही मासूम रजा' पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं । धन्यवाद ।

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