Monday, August 29, 2011

इन्हें भी तो जोड़ो जन-लोकपाल में !

                     दुनिया  उम्मीद पर  ही टिकी होती है.   हमें उम्मीद करनी चाहिए कि असत्य . अहंकार ,अत्याचार और भ्रष्टाचार पर आधारित यह समाज व्यवस्था बहुत ज़ल्द बदल जाएगी . अन्ना जी का  अहिंसक जन-आंदोलन ज़रूर  हमारे देश के संदर्भ में था, लेकिन इस  शांतिपूर्ण क्रान्ति का सन्देश पूरी दुनिया में गया.
        आज़ादी के बाद की हमारी पीढ़ी को इतिहास के पन्नों में दर्ज महात्मा गांधी के सत्याग्रह  और सविनय अवज्ञा आंदोलनों की याद आने लगी. आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जाने के चौंसठ साल बाद उन्हीं के बताए मार्ग पर चल कर अन्ना जी ने अन्याय के खिलाफ आंदोलन के  जरिये देश को  अहिंसा का रास्ता दिखाया. अन्याय का ही दूसरा नाम है भष्टाचार. इससे पीड़ित जनता को अन्ना जी ने एकजुट होने की आवाज़ दी .लोग साथ जुड़ते गए और कारवाँ बनता गया . पूरा भारत अन्ना जी के साथ खडा हो गया . देश के व्यवस्थापकों को उनकी आवाज़ सुननी पड़ी .,लेकिन परिणाम कुछ खास नहीं आया. जन-लोकपाल क़ानून की मांग पर व्यवस्थापकों के बीच अभी  केवल सैद्धांतिक सहमति बनी है, व्यावहारिक सहमति कब होगी  और इसे सिद्धांत रूप में कब अपनाया जाएगा , यह भविष्य के बहुत भीतर है,जिसे कोई नहीं देख पा रहा है.
         प्रधान मंत्री और न्यायपालिका को और सांसदों को  इसके  दायरे में लाने की मांग पर संसद की  कोई सहमति बनी या नहीं , इस बारे में भी अन्ना का अनशन समाप्त होने तक कोई खबर साफ़ तौर पर खबरिया चैनलों के पर्दों पर नज़र नहीं आयी . छोटे सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में ज़रूर लाना चाहिए ,लेकिन बड़ी मछलियों के लिए कौन सा जाल होगा ?  सरकारी ,देशी और विदेशी अनुदान से चलने वाले समाज-सेवी संगठनों को,  निजी क्षेत्र के उद्योग-व्यापार जगत को , निजी शिक्षा संस्थाओं को ,निजी अस्पतालों को और स्वयम को लोकतंत्र का चौथा खम्भा मानने वाले मीडिया संस्थानों को भी जन-लोकपाल क़ानून के दायरे में क्यों नहीं होना चाहिए ? क्या ये सभी इतने पाक-साफ़ हैं कि इन्हें किसी कानूनी बंधन की ज़रूरत नहीं है ? 
                                                                                                   -  स्वराज्य करुण 
     








    

10 comments:

  1. सही कहा आपने, बाकि भी कोई दूध के धुले नहीं हैं. इन्हें भी लोकपाल के दायरे में आना चाहिए.

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  2. बहुत यथार्थवादी सोच...बधाई.

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  3. परिणाम कुछ खास नहीं आया. जन-लोकपाल क़ानून की मांग पर व्यवस्थापकों के बीच अभी केवल सैद्धांतिक सहमति बनी है, व्यावहारिक सहमति कब होगी और इसे सिद्धांत रूप में कब अपनाया जाएगा , यह भविष्य के बहुत भीतर है,जिसे कोई नहीं देख पा रहा है.

    अब इसी का इंतज़ार है ... आसानी से आँखों में धूल नहीं झोंक पाएंगे ..

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. ये तो सिर्फ़ एक पडाव है मंज़िल अभी बहुत दूर है।

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  6. जनलोकपाल बिल के ऊपर अभी दोनों पक्षों में केवल सैद्वांतिक सहमति ही बन पाई है, मुझे तो लगता है कि जिस तरह से यह जनता की जीत दिखाई जा रही है शायद सचे अर्थों में जीत हुई ही नहीं है अभी तक, और ये जीत तभी असली जीत होगी अगर इस के अन्दर राईट टू रिजेक्ट का और राईट टू रिकोल का कलोज भी ड़ाला जाएगा वर्ना विदेशी कंपनियो और मिशनरियों के मजे हो जायेंगे अब .....

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  7. अन्नाजी का अनशन तुडवाने की चाल थी ये कितनी कारागार होगी ये तो वक़्त ही बताये गा /परन्तु जनशक्ति जाग्रत हो गई है अब सरकार कितने ही पैंतरे दिखाए /इनको बिल पास करना ही होगा ,नहीं तो अन्ना और जनता इन्हें छोड़ेगी नहीं /बहुत अच्छा लिखा आपने बधाई आपको /

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  8. आगे क्या -क्या होगा ये तो वक्त ही बताएगा ....

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