Friday 25 March 2011

उड़ीसा बन गया 'ओड़िशा' लेकिन 'इंडिया '?


              भगवान जगन्नाथ की पावन-भूमि ,  अपनी  मधुर संस्कृत- बांग्ला  निष्ठ भाषा और बहुरंगी कला-संस्कृति के   लिए  देश और दुनिया में प्रसिद्ध उड़ीसा  राज्य अब  भारत के मानचित्र में  'ओड़िशा  ' के नाम से पहचाना  जाएगा .वहाँ की भाषा उड़िया अब 'ओड़िया'  कहलाएगी . लोकसभा में पारित होने के लगभग पांच महीने के भीतर राज्य सभा ने भी कल  इस आशय के दो विधेयकों को पारित कर दिया . अब इस राज्य को इतिहास के पन्नों में सदियों पहले धूमिल हो चुकी अपनी पुरानी सांस्कृतिक पहचान  वापस मिल गयी है . निश्चित रूप से इस राज्य की जनता के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर है.
     उल्लेखनीय है कि यह  भारत का वही सागर तटवर्ती राज्य  है,  जो हमारे  इतिहास में 'कलिंग' के नाम से भी मशहूर था और जहां  कभी एक भयानक युद्ध में हज़ारों की संख्या में हुए मानव-संहार  और रक्त-पात देख पाटलिपुत्र के चक्रवर्ती सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने सत्य, अहिंसा और मानवता के महान संदेशवाहक भगवान गौतम बुद्ध के आदर्शों की शरण में आकर उनके बताए शान्ति और जन-कल्याण के  मार्ग पर चलने का संकल्प लिया .उत्कल प्रदेश के नाम से परिचित  यह वही भूमि है , जहां पवित्र गंधमार्दन का पहाड़ है , जिस पर एक पुराण -कथा के अनुसार    'मूषक दैत्य ' के आतंक से जनता की रक्षा के लिए भगवान नृसिंहनाथ ने अवतार लिया था और जहां आज भी वे अपने ऐतिहासिक मंदिर में विराजमान हैं और प्रति दिन भारी संख्या में आने वाले भक्तों को अपना आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं .
       यह बात और है कि  हरे-भरे सैकड़ों साल पुराने वृक्षों ,   मूल्यवान वनौषधियों और  मनोरम प्राकृतिक झरनों से परिपूर्ण इस पहाड़ पर आधुनिक युग के एक औद्योगिक दानव की बुरी नज़र लग गयी है और वह गंधमार्दन के गर्वोन्नत सीने को चीर कर अपने एल्यूमीनियम कारखाने के लिए बाक्साईट का दोहन करना चाहता है , भले ही इस खनिज को निकालने के लिए उसे इस पवित्र तीर्थ की सुन्दरता और पावनता को तबाह क्यों न करना पड़े !     भगवान् जगन्नाथ और भगवान् नृसिंह नाथ  से प्रार्थना है कि  वे कुछ ऐसा चमत्कार करें ,जिससे सम्राट अशोक की तरह  इस औद्योगिक दस्यु का भी ह्रदय परिवर्तन हो जाए ,ताकि मंदिर की पवित्रता और इस पर्वत की नैसर्गिक सुंदरता कायम रह सके . मंदिर सुरक्षित रहेगा तो हमारी भारतीय संस्कृति सुरक्षित रहेगी .  जंगल और पहाड़ सुरक्षित रहेंगे, तो हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा .
     बहरहाल, हम बात कर रहे थे कि छत्तीसगढ़ , झारखंड , बंगाल और आंध्रप्रदेश के निकटतम पड़ोसी उड़ीसा राज्य का नया नाम अब 'ओड़िशा ' हो गया है. वैसे नया क्या , यह नाम तो पुराना ही था .सुदूर अतीत में यह इसी नाम से जाना -पहचाना जाता था . इसके भी बहुत पहले  यह  'कलिंग' था. यानी 'कलिंग' और  'ओड़िशा ' से होते हुए यह समय के हजारों-हजार उतार-चढ़ाव के बीच लोगों की जुबान पर  कब  'उड़ीसा' हो गया ,पता ही नहीं चला .वहाँ की भाषा 'ओड़िया' भी कब 'उड़िया  'कहलाने लगी , इसका भी किसी को आभास नहीं हुआ .  खैर, जब स्थानीय जनता को अपने अतीत गौरव का बोध  हुआ ,तो राज्य का नाम बदलने  की मांग हुई . उड़ीसा यानी ओडिशा सरकार ने २८ अगस्त २००८ को राज्य विधान सभा में प्रस्ताव पारित कर दिसम्बर २००८ में केन्द्र सरकार को भेजा . केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने 'उड़ीसा (वैकल्पिक नाम ) विधेयक २०१० और उड़िया भाषा का नाम बदलने के लिए ११३ वाँ संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत किया . लोकसभा तो ये  दोनों  विधेयक  पिछले साल नवंबर में पारित कर चुकी थी .संसद के उच्च सदन राज्य सभा में इसे कल २४ मार्च को पारित कर दिया गया . अब उड़ीसा राज्य का नाम कानूनी रूप से 'ओड़िशा' और भाषा का नाम उड़िया से परिवर्तित होकर' ओड़िया ' हो गया है.
  वास्तव में   किसी भी गाँव, शहर , राज्य और देश के नामकरण की अपनी एक भूमिका होती है .इसके पीछे एक सांस्कृतिक इतिहास  भी होता है. हमारे प्यारे भारत देश के नामकरण की भी अपनी भूमिका और अपना   इतिहास है . हज़ारों वर्षों से हम लोग 'भारत-माता ' के रूप में अपनी इस धरती की वन्दना करते आ रहे हैं. इस बीच अंग्रेजों ने अपनी कुटिल व्यापारिक चालों से भारत माता को गुलाम बना कर इसका नाम 'इंडिया ' रखवा दिया. जनता ने कठिन संघर्षों से आज़ादी हासिल की और भारत माता को गुलामी के बन्धनों से आज़ाद कराया . देश में लोकतंत्र  कायम हुआ. तब से लेकर आज तक लोकतंत्र की भावना के अनुरूप जनता के लिए ,जनता के द्वारा जनता की निर्वाचित सरकारें केन्द्र और राज्यों में शासन -प्रशासन का संचालन करते हुए लोक-हित और देश-हित में काम कर रही हैं .
    लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद शासन-प्रशासन में बदलाव तो आया ,पर हमारे भारतीय समाज   की  मानसिकता पर  अंग्रेजियत का नशा आज तक काले साये की तरह छाया हुआ है. इसका  सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि हम अब तक  अपने देश के अंग्रेजी नाम 'इंडिया ' को नहीं बदल सके . यह ज़रूर है कि इस बीच पिछले पच्चीस -तीस वर्षों में हम लोगों ने मद्रास का नामकरण चेन्नई , कलकत्ता का नाम कोलकाता और  बम्बई का नाम 'मुम्बई ' होते देखा है. मैसूर राज्य का नाम 'कर्नाटक' और राजधानी बेंगलोर का नाम 'बेंगलुरु ' हो गया. अभी-अभी उड़ीसा राज्य का नाम बदल कर 'ओड़िशा ' कर दिया गया है. हम अपने देश के राज्यों और शहरों के नाम  स्थानीय जन-भावनाओं के अनुरूप रख रहे हैं , यह अच्छी बात है और स्वागत योग्य भी है.  लेकिन अचरज की बात यह है कि आज़ादी के चौंसठ साल गुजर जाने के बावजूद हमें अब तक यह ख्याल नहीं आया कि इस आज़ाद मुल्क के अंग्रेजी नाम  'इंडिया 'को प्रचलन से बाहर कर दिया जाना चाहिए. अगर कोई अंग्रेजी में हमारे देश का नाम लिखना चाहे तो 'इंडिया ' न लिख कर 'भारत ' लिखे. सरकारी तौर पर भी 'इंडिया' शब्द के प्रचलन और उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए. वास्तव में मुझे तो 'भारत' लिखने में जितना गर्व महसूस होता है, 'इंडिया ' लिखने या 'इंडिया ' बोलने में उतने अपनेपन का एहसास नहीं होता .यह अंग्रेजी शब्द हमारी संस्कृति के अनुरूप भी नहीं है.
     सच तो यह है कि 'इंडिया ' शब्द गुलामी का प्रतीक है और आज भी हमें गुलामी के काले दिनों की याद दिलाता है. अंग्रेजी के  पांच अक्षरों का  शब्द 'इण्डिया ' भारत माता के माथे पर बिंदिया की तरह नहीं , बल्कि गुलामी के कलंक की तरह चिपका हुआ है. हमें अपनी मातृभूमि के मान-सम्मान की रक्षा के लिए उसके माथे से इस कलंक को  फ़ौरन मिटा देना चाहिए . जब हम आज़ादी के बाद मद्रास को चेन्नई , बम्बई को मुम्बई , कलकत्ता को कोलकाता , मैसूर को कर्नाटक.,बेंगलोर को बेंगलुरु और उड़ीसा को ओड़िशा  में तब्दील कर सकते हैं , तो 'इंडिया ' को 'भारत ' में क्यों नहीं बदल सकते ?   .                                        -- स्वराज्य करुण
                                                                                          

3 comments:

  1. भारत नाम तो है ही, लेकिन शायद आपकी चिंता इसके प्रति है कि हम में से ही लोग हैं जो भारत को इंडिया तक सीमित रखे हैं.

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  2. "आर्यावर्तदेशे जम्बूद्वीपे भरतखंडे" का उद्घोष प्राचीन कल से हो रहा है. लेकिन इंडिया कहने वालों की मनोवृत्ति नहीं बदल रही है.

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