Saturday 12 February 2011

(ग़ज़ल ) मुहब्बत का बँटवारा !

                                      - स्वराज्य  करुण

  सपनों  से जिंदगी  इस तरह कट के रह  गयी
 जैसे किसी राह से नज़र  हट के  रह गयी !

 मंजिलों  का  बढता ही चला गया फासला ,
    क़दमों की हिम्मत भी यहाँ  घट के रह गयी !

 बुझी नहीं प्यास मेरे  मन के महासागर की
  हर  लहर बूँद-बूँद  ' प्यास' रट के रह गयी !

 हमसफ़र  हर कदम ज़ख्म दे के चले गए ,
 परछाई  भी  ज़ख्मों से लिपट के रह गयी !

 सितम देख -देख यहाँ  उन मरहम वालों का,
  पीडाएं   अब  मन ही मन सिमट  के रह गयीं !

अपनों से मिला  एहसास  बेगानों की तरह  ,
रिश्तों की हरियाली  खूब  छँट  के रह गयी !

हमें  विरासत में मिली दुनिया   की नफरत ,
मुहब्बत  नोटों ही नोटों में बँट के रह गयी !

                                                                                                          स्वराज्य करुण

5 comments:

  1. विरासत में मिली नफरत को जवाबी मुहब्‍बत से लाचार कर दें.

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  2. बुझी नहीं प्यास मेरे मन के महासागर की
    हर लहर बूँद-बूँद' प्यास' रट के रह गयी!

    वाह वाह, क्या कहने।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  4. दिल की गहराईयों को छूने वाली खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  5. सुन्दर रचना ! पर क़दमों के हौसले बुलंद रहने चाहिए !

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