Thursday 10 February 2011

(गीत) खीर खाने का मौसम !

                                                                               --  स्वराज्य करुण
  
 अपने  रोने का मौसम है , उनके गाने का मौसम है, 
   यारों अब तो  गदहों   के  भी  खीर खाने का मौसम है  !
  
        होशियारों का है जाने यह  किस जनम का पाप ,    
सारे मूरख आज  बन गए बुद्धिमान  के बाप  !

     उनके  लिए  फ़ोकट में  सब कुछ पाने का मौसम है,
   यारों अब तो गदहों  के भी खीर खाने का मौसम है !
 
दफ्तर की ऊंची कुर्सी पर बस बैठे-बैठे इतराए
 बिना भेंट-पूजा के काम  करने से जो   कतराए !

मन  ही मन ऐसे लोगों के बौरा जाने का मौसम है ,
यारों अब तो गदहों के भी खीर खाने का मौसम है !

 उनकी  खूब चलती है  जो तोड़-जोड़ में माहिर हैं,
  जिनके  दिल में है कपट , वही सफल हैं  ज़ाहिर है !
           
  इस  कलि-युग  में हर सच को झुठलाने का मौसम है
यारों अब तो गदहों  के भी खीर खाने का मौसम है !

     उलटा-पुल्टा चित्र बनाकर  चित्रकार कहलाए ,
     चार लाईन जो लिख न पाए पत्रकार कहलाए !

    उनके हाथों छल-प्रपंच का जाल बिछाने का मौसम है ,
यारों अब तो गदहों  के भी खीर खाने का मौसम है. !
         
 छोटे परदे पर देखो   रंग-बिरंगी   फ़िल्मी दुनिया ,
परदे के  बाहर  फ़ैली  यह बदरंग  जुल्मी दुनिया !

कुछ लोगों के लिए  सब कुछ हथियाने का मौसम है ,
      यारों अब तो गदहों  के भी खीर  खाने का मौसम है            
        
                                                                  स्वराज्य करुण


5 comments:

  1. कुछ गदहे तो 12 महीनों खीर खा रहे हैं।
    इसीलिए मौसम को भी ठेंगा दिखा रहे है।।


    सुंदर रचना

    आभार

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  2. अज कल गदहे ही तो खीर खा रहे हैं जनता को तो सूखी रोटी भी नही मिल रही। अच्छी लगी रचना। बधाई।

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  3. वाह ..वाह..वाह..
    'यारों अब तो गदहों के भी खीर खाने का मौसम है '
    बहुत करार व्यंग !

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  4. सिर्फ गदहे खीर खाएं, तब गड़बड़ है, लेकिन गदहे 'भी' खाएं तो क्‍या बुरा.

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  5. एक नई कहावत सूझी है जमे तो बताइएगा :)

    सुअरों के पनीर खाने का मौसम

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