Saturday 5 February 2011

(ग़ज़ल ) भोली आँखों से दुनिया को !

                                          स्वराज्य  करुण

भोली आँखों से दुनिया को  निहारे  सीधे-सादे लोग,
समझ न पाए इस फरेबी महफ़िल  के इरादे लोग !

  नकाबपोशों  के शहर  में नक्कालों का स्वागत खूब ,
दहशत में जाने कहाँ गए इस बस्ती के  आधे लोग !

 सच्चाई की बात भी करना   पागलपन कहलाता है
  झूठी कसमों के संग करते सौ-सौ  झूठे  वादे लोग !

उल्टी-सीधी चालें   चलती चालबाज की माया है ,
    नासमझी में बन जाते हैं  सियासतों  के प्यादे लोग   !

हीरे-मोती की लालच में  चीर रहे धरती का सीना , 
खेती के रिवाज़ को  चाहें  पल-भर में गिरा दें  लोग ! 

उनकी  पुस्तक में न जाने दिल वालों का देश कहाँ ,
शायद असली के बदले दिल नकली दिलवा  दें लोग

वक्त आ गया  अब चलने का इस मुसाफिरखाने से ,
आने वाले हैं यहाँ भी   दलालों के   शहजादे लोग !
                                                               
                                                            -   स्वराज्य करुण

2 comments:

  1. @नकाबपोशों के शहर में नक्कालों का स्वागत खूब ,
    दहशत में जाने कहाँ गए इस बस्ती के आधे लोग !

    जीये खाए बर गे हे..........

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  2. नकाबपोशों के शहर में नक्कालों का स्वागत खूब ,
    दहशत में जाने कहाँ गए इस बस्ती के आधे लोग !
    उनकी पुस्तक में न जाने दिल वालों का देश कहाँ ,
    शायद असली के बदले दिल नकली दिलवा दें लोग

    wah bhai wah dil khush ho gaya

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