Sunday, November 7, 2010

दबंगों से भयभीत मानवता !

अमेरिकी राष्ट्रपति  बराक हुसैन ओबामा की तीन दिवसीय  भारत यात्रा के दूसरे दिन की सुबह एक  निजी  हिन्दी टेलीविजन समाचार चैनल ने अपने खास और लाइव कार्यक्रम में कुछ ऐसे शीर्षक भी दिए जो हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को आहत कर गए .मुझसे रहा नहीं गया और  कुछ मिनटों तक देखने के बाद मैंने टेलीविजन  ऑफ कर दिया ,लेकिन यह तय है कि  चैनल का  कार्यक्रम तो ऐसे शीर्षकों के साथ आगे कई घंटों तक चलता और बजता रहा होगा और देश के मान-सम्मान को बार-बार चोट पहुंचाता रहा होगा . ओबामा की भारत यात्रा के महिमा -मंडन के लिए इस चैनल के द्वारा प्रसारित विशेष कार्यक्रम की कुछ सुर्खियाँ ,जो शायद किसी भी देशभक्त भारतीय को विचलित कर सकती हैं , इस प्रकार थीं --
         भारत में दुनिया का दबंग
         दबंग की दीवाली  
 ओबामा के साथ राजस्थान के अजमेर जिले की ग्राम पंचायत कानपुरा के लोगों की वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग पर इस टेलीविजन चैनल की एक हेड-लाईन थी--'दबंग देखेगा गाँव'. महसूस करें तो वास्तव में 'दबंग' एक भय पैदा करने वाला शब्द है . .मानवता इस शब्द से भयभीत हो जाती है . वह दब कर रहती है , जिसे 'दलित' कहा जाता है . क्या अमेरिकी राष्ट्रपति को 'दबंग ' संज्ञा दे कर इस चैनल ने भारत को और हम भारतीयों को अप्रत्यक्ष रूप से 'दलित' साबित करने का प्रयास नहीं किया ?  हिन्दी अखबारों में कई बार देश के कुछ राज्यों से ख़बरें छपती हैं- दबंगों ने दलितों को ज़िंदा जलाया . दबंगों ने दलितों को सरे-आम प्रताडित किया .ऐसे में क्या  'दबंग' शब्द   का अर्थ किसी को अपने बाहुबल , धन-बल और आज के जमाने में शस्त्र -बल से दबाकर रखने वाले गुंडे-मवाली किस्म के लोगों से नहीं जुडता ? अमेरिकी राष्ट्रपति को 'दबंग' की संज्ञा देकर इस चैनल ने हमारे खास विदेशी मेहमान को जाने-अनजाने आखिर किस उपाधि से नवाजा है ,यह बताने की ज़रूरत नहीं है ,वहीं 'दबंग' के  विपरीत शब्द 'दलित'को उसने अघोषित रूप से भारत की आम जनता पर थोप दिया है . इसमें दो राय नहीं कि लोकतंत्र के इस युग में , आज की आधुनिक दुनिया में  अपने कई तरह के कारनामों के कारण  अमेरिका की छवि 'दबंग ' जैसी ही बन गयी है , लेकिन चैनल की सुर्ख़ियों ने इस बदनाम शब्द को वहाँ के राष्ट्रपति के नाम से जोड़ कर जनता को क्या संदेश दिया , यह तो चैनल के कर्ता-धर्ता ही बता पाएंगे ,पर इतनी फुरसत किसे है कि जाकर उनसे यह पूछे .दबंग भले ही मुट्ठी भर होते हैं , लेकिन अपने साम-दाम ,दंड-भेद की नीतियों से  समूची इंसानी आबादी  को दबा कर रखते हैं. इंसानियत दबंगों की गुलाम बन जाती है .
      इन दिनों एक फ़िल्मी कलाकार के 'दबंग ' शीर्षक हिन्दी फिल्म के किसी अपराधी चरित्र को  प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में इसी शीर्षक से काफी महिमा -मंडित किया जा रहा है . मानो ,यह किसी  महान प्रेरणा दायक चरित्र का नाम हो . ध्यान देने लायक बात यह भी है कि 'दबंग' फिल्म में 'दबंग ' का किरदार निभाने वाले  पर अपने वास्तविक जीवन में काले हिरणों के शिकार और फुटपाथ पर सोए गरीबों को मदहोशी में  अपनी कार से कुचल कर मार डालने का संगीन आरोप लगा हुआ है .इन्ही आरोपों में वह जेल भी जा चुका है .यह आज के जमाने के  विज्ञापन आधारित  प्रचार-तंत्र का ही करिश्मा है कि इसके बावजूद लोग . खास तौर पर चालू-छाप मनोरंजन के दीवाने  निठल्ले  युवाओं को इस 'दबंग' पर फ़िदा होते देखा जा सकता है ,भले ही उन्हें इसके लिए उसके  निजी सुरक्षा-गार्डों के हाथों मार खानी  पड़े ,या फिर पुलिस की भी लाठियां खानी पड़ जाए. मानो 'दबंग' नामक इस फ़िल्मी किरदार ने देश के लिए कोई बहुत बड़ा काम किया हो, जिससे लाखों-करोड़ों लोगों का भला हुआ हो . ऐसा कुछ भी नहीं है .फिर भी उसके लाखों निठल्ले किस्म के दीवाने हैं .प्रचार-तन्त्र और उसके निजी विज्ञापन-तंत्र ने उसे हमारे  समाज के एक 'रोल-मॉडल ' के रूप में स्थापित करने में  कोई कसर नहीं छोड़ी है.
   क्या यह आज की पढ़ी-लिखी ,साक्षर और शिक्षित कहलाने वाली आधुनिक दुनिया में नैतिक-मूल्यों के पतन और नैतिकता के प्रतिमानों में तेजी से आ रहे बदलाव का संकेत नहीं है ?आज़ादी के छह दशक बाद भी हम अपने लिए और अपनी नयी पीढ़ी के लिए महात्मा गांधी , स्वामी विवेकानंद और शहीद भगत सिंह जैसी महान विभूतियों को 'रोल मॉडल' नहीं बना पाए . न सिर्फ दबंग किस्म के लोग, बल्कि  अघोषित चोरी ,अघोषित डकैती और अघोषित बेईमानी के धन से पूरी दबंगता के साथ अपना आर्थिक साम्राज्य फैला रहे लोग भी  समाज का 'रोल-मॉडल ' बन रहे हैं .  क्या यह हमारे दिल के किसी कोने में 'दबंगों' के भय से कांपती चुपचाप दुबक कर बैठी मानवता के अस्तित्व के लिए खतरे का संकेत नहीं है ?
                                                                                                             स्वराज्य करुण
                                                               

7 comments:

  1. @अघोषित चोरी ,अघोषित डकैती और अघोषित बेईमानी के धन से पूरी दबंगता के साथ अपना आर्थिक साम्राज्य फैला रहे लोग भी समाज का 'रोल-मॉडल ' बन रहे हैं।

    दुर्भाग्य है, कभी सिकंदर भी भी दबंग था, लेकिन उसे भी इसी धरती पर मुंह की खानी पड़ी।

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  2. रुपर्ट मर्डोक का चैनल इसे दबंग के रुप में पेश कर रहा है। इससे इनकी मंशा का पता चलता है।
    आपने अच्छे ढंग से इसका पोस्ट मार्टम कर दिया है।

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  3. इस दबंग का तात्‍पर्य चुलबुल तक हो सकता है. चैनल किसी महिला पर कोई छींटा (झंडु बाम) हो तो उसे मुन्‍नी का नाम दे सकते हैं. चैनल संगीत का महासंग्राम और जंग तो कराते ही रहते हैं. क्रिकेट में धूल चटाया जाता है. शब्‍द कभी तात्‍कालिक तो कभी दीर्घकालिक और स्‍थायी रूप से अपना अर्थ खो-बदल देते हैं. भाषा की अर्थवत्‍ता पर ध्‍यान दिया जाना जरूरी है.

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  4. मीडिया की भाषा कई बार आहत करती है....सही कहा आपने..... सब व्यवसायिक सोच का परिणाम है....आपसे सहमत

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  5. हम आप टैलीविज़न ऑफ़ ही कर सकते हैं, बहुत से तो यह भी नहीं कर पाते। ऐसी सोच ही बन गई है। ग्लैमर दिखना चाहिये बस्स, और अगर उसका हिस्सा बन सकें तो फ़िर तो पूछना ही क्या।

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  6. अच्छा आलेख !

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  7. अघोषित चोरी ,अघोषित डकैती और अघोषित बेईमानी के धन से पूरी दबंगता के साथ अपना आर्थिक साम्राज्य फैला रहे लोग भी समाज का 'रोल-मॉडल ' बन रहे हैं।

    यही नहीं अब देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे सत्य-न्याय की रक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए बने पदों पर भी पहुंचकर देश और समाज को शर्मनाक स्तर के भ्रष्टाचार को सहने के लिए बाध्य कर रहें हैं .........बेहद शर्मनाक अवस्था है इंसानों के लिए ....

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