Wednesday 3 November 2010

सार्थक हुआ राज्य निर्माण : प्रतिभाओं को मिली पहचान

     वक्त गुजरते देर नहीं लगती .भारतीय गणतन्त्र के छब्बीसवें राज्य छत्तीसगढ़ ने इंतनी ज़ल्दी अपनी स्थापना के दस साल पूरे कर लिए कि पता ही नहीं चला . लगता है - एक दशक पलक झपकते निकल गया . नए राज्य ने   एक नवम्बर को  अपने निर्माण के दस वर्ष पूर्ण कर ग्यारहवें साल में कदम रखा.    जनता में भारी उत्साह स्वाभाविक था. सरकारी आयोजनों ने इसमें उत्प्रेरक का काम किया . राजधानी रायपुर से लेकर सभी अठारह जिला मुख्यालयों तक राज्योत्सव का आयोजन हुआ . रायपुर में  २६ अक्टूबर से एक नवम्बर और जिलों में तीस अक्टूबर से एक नवम्बर तक गीत-संगीत और विकास-प्रदर्शनी जैसे कार्यक्रमों ने खूब रंग जमाया .कम से कम हजार बरस के इतिहास में महाकान्तार , कोशल और दक्षिण कोशल के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ अब एक नए राज्य के रूप में पहचाना जा रहा है .
     इसमें दो राय नहीं कि अलग छत्तीसगढ़ राज्य यहाँ की जनता का वर्षों पुराना सपना था . इसके लिए कई दशकों तक जन-जागरण और जन-आंदोलन का सिलसिला भी चला . अनेक महान विभूतियों ने इसमें अपना योगदान दिया . कवियों और लेखकों ने भी  रचना धर्मिता का पालन करते हुए अपनी लेखनी से जनमत और वातावरण निर्माण का सार्थक प्रयास किया. इस बीच छोटे राज्यों के तीव्र विकास की तेज होती अवधारणा को ध्यान में रख कर ,जन-भावनाओं के अनुरूप तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश में तीन नए राज्यों -छत्तीसगढ़ ,उत्तराखंड और झारखंड निर्माण का वायदा कर जनता की वर्षों पुरानी मांग देखते ही देखते पूरी कर दी . तीनों राज्यों की जनता उनके इस ऐतिहासिक अवदान को कभी नहीं भूल पाएगी . बहरहाल छत्तीसगढ़ भी राज्य बना और अपनी दो करोड़ से ज्यादा आबादी के साथ विकास के पथ पर चल पड़ा
    .मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने  नए राज्य के दस साल के इस काल-खंड को 'विकास का दशक' की संज्ञा देकर निश्चित रूप से यहाँ की जनता के दिलों में उत्साह और आत्म-विश्वास के नए रंग भरे हैं . राज्य निर्माण के बाद छत्तीसगढ़ को शिक्षा , स्वास्थ्य , सड़क , बिजली ,पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों के साथ-साथ विकास के हर क्षेत्र में कई सफलताएं मिली हैं , जो शायद अलग राज्य नहीं बनने पर संभव नहीं हो पाता. इसी तरह साहित्य ,कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी नए राज्य के कवियों , लेखकों , गायकों , संगीतकारों और कलाकारों को प्रकाशन -प्रसारण के लिए नयी ज़मीन और नया आसमान मिला है.व्यक्तिगत और संस्थागत तौर पर और सरकारी सहयोग से भी किताबें छप रही हैं , सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहे हैं .प्रतिभाओं को पहचान मिल रही है तो राज्य का निर्माण भी सार्थक हो रहा है .डॉ. रमन सिंह की सरकार ने राज्य की जन-भाषा 'छत्तीसगढ़ी' को राज-भाषा का दर्जा देकर इसके समग्र विकास के लिए जहाँसंस्कृति विभाग के अंतर्गत  राज-भाषा आयोग का गठन किया है , वहीं उच्च शिक्षा विभाग में  छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रन्थ अकादमी बना कर राष्ट्र -भाषा हिन्दी के विकास के लिए भी अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की है .
     राजधानी रायपुर में इस बार के राज्योत्सव में पुस्तक मेले का भी आयोजन हुआ ,जहाँ देश भर से आए प्रकाशकों के साथ छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रन्थ अकादमी ने भी अपना स्टाल लगाया . उस दिन पुस्तक मेले में घूमते हुए अकादमी के स्टाल में पहुँचने पर यह देख कर मै चकित रह गया कि अपनी स्थापना के महज चार साल में अकादमी ने छत्तीसगढ़ के नए-पुराने कितने ही कवियों और लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित कर उन्हें सम्मानपूर्वक आगे लाने का एक सार्थक प्रयास किया है ,जो शायद मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य का हिस्सा बने रहने पर संभव नहीं हो सकता था इनमे से अनेक पुस्तकें छत्तीसगढ़ के इतिहास , पर हैं ,तो कई किताबें राज्य की साहित्यिक  -सांस्कृतिक विभूतियों पर भी छापी गयी हैं. कुछ कॉलेज -स्तर की पाठ्य-पुस्तकें भी हैं ,स्टाल -प्रभारी से  मुझे ५४ किताबों की एक सूची मिली ,तो मालूम हुआ कि ये सभी किताबें अकादमी द्वारा कॉलेजों की सन्दर्भ पाठ्य-पुस्तकों के रूप में प्रकाशित की गयी हैं अकादमी के गठन का मुख्य उद्देश्य भी यही है जिसे पूरा करते हुए वह नए राज्य के नए-पुराने सभी रचना-धर्मियों को नयी -पीढ़ी से जोड़ने की कोशिश कर रही है . अकादमी ने  डॉ भगवान सिंह वर्मा की पुस्तक 'विश्व-इतिहास ' के साथ-साथ डॉ. रामकुमार बेहार की किताब 'छत्तीसगढ़ का इतिहास 'भी प्रकाशित किया है . इतिहास खंड में अकादमी द्वारा प्रकाशित छत्तीसगढ़ से सम्बन्धित पुस्तकों में     डॉ. ऋषिराज पांडे की 'दक्षिण कोशल के कलचुरी ', निर्मलकांत श्रीवास्तव की 'छत्तीसगढ़ की रियासतों में स्वतन्त्रता आंदोलन का इतिहास ' भाषा-विज्ञान खंड के अंतर्गत स्वर्गीय डॉ. नरेंद्र देव वर्मा रचित 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उदविकास' और डॉ. शंकर की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी का भाषा-शास्त्रीय अध्ययन ' खास तौर पर उल्लेखनीय हैं
    अकादमी ने प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के डेढ़ सौ साल पूरे होने पर वर्ष २००७-०८ में तीन पुस्तकें छापी , जिनमे डॉ. सुधीर सक्सेना की पुस्तक 'भूमकाल :बस्तर में भूचाल' ,हरि ठाकुर का खंड-काव्य 'शहीद वीर नारायण सिंह ' और डॉ. परदेशी  राम वर्मा रचित डॉ. खूबचंद बघेल पर मोनोग्राफ शामिल है. सन्दर्भ पुस्तकों में अकादमी ने लाला जगदलपुरी की किताब 'बस्तर की लोकोक्तियाँ ' और चन्द्र कुमार चंद्राकर की किताब 'छत्तीसगढ़ी मुहावरा कोश ' भी प्रकाशित की  है . छत्तीसगढ़ में हिन्दी पत्रकारिता के जनक ,साहित्यकार स्वर्गीय माधवराव सप्रे,हिन्दी कविता में  छायावाद के जनक स्वर्गीय पंडित मुकुटधर पांडे , प्रसिद्ध इतिहासकार स्वर्गीय पंडित लोचनप्रसाद पांडे , कहानीकार स्वर्गीय विभूकुमार और कवि स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा सहित  राज्य के दिवंगत व्यंग्य लेखक लतीफ़ घोंघी की रचनाओं को अलग-अलग  चयनिका के रूप में सामने लाने का कार्य भी अकादमी ने किया है . राज्य की जिन और महान विभूतियों पर अकादमी द्वारा मोनोग्राफ छापे गए हैं , उनमे साहित्यकार डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी , डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र . महान संत गहिरा गुरु ,तत्कालीन  बस्तर रियासत के महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव और तत्कालीन अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्य मंत्री स्वर्गीय पंडित रविशंकर शुक्ल शामिल हैं . प्रदेश की सांस्कृतिक नगरी रायगढ़ के सांस्कृतिक वैभव पर डॉ. बलदेव की पुस्तक भी अकादमी के ज़रिए लोगों के सामने आयी है . इसी तारतम्य में राज्य के बालोद कस्बे के जाने-माने शायर स्वर्गीय सलीम अहमद 'जख्मी ' बालोदवी' की ग़ज़लों का  संकलन 'गाँव का बूढा बरगद ' भी अकादमी का एक महत्वपूर्ण प्रकाशन है . अकादमी के निदेशक रमेश नैय्यर स्वयं छत्तीसगढ़ के एक जाने-माने साहित्यकार और पत्रकार हैं . शायद यही कारण है कि अकादमी के प्रकाशनों में उनकी पारखी नज़रों का  अनुभव  साफ़ नज़र आता है . राज्य के जन-जीवन को, यहाँ के इतिहास को यहाँ की विभूतियों को और यहाँ की  माटी  से जुड़े लोगों को अपने प्रकाशनों में पहली प्राथमिकता देकर अकादमी ने अपनी स्थापना की ज़रुरत और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की सार्थकता भी साबित कर दी है .
                                                                                                                      स्वराज्य करुण


.

6 comments:

  1. नि:संदेह रमन राज में छत्तीसगढ ने विकास के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। समस्त छत्तीसगढ वासि्यों को शुभकामनाएं और धनतेरस पर्व की हार्दिक बधाई।

    ReplyDelete
  2. छत्‍तीसगढ़ पर हुए पुराने किंतु स्‍थायी महत्‍व के गंभीर और अधिकृत अध्‍ययन आसानी से नहीं मिल पाते. अकादमी या ऐसी किसी संस्‍था को पुनर्प्रकाशन का भी काम हाथ में लेना चाहिए, वैसे अकादमी ने अब तक जो काम किया है, वह उल्‍लेखनीय और प्रशंसनीय है.

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर जानकारी के लिए आभार !
    धन तेरस की असीम शुभकामनाएं !

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है!
    राजभाषा हिन्दी पर – कविता में बिम्ब!

    ReplyDelete
  5. राहुल सिंह जी से सहमत !

    ReplyDelete
  6. बहुत अच्छी जानकारी दी आपने ....धन्यवाद !
    आपको सपरिवार प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ !!
    उल्फ़त के दीप

    ReplyDelete