Monday 16 August 2010

सुनो विश्व -सुन्दरी !

सुनो विश्व-सुन्दरी सुनो  !
 रुपियों के रुपहले पंखों पर सवार
दिल्ली -कोलकाता ,न्यूयार्क -पेरिस
लन्दन और भी न जाने कहाँ -कहाँ
उड़ान भरने वाली परियों की शहजादी सुनो !
दुनिया के रंगमंच पर कपड़े उतार कर ,
बदन उघाड़ कर थिरकने वाली 'राष्ट्र-गरिमा'
कान खोल कर सुनो !
लज्जा को ढंकने में लाचार
फुटपाथ पर बैठी मेरे देश की बहु-बेटियों को
बाँट दो अपने कपड़े,
जो तुम्हें लगते हैं बहुत- बहुत बोझिल .
आँखें खोल कर देखो  और कान खोल कर सुनो !
बारिश की बौछार सहकर ,
तेज़ धूप की मार सहकर
जिन हाथों ने तोड़ कर चट्टानों को
बनायी  है तुम्हारे लिए सफलता और शोहरत की
यह चकाचौंध सड़क ,
हो सके तो चूम लो उन्हें ,
जिनकी ख़ूबसूरती का नहीं बना
दुनिया में कोई इतिहास !
सुनो और देखो भी अपने स्वप्न-लोक से
ज़रा ध्यान से -
काली घटाओं की घनघोर
गर्जना के बीच खेतों में
संभावनाओं के बीज बो रही
ग्राम्य-बालाओं की गुनगुनाहट  ,
विश्व -सुन्दरी से भी खूबसूरत हैं
जिनके पसीने से भीगे हुए
मासूम चेहरों की नादान-खिलखिलाहट .
                                         स्वराज्य करुण                            



     

1 comment:

  1. Aadarniya sir, behad sundar kavita, badi achhi bhavnayen. yatharth ka parichay karati hui yah apki kavita dil ko chhu gayi. vastav me sambhaavnaon k beej bo rahi bhige hue masoom chehron ki nadan khilkhilaahat vishwa sundari se bhi khubsurat hai. par ise dekhne k liye aapki jaisi bhaavnayen honi chahiye, apki jaisi najar honi chahiye, jo bahut kam logon k paas hai.

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